SIT के हेड रहे, आसाराम केस सुलझाया; पर राजनीति की पिच पर पहली ही गेंद पर आउट!

Shesh Bharat: गुजरात के कड़क IPS मनोज निनामा ने रिटायरमेंट से ठीक पहले VRS लेकर बीजेपी जॉइन की, लेकिन राजनीति की शुरुआत हार के साथ हुई. क्लर्क से IG पद तक पहुँचने वाले निनामा अपने दोस्त मंत्री पी.सी. बरंडा की राह पर चले थे.

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राजू झा

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Shesh Bharat: चुनावों में बीजेपी की लहर ऐसे चलती है कि जो भी उसमें सवार हो उसकी पॉलिटिक्स चमक जाती है. आईएएस, आईपीएस की नौकरी छोड़कर सांसद, विधायक बनने का ट्रेंड पुराना भी है और हिट भी. अपना भी कुछ हो जाएगा, ऐसा सोचकर IPS मनोज निनामा ने गुजरात के निकाय चुनाव लड़ने के लिए सर्विस खत्म होने से ठीक पहले 'VRS लिया, बीजेपी ज्वाइन की. रातों-रात खाकी उतारकर भगवा गमछा पहन लिया लेकिन जब नतीजे से जोर का झटका जोर से ही लगा. बीजेपी नेता बनने की फेर में कहीं के नहीं रहे आईपीएस मनोज निनामा. उनकी कहानी सुनकर किसी के भी आंसू निकल जाए. 

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59 साल के 2006 बैच के गुजरात कैडर के आईपीएस मनोज निनामा 31 मई को रिटायर होने वाले थे. चुनाव लड़ने के लिए VRS लेकर सबको चौंका दिया. 7 अप्रैल को वीआरएस लिया. 9 अप्रैल को बीजेपी ज्वाइन करने क 3 घंटे के भीतर टिकट मिल गया. फिर जो हुआ उसने पूरे गुजरात में हलचल मचा दी. पुलिस की टोपी की जगह बीजेपी की टोपी ने ले ली.

आदिवासी पहचान और प्रशासनिक अनुभव को अब अरावली की धरती पर राजनीति के जरिए भुनाना चाहते थे. इस नेक सोच के साथ राजनीति में आए कि 42 साल का प्रशासनिक अनुभव सरकारी विभागों और आम जनता के बीच की खाई को पाटने में काम आएगा. वे अरावली की 'ओध' सीट से इसी उम्मीद में लड़े थे कि 'सिस्टम' के अंदर रहकर वे अपने लोगों के लिए बेहतर लड़ पाएंगे. 

एक वो वक्त था जब लोग उनके सामने खड़े होने से डरते थे, और अब वो वक्त था जब उन्हें जनता के सामने हाथ जोड़कर वोट मांगना था. हालांकि, चुनावी नतीजों ने उन्हें कड़ा सबक दिया और वे जिला पंचायत का भी चुनाव हार गए.  हार बताती है कि थाने की कमान संभालना और जनता का विश्वास जीतना, दो अलग-अलग कलाएं हैं. उनकी पार्टी बीजेपी ने तो निकाय चुनाव जीत लिया लेकिन मनोज भाई की राजनीति टेकऑफ होने से पहले पसर गई.

किसी भी न्यूज के पीछे एक चेहरा होता है, और उस चेहरे के पीछे एक संघर्ष. बालक मनोज निनामा ने बचपन में 8 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल का रास्ता नापा. अरावली की उसी मिट्टी से निकले जहां वोट मांगने पहुंचे थे. 

मनोज निनामा का जन्म अरावली जिले के शालंबाजी तालुका के जाब चितरीया (Jab Chitriya) गांव में हुआ. परिवार खेतीबाड़ी करता था. गांव में स्कूल तक नहीं था, इसलिए शुरुआती शिक्षा एक आश्रम स्कूल में हुई. सेकेंडरी स्कूल के लिए उन्हें रोज 8 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था. 12वीं के बाद सरकारी हॉस्टल में रहकर पढ़ाई की और 1985 में क्लर्क की नौकरी जॉइन की. लेकिन सपना बड़ा था, उन्होंने 8 बार GPSC परीक्षा दी और आखिरकार पुलिस सेवा में DySP बने. 

मनोज निनामा ने गुजरात पुलिस के DySP से अपना पुलिस करियर शुरू किया. मेहनत-लगन के दम पर IPS में प्रमोट हुए. 

वडोदरा के जॉइंट सीपी से लेकर गांधीनगर ट्रैफिक आईजी (IG) तक, उनकी पहचान एक सख्त अधिकारी की रही लेकिन उनकी राह इतनी आसान नहीं थी. 2001 के एक कस्टोडियल टॉर्चर मामले में आए अदालती फैसले ने उनके करियर पर दाग लगाने की कोशिश की, लेकिन निनामा ने हार नहीं मानी और कानूनी लड़ाई लड़ते हुए सेवा जारी रखी.

सरकार को जब भी किसी पेचीदा मामले को सुलझाना होता, मनोज निनामा उनकी लिस्ट में ऊपर होते थे. आसाराम बापू का हाई-प्रोफाइल केस हो या वडोदरा का दर्दनाक हरानी नाव हादसा, निनामा को SIT में शामिल किया गया. उन्होंने फाइलों और सबूतों के बीच अपनी काबिलियत साबित की, लेकिन उनके मन में कुछ और ही पक रहा था.

निनामा के इस राजनीतिक बदलाव के पीछे उनके सबसे करीबी दोस्त और मार्गदर्शक पी.सी. बरंडा (P.C. Baranda) का हाथ है. दोनों ने साथ पढ़ाई की, साथ ट्रेनिंग ली और साथ ही IPS बने. बरंडा ने 2017 में इस्तीफा देकर राजनीति जॉइन की और आज वे गुजरात सरकार में जनजातीय विकास, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामलों के राज्य मंत्री हैं. निनामा ने उन्हीं की देखादेखी समय से पहले नौकरी छोड़कर राजनीति की लाइन चुनी थी. 

क्लर्क से IG और फिर चुनाव के मैदान तक... मनोज निनामा की हार-जीत अपनी जगह है, लेकिन एक आदिवासी लड़के का बिना संसाधनों के राज्य के सर्वोच्च पदों तक पहुंचना अपने आप में एक मिसाल है. करियर के आखिरी पड़ाव पर भी नया जोखिम लेने का साहस हर किसी में नहीं होता. चुनाव भले ही वो हार गए हों, लेकिन एक IPS का चुनावी दंगल में उतरना गुजरात की राजनीति का एक दिलचस्प अध्याय बन गया है. हो सकता है हार के इस अनुभव से आगे नए सिरे से वापसी कर पाएं. 

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