ईरान के इतिहास में एक ऐसा अध्याय लिखा जा रहा है जिसकी चर्चा सदियों तक होगी. करीब 4 महीने पहले, यानी 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल के एक संयुक्त हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी. इस झकझोर देने वाली घटना के ठीक चार महीने बाद अब उनका अंतिम संस्कार होने जा रहा है.
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4 जुलाई से शुरू होकर 9 जुलाई तक चलने वाला यह राजकीय शोक और विदाई समारोह, ईरान के इतिहास के सबसे बड़े आयोजनों में से एक होने वाला है. लेकिन इस पूरी घटना ने दुनिया के सामने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. आइए जानते हैं इस महा-अंतिम यात्रा से जुड़ी हर छोटी-बड़ी इनसाइड स्टोरी.
इस्लामिक मान्यताओं के खिलाफ 4 महीने की देरी क्यों?
आमतौर पर इस्लामिक परंपराओं में किसी भी व्यक्ति के निधन के बाद शव को 24 घंटे के भीतर दफना दिया जाता है. ऐसे में खामेनेई के अंतिम संस्कार में 4 महीने का वक्त क्यों लगा? इसकी सबसे बड़ी वजह थी सुरक्षा और युद्ध के हालात. फरवरी में हुए उस भीषण हमले के बाद ईरान और इजरायल के बीच युद्ध जैसे हालात बन गए थे, जिससे पूरा मिडिल ईस्ट सुलग रहा था. अब जाकर दोनों देशों के बीच एक अस्थायी युद्धविराम (सीजफायर) हुआ है. स्थितियां नियंत्रण में आने के बाद ही सरकार ने इस भव्य विदाई की योजना बनाई.
बिना केमिकल लेप के 4 महीने तक शव सुरक्षित कैसे रहा?
शिया और व्यापक इस्लामिक मान्यताओं में शव पर केमिकल लगाना (एम्बामिंग) वर्जित यानी मना है. तो फिर चिलचिलाती गर्मी के बीच शव को इतने दिनों तक कैसे सहेज कर रखा गया? काउंटर टेररिज्म एक्सपर्ट डॉ. मोहम्मद उमर के मुताबिक, इसके लिए 'रेफ्रिजरेटेड कोल्ड स्टोरेज' की आधुनिक तकनीक का सहारा लिया गया. उन्होंने बताया, "शिया कानूनों के तहत कुछ बेहद खास और असाधारण परिस्थितियों में शव को देर से दफनाने के लिए कोल्ड स्टोरेज में रखने की अनुमति है. ईरान के मुर्दाघरों में ऐसी व्यवस्थाएं आम हैं, इसलिए शव को चार महीने तक सुरक्षित रखना तकनीकी रूप से कोई बड़ी चुनौती नहीं थी." खास बात यह है कि इस हमले में खामेनेई के साथ उनकी बेटी, दामाद और पोती की भी जान गई थी, उनके शवों को भी इसी तरह सुरक्षित रखा गया है.
6 दिनों का महा-शेड्यूल, ईरान से इराक तक का सफर
खामेनेई की यह अंतिम यात्रा किसी एक शहर या देश तक सीमित नहीं है. सरकार ने इसके लिए 6 दिनों का एक बेहद भव्य और भावुक रूट तैयार किया है:
- 4 जुलाई: तेहरान के इमाम खमेनी ग्रैंड प्रेयर ग्राउंड्स में सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक आम जनता अपने महबूब नेता के अंतिम दर्शन कर सकेगी.
- 5 जुलाई: सुबह के वक्त विशेष नमाज-ए-जनाजा अदा की जाएगी, जिसके बाद एक विशाल जुलूस निकलेगा.
- 6 से 7 जुलाई: तेहरान में बड़े मार्च के बाद पार्थिव शरीर को शिया इस्लाम के बड़े धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र 'कोम' शहर ले जाया जाएगा.
- 8 जुलाई (सबसे बड़ा ट्विस्ट): खामेनेई के पार्थिव शरीर को सरहद पार पड़ोसी देश इराक ले जाया जाएगा. वहां शियाओं के पवित्र शहरों नजफ और कर्बला (जहां इमाम हुसैन की दरगाह है) में उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना होगी.
- 9 जुलाई: शव वापस ईरान लाया जाएगा और 'मशहद' शहर में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा.
कहां दी जाएगी अंतिम विदाई और क्या है परंपरा?
अयातुल्ला खामेनेई को उनके जन्मस्थान मशहद के बेहद मशहूर 'इमाम रज़ा श्राइन' परिसर में दफनाया जाएगा. शिया समुदाय के लिए यह दुनिया के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है. ईरान में यह परंपरा रही है कि उनके सबसे बड़े धार्मिक और राजनीतिक नायकों को इसी परिसर में जगह मिलती है. इससे पहले साल 2024 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हेलीकॉप्टर क्रैश में मौत हुई थी, तब उन्हें भी इसी पवित्र स्थान पर सुपुर्द-ए-खाक किया गया था.
भारत से कौन-कौन हो रहा है शामिल?
भारत और ईरान के कूटनीतिक रिश्ते हमेशा से बेहद मजबूत रहे हैं. इस संवेदनशील मौके पर भारत से एक बेहद हाई-प्रोफाइल डेलीगेशन तेहरान पहुंच रहा है. भारत सरकार की तरफ से आधिकारिक तौर पर बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा 3 जुलाई को ही ईरान के लिए रवाना हो चुके हैं. वहीं ईरान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और पवन खेड़ा को भी न्योता भेजा है. इसके अलावा जम्मू-कश्मीर से महबूबा मुफ्ती और शिया नेता आगा सैयद हसन मोसावी अल सफावी भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनेंगे. इसके अलावा 'आर्ट ऑफ लिविंग' के संस्थापक गुरुदेव श्री श्री रविशंकर भी इस राजकीय अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए तेहरान पहुंच चुके हैं.
एक युग का अंत
अयातुल्ला अली खामेनेई ने पूरे 37 सालों तक ईरान के सुप्रीम लीडर के तौर पर देश की तकदीर और कमान संभाली. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद वह ईरान के इतिहास में सबसे लंबे समय तक इस सर्वोच्च पद पर रहने वाले दूसरे नेता थे. 1981 से 1989 तक देश के राष्ट्रपति रहने के बाद, पहले सर्वोच्च नेता खुमैनी के निधन पर 'असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स' ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी थी, जिसे उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक निभाया.
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