Shesh Bharat: ओडिशा बीजेपी में भयंकर गुटबाजी, क्या 2029 के चुनाव के लिए केंद्रीय मंत्री जुएल ओरांव को हटाने का रचा जा रहा है चक्रव्यूह?

रूपक प्रियदर्शी

• 11:15 AM • 01 Sep 2026

केंद्रीय मंत्री जुएल ओरांव ओडिशा में मीडिया के सामने विरोधियों को दी गई अपनी हिंसक चेतावनी और 2029 का लोकसभा चुनाव लड़ने के ऐलान के कारण सुर्खियों में हैं. राउरकेला में अपने करीबी की गिरफ्तारी और पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी के बीच उन्होंने अपनी छवि खराब करने की साजिश के खिलाफ यह आक्रामक रुख अपनाया है.

बीजेपी से खून पसीने का हिसाब मांग रहे जुएल उरांव
बीजेपी से खून पसीने का हिसाब मांग रहे जुएल उरांव
Google CTA

ओडिशा से लेकर दिल्ली के सियासी गलियारों तक इस समय एक ऐसा भयंकर राजनीतिक भूचाल आया है, जिसने देश के पावर कॉरिडोर्स को हिलाकर रख दिया है. मोदी सरकार में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओरांव इस समय अपनी किसी विकास योजना के लिए नहीं, बल्कि अपने एक बेहद हैरान करने वाले और आक्रामक बयान के कारण देश की सुर्खियों में आ गए हैं. भुवनेश्वर में मीडिया कैमरों के सामने आकर उन्होंने खुलेआम अपने विरोधियों को धमकी देते हुए दावा किया है कि जो लोग पानी की तरह पैसा बहाकर उनकी प्रतिष्ठा और छवि को खराब करने की साजिश रच रहे हैं, वे उन साजिशकर्ताओं के हाथ काटने और उन्हें जिंदा जलाने का दम रखते हैं. 

Read more!

ये सारा हंगामा तब शुरू हुआ जब राउरकेला में पुलिस ने जुएल ओराम के करीबी और उनके जिला प्रतिनिधि प्रकाश राकेश  पासवान को गिरफ्तार किया. आरोप लगा कि उसने अपनी राजनीतिक धमक का इस्तेमाल करके सरकारी सर्किट हाउस में खतरनाक अपराधियों को पनाह दी थी. इस बड़ी गिरफ्तारी के बाद से ही ओडिशा के प्रेस, मीडिया में जुएल ओरांव को चौतरफा निशाना बनाया जा रहा है. लगातार नेगेटिव मीडिया कवरेज में जुएल ओरांव में अपने खिलाफ राजनीतिक साजिश माना. इसे जोड़ा कि उनकी इमेज खराब करके सरकार से निकलवाने की साजिश हो रही है. जुएल 
ने आगबबूला होकर अपनी ही पार्टी के भीतर और बाहर मौजूद विरोधियों के खिलाफ हिंसक जंग छेड़ दी है.

बीजेपी की अंदरूनी गुटबाजी

हालांकि ओडिशा के लोकल प्रेस में ये सब भी छप रहा है कि जो कुछ हो रहा है वो ओडिशा बीजेपी की अंदरूनी गुटबाजी, एक-दूसरे के खिलाफ राजनीतिक चक्रव्यूह रचने के लिए हो रहा है. बीजेपी के भीतर पुराने और नए नेताओं का टकराव बेकाबू हो चुका है. जुएल ओरांव ओडिशा बीजेपी के सबसे पुराने चावल में से हैं. आदिवासी कोटे से पिछले 25-30 साल से अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं. दावा किया जा रहा है कि जो नेता ओरांव के दशकों पुराने एकछत्र दबदबे को पचा नहीं पा रहे हैं ये सब उनका किया धरा है. किसी तरह ओरांव की छवि पर दाग लगाकर उन्हें केंद्रीय कैबिनेट से हटवाने की कोशिश है ताकि उनकी जगह कोई और ले सके. 

जुएल ओरांव ने ये सब समझ लिया है. उन्होंने बीजेपी के संगठन महासचिव मानस मोहंती से मुलाकात कर साफ कह दिया कि उन्होंने राज्य में अपने खून-पसीने से इस पार्टी को सींचा है. उन्होंने विरोधियों को राजनीतिक मैदान में आकर मुकाबला करने की खुली चुनौती देते हुए साफ किया कि जो लोग उन्हें कमजोर समझ रहे हैं, वे भूल रहे हैं कि वे किसी भी कीमत पर झुकने वाले नहीं हैं और इसी वजह से उन्होंने पहले लिया गया अपना चुनावी संन्यास का फैसला बदलते हुए ऐलान कर दिया है कि वे साल 2029 का लोकसभा चुनाव पूरी ताकत के साथ फिर से लड़ेंगे.

आदिवासी समाज के लिए कुल 47 सीटें आरक्षित

2014 के बाद मोदी बीजेपी लहर में आदिवासी वोट बैंक ने बड़े-बड़े कमाल किए. लोकसभा में अनुसूचित जनजाति (ST - Scheduled Tribe) यानी आदिवासी समाज के लिए कुल 47 सीटें आरक्षित हैं. 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने इन 47 में से 27 सीटों पर जीत दर्ज की थी.. 2019 में बीजेपी ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए रिकॉर्ड 31 सीटें जीतीं लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में 6 सीटों का नुकसान हुआ और बीजेपी 25 सीटें ही जीत पाई. 

बीजेपी ने आदिवासी वोट बैंक की अहमियत समझते हुए पिछले एक दशक में बड़ा आदिवासी नेतृत्व को तैयार किया है. द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाना उसी लंबी दूरी की स्ट्रैटजी का हिस्सा था. बीजेपी के आदिवासी नेताओं की सीनियरोरिटी और राजनीतिक कद में जुएल ओरांव सबसे टॉप पर आते हैं. उन सबसे पुराने आदिवासी नेताओं में से हैं जिन्होंने तब पार्टी के लिए काम किया जब आदिवासी इलाकों में कोई खास आधार नहीं था.अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से कैबिनेट मंत्री हैं. ओडिशा की राजनीति में बीजेपी के भीष्म पितामह भी माने जाते हैं. 

साल 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय को विभाजित करके पहली बार एक अलग 'केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय का गठन किया, तब जुएल ओरांव को ही देश का सबसे पहला आदिवासी कल्याण मंत्री नियुक्त किया गया था. इस लिहाज से वे इतिहास में देश के पहले आदिवासी कल्याण मंत्री बने. जुएल ओरांव अलग-अलग कार्यकालों में तीन बार 1999 से 2004, 2014 से 2019 और अब जून 2024 से आज तक इस मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री पद की शपथ ले चुके हैं. 

बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरसना आम बात

जुएल ओरांव के बचपन की कंगाली और कड़े संघर्ष की कहानी है. ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के पिछड़े, दूरदराज के आदिवासी गांव 'केंदुडीही' में 22 मार्च 1961 को एक साधारण ओरांव आदिवासी परिवार में जन्मे जुएल का बचपन भयंकर आर्थिक तंगहाली और कंगाली में बीता. दो भाइयों और तीन बहनों के इस बड़े परिवार को पालने के लिए उनके माता-पिता दिलगा और भुतुकी ओरांव को कड़ा संघर्ष करना पड़ता था, जहां बुनियादी सुविधाओं के लिए भी तरसना आम बात थी. इसी भयंकर गरीबी ने जुएल के भीतर समाज के सबसे शोषित और पिछड़े आदिवासियों की आवाज बनने का एक गहरा संकल्प पैदा कर दिया. अपनी लगन के दम पर विपरीत हालातों से लड़ते हुए उन्होंने राउरकेला के 'उत्कलमणि गोपबंधु इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग' से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा पूरा किया. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड यानी भेल (BHEL) में बतौर असिस्टेंट फोरमैन एक सुरक्षित और बेहद प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी मिल गई. करीब छह साल तक उन्होंने वहां नौकरी की, लेकिन समाज सेवा और आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने के जुनून के चलते उन्होंने साल 1989-1990 में इस सुरक्षित सरकारी नौकरी को हमेशा के लिए लात मार दी और राजनीति के अनिश्चित सफर पर निकल पड़े.

साल 1990 में ओडिशा की बोनाई विधानसभा सीट से पहली बार विधायक चुनकर उन्होंने अपने चुनावी सफर का शानदार आगाज किया और फिर लगातार दूसरी बार भी विधायक बने. जुएल ओरांव की सबसे बड़ी यूएसपी ये रही है कि वो ओडिशा में भारतीय जनता पार्टी के उन शुरुआती केवल दो संस्थापक विधायकों में से एक हैं, जिन्होंने उस दौर में राज्य में कमल खिलाया था जब वहां बीजेपी का झंडा उठाने वाला भी कोई नहीं मिलता था. वे चार साल से अधिक समय तक ओडिशा बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रहे और विधानसभा में विपक्ष के नेता की कमान भी संभाली. हालांकि ओडिशा में बीजेपी के साथ इतनी जमीनी राजनीति करने के बाद भी जब पहली बार सरकार बनी तो सीएम रेस की रेस में जुएल उरांव नहीं थे. 

जुएल उरांव में ओडिशा की सुंदरगढ़ लोकसभा सीट को अजेय किला बना दिया. नवीन पटनायक और बीजेडी ने ओडिशा में ढाई दशकों तक अजेय चुनावी राजनीति ली लेकिन सुंदरगढ़ का किला जीत नहीं सके. उरांव अकेले 1998 से लेकर अब तक रिकॉर्ड 6 बार सांसद चुने जा चुके हैं. 

जमीनी पकड़ और बेदाग आदिवासी चेहरे के कारण 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब देश का पहला अलग जनजातीय कार्य मंत्रालय बनाया तो उसकी पहली कमान जुएल ओरांव को सौंपी 2014 की प्रचंड मोदी लहर में जब पूरे ओडिशा से केवल एक इकलौता बीजेपी सांसद जीता, तो वे जुएल ओरांव ही थे, जिसके इनाम के तौर पर मोदी सरकार 1.0 में वे फिर से कैबिनेट मंत्री बने और जून 2024 में शुरू हुई मोदी सरकार 3.0 में भी वे देश के 7वें जनजातीय कार्य मंत्री के रूप में आदिवासियों की कमान संभाल रहे हैं. ऐसे में कंगाली से उठकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुँचने वाले इस 'फायरब्रांड' आदिवासी नेता की यह आंतरिक राजनीतिक लड़ाई अब ओडिशा से लेकर दिल्ली तक की सियासत का सबसे बड़ा ड्रामा बन चुकी है.

ये भी पढ़ें: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के ADC रहे मेजर ऋषभ सिंह साम्याल ने क्यों दे दिया इस्तीफा, जानें पूरी इनसाइड स्टोरी