चुनावों में हार बड़ी बुरी होती है. खासकर तब पार्टी सत्ता से सीधे विपक्ष में आ जाए. देश की राजनीति में लेफ्ट पार्टियों की एकता की मिसालें अलग किस्म की है. बहुत रेयर मौके हुए जब सीपीएम और सीपीआई के बीच कोई खाई खींची हो. केरल में मई तक लेफ्ट की सरकार थी जिसे पिनराई विजयन लीड कर रहे थे. जैसे चुनाव में हार हुई, सीपीआई ने सीपीएम पर हावी होना शुरू कर दिया. ये दोनों को पता है कि जिस बात को लेकर लड़ रहे हैं उसके हासिल करने या नहीं मिलने से किसी को कुछ हासिल नहीं होगा, कुछ का कुछ नुकसान नहीं होगा लेकिन मूंछ की लड़ाई है जो हार के साइड इफेक्ट से ज्यादा कुछ नहीं है.
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लेफ्ट के किले एक-एक कर ढहते चले गए. मई तक अकेले केरल में लेफ्ट की सरकार थी वो भी अब नहीं रही. हर मंच पर एक साथ खड़े होने वाले और विचारधारा की कसम खाने वाले लेफ्ट अलायंस यानी एलडीएफ (LDF की दो सबसे बड़ी पार्टियां सीपीएम (CPI-M) और सीपीआई (CPI) इस वक्त आमने-सामने हैं. कल तक जो 'कॉमरेड' एक-दूसरे को गले लगाते थे, आज वो विधानसभा के एक पद के लिए सड़कों और टीवी चैनलों पर खुलेआम भिड़ गए हैं. तो आखिर क्या है यह पूरी कहानी? क्यों शुरू हुई यह जंग? और क्या केरल में सत्ता गंवाने के बाद पिनाराई विजयन को अब अपनी ही गठबंधन सहयोगी आंखें दिखा रही है?
अब आते हैं उस मुख्य मुद्दे पर जिसने इस पुराने गठबंधन में आग लगा दी है. विवाद की असली वजह है केरल विधानसभा में विपक्ष के उपनेता का पद. अमूमन जब गठबंधन विपक्ष में बैठता है, तो विपक्ष के नेता का पद सबसे बड़ी पार्टी सीपीएम को मिलता है और उपनेता का पद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी सीपीआई को दिया जाता है. इसी राजनीतिक परंपरा के तहत सीपीआई ने 'डिप्टी एलओपी' के पद पर अपना दावा ठोक दिया. लेकिन पूर्व सीएम पिनाराई विजयन ने ऐसा कड़ा रुख अपनाया कि सीपीआई सन्न रह गई. विजयन ने त्रिशूर में मीडिया से साफ-साफ कह दिया कि यह पद केवल और केवल सीपीएम के पास ही रहेगा, और इसके लिए वे विधानसभा स्पीकर को पत्र भेजने वाले हैं.
1964 में CPI में एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक विभाजन हुआ था
देश में सीपीएम और सीपीआई का गठबंधन कोई नया नहीं है। साल 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) में एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक विभाजन हुआ था. वैचारिक मतभेदों और तत्कालीन कांग्रेस सरकार के प्रति रुख को लेकर पार्टी दो फाड़ हो गई और जनम हुआ CPI(M) का. विभाजन के बाद शुरुआती सालों में दोनों के बीच कड़वाहट रही, लेकिन बाद में दोनों ने मिलकर केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) और पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की नींव रखी. केरल और देश की राजनीति में यह गठबंधन करीब 5-6 दशकों से साथ चल रहा है. यह भारतीय राजनीति का सबसे पुराना और सबसे स्थिर गठबंधन माना जाता रहा है, लेकिन आज इसी पुराने रिश्ते की दीवारें दरकती नजर आ रही हैं.
सीपीएम (CPI-M) और सीपीआई (CPI) के झंडे में समानता यह है कि दोनों ही लाल रंग के हैं और दोनों के केंद्र में किसानों-मजदूरों के प्रतीक के रूप में दरांती और हथौड़ा बना हुआ है. सबसे बड़ा अंतर यह है कि सीपीएम के झंडे पर सफेद अक्षरों में साफ-साफ 'CPI(M)' लिखा होता है, जबकि सीपीआई के झंडे पर कोई टेक्स्ट नहीं होता. चुनाव आयोग से मिले चुनाव चिन्हों में सीपीआई का चिन्ह 'अनाज की बाली और दरांती' है, जबकि सीपीएम का चिन्ह 'हथौड़ा, दरांती और तारा' है.
अगर ताकत के तराजू पर दोनों पार्टियों को तौला जाए, तो केरल से लेकर दिल्ली तक सीपीएम हमेशा 'बड़े भाई' की भूमिका में रही है. केरल विधानसभा में सीपीएम के पास हमेशा भारी बहुमत और ज्यादा सीटें होती हैं, जबकि सीपीआई गठबंधन में दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती है. देश के स्तर पर भी, कभी पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल तीनों राज्यों पर राज करने वाली सीपीएम आज भी कम्युनिस्टों का मुख्य चेहरा है, लेकिन केरल विधानसभा चुनावों में एलडीएफ की करारी हार हुई है। इस हार के बाद पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन अब मुख्यमंत्री नहीं रहे, बल्कि विधानसभा में विपक्ष के नेता बनकर बैठे हैं.
पिनाराई विजयन की चुनावी हार ने सीपीआई को आक्रामक होने का मौका
सबसे बड़ा सवाल यही तैर रहा है कि क्या पिनाराई विजयन की चुनावी हार ने सीपीआई को आक्रामक होने का मौका दे दिया है? पिछले एक दशक यानी 2016-2026 तक जब केरल में पिनाराई विजयन की सरकार थी, तब विजयन को एक 'आयरन मैन' या एकछत्र नेता के तौर पर देखा जाता था. उस दौरान सीपीआई सरकार में शामिल तो थी, लेकिन वह सीपीएम के फैसलों के आगे दबी-दबी रहती थी, लेकिन विजयन की लीडरशिप में लेफ्ट की हार ने उनके राजनीतिक रसूख को थोड़ा कमजोर किया है.सीपीआई अब सीपीएम की इस कमजोरी का फायदा उठाकर गठबंधन के भीतर अपना खोया हुआ आत्मसम्मान और सियासी जमीन वापस पाना चाहती है.
यह लड़ाई सिर्फ तिरुवनंतपुरम तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसकी गूंज अब दिल्ली तक है। सीपीआई के राष्ट्रीय महासचिव डी. राजा ने दिल्ली से कड़ा स्टैंड लिया है. डी. राजा ने भी केरल यूनिट का समर्थन करते हुए कि डिप्टी एलओपी के लिए सीपीआई की मांग पूरी तरह से जायज है. उन्होंने पिनाराई विजयन पर निशाना साधते हुए कहा कि विजयन देश के लेफ्ट आंदोलन के इतने वरिष्ठ नेता हैं, उन्हें गठबंधन के सहयोगियों के प्रति थोड़ा उदार होना चाहिए और जिद छोड़नी चाहिए.
पिनाराई विजयन अपनी पुरानी धमक बरकरार रखना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ सीपीआई अब बड़े भाई सीपीएम के आगे झुकने को तैयार नहीं है. अब देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली और केरल के कम्युनिस्ट नेता इस अंदरूनी कलह को कैसे शांत करते हैं, या फिर केरल में लाल किले की यह दरार और चौड़ी हो जाएगी.
सीपीआई का स्टैंड काफी दिलचस्प रहा
विजयन के एकतरफा बयान से भड़के सीपीआई के केरल राज्य सचिव बिनॉय विश्वम ने इस रवैये को लेफ्ट कलचर के खिलाफ बताया है. उन्होंने बेहद तीखे शब्दों में कहा, "कोई भी नेता या मीडिया हाउस हमारी पार्टी (CPI) के आत्मसम्मान की कीमत तय नहीं कर सकता." सीपीआई नेताओं का साफ कहना है कि यदि सीपीएम ने अपना अड़ियल रवैया नहीं छोड़ा, तो वे विधानसभा के भीतर एक अलग ब्लॉक बनाकर बैठने या विपक्षी बैठकों का बहिष्कार करने जैसा कड़ा कदम भी उठा सकते हैं.
विजयन सरकार के पिछले कार्यकाल में सीपीआई का स्टैंड काफी दिलचस्प रहा. एक तरफ वे सरकार का हिस्सा थे, लेकिन कई मौकों पर उन्होंने विजयन के फैसलों पर दबी जुबान में विरोध भी जताया था। केंद्र सरकार की 'पीएम श्री' (PM SHRI) स्कूल योजना पर विजयन सरकार के गुपचुप समझौते को लेकर सीपीआई ने कड़ा रुख अपनाया था, जिससे सरकार बैकफुट पर आ गई थी. जब पूर्व सीएम विजयन की बेटी की कंपनी के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच चल रही थी, तब सीपीएम चाहती थी कि सीपीआई खुलकर विजयन के परिवार का बचाव करे, लेकिन सीपीआई ने इस मामले पर दूरी बनाए रखी, जिससे सीपीएम के अंदर भारी नाराजगी रही.
केरल में लेफ्ट का किला गिराकर कांग्रेस के यूडीएफ ने न केवल सत्ता हासिल की बल्कि इस हाल में पहुंचा दिया कि सबसे बड़ा विपक्षी अलायंस खुद वजूद के लिए लड़ रहा है. लेफ्ट में सीपीएम और सीपीआई की हर लड़ाई कांग्रेस को भी पहुंचाएगी और अरसे से ताक में बैठी बीजेपी के भी संजीवनी बन सकती है.
केरल में मई तक लेफ्ट की सरकार थी जिसे पिनराई विजयन लीड कर रहे थे. जैसे चुनाव में हार हुई, सीपीआई ने सीपीएम पर हावी होना शुरू कर दिया. ये दोनों को पता है कि जिस बात को लेकर लड़ रहे हैं उसके हासिल करने या नहीं मिलने से किसी को कुछ हासिल नहीं होगा, कुछ का कुछ नुकसान नहीं होगा लेकिन मूंछ की लड़ाई है जो हार के साइड इफेक्ट से ज्यादा कुछ नहीं है.
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