देश की सियासत इस वक्त 'रिजीम चेंज' (सत्ता परिवर्तन) यानी सरकार बदलने के एक नए और तीखे विवाद में उलझ गई है. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए उन तमाम बयानों पर करारा तंज कसा है, जिनमें बांग्लादेश के छात्र आंदोलन की तर्ज पर भारत में भी बदलाव लाने की बातें कही जा रही थीं. रिजिजू ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि भारत की तुलना किसी और देश से नहीं की जा सकती.
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रिजिजू का दो टूक संदेश, भारत बांग्लादेश नहीं है
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर अपनी भड़ास निकालते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने लिखा, "बड़े आए 'रिजीम चेंज' करने वाले! कान खोलकर सुन लो, भारत बांग्लादेश नहीं है."
रिजिजू ने देश के युवाओं का पक्ष रखते हुए उन बयानों को भी खारिज किया जिनमें युवाओं को किसी आंदोलन के जरिए भड़काने की बात की जा रही थी.
उन्होंने कहा कि देश का युवा जरा भी नासमझ नहीं है. आज का युवा भारत को बनाने में जुटा है, बिगाड़ने में नहीं. हमारे देश के होनहार युवा खेल के मैदानों में मेडल जीत रहे हैं, टेक्नोलॉजी और स्टार्टअप्स में नए रिकॉर्ड बना रहे हैं और इनोवेशन के जरिए देश का नाम रोशन कर रहे हैं.
कहां से सुलग उठी ‘रिजीम चेंज’ की यह चिंगारी?
दरअसल, पिछले कुछ दिनों में देश के कुछ जाने-माने चेहरों ने 'रिजीम चेंज' को लेकर ऐसे बयान दिए, जिसने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी. इसकी शुरुआत 14 अक्टूबर को हुई, जब ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा ने सोशलिस्ट स्टूडेंट्स फ्रंट के एक कार्यक्रम में बांग्लादेश के Gen-Z छात्र आंदोलन का खुलकर जिक्र किया.
उन्होंने बांग्लादेशी युवाओं को सलाम करते हुए कहा कि वहां शुरू हुआ आंदोलन लोकतंत्र और वोट के अधिकारों की लड़ाई थी और वे इसके लिए वहां के युवाओं का शुक्रिया अदा करती हैं.
इसके ठीक अगले दिन यानी 15 अक्टूबर को जाने-माने सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलकर 'रिजीम चेंज' का नारा बुलंद कर दिया. उन्होंने दो टूक कहा कि हम तानाशाही किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे और यह लड़ाई साफ तौर पर सरकार बदलने यानी रिजीम चेंज की ही है. जब उनसे इस पर सवाल पूछा गया, तो उनका कहना था कि सरकार बदलना नागरिकों का लोकतांत्रिक हक है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है.
कांग्रेस और पवन खेड़ा की एंट्री
इस मामले में कांग्रेस पार्टी भी पीछे नहीं रही. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के उस बयान के जवाब में जिसमें उन्होंने 'रिजीम चेंज' की किसी साजिश की ओर इशारा किया था, कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने 16 अक्टूबर को मोर्चा संभाला. पवन खेड़ा ने बेबाकी से कहा कि हां, हम इस सरकार को हटाना चाहते हैं और व्यवस्था बदलना चाहते हैं.
उन्होंने 1977 का हवाला देते हुए कहा कि लोकतंत्र में आंदोलन के जरिए सरकारें बदलना कोई नई बात नहीं है. हालांकि, साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में सरकार बदलने का सबसे पुख्ता रास्ता चुनाव ही है और विपक्ष का मकसद चुनाव के जरिए ही सत्ता पलटना है. उन्होंने यह भी भरोसा दिलाया कि कांग्रेस कभी नहीं चाहेगी कि भारत कभी बांग्लादेश जैसे हालातों से गुजरे.
यह पूरा घटनाक्रम इस समय देश की राजनीति में एक बड़ा बहस का मुद्दा बन गया है, जहां एक तरफ सरकार इसे देश की स्थिरता के खिलाफ एक खतरनाक सोच मान रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी नेता इसे पूरी तरह से लोकतांत्रिक अधिकार बता रहे हैं.
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