भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में आज एक महत्वपूर्ण और गौरवशाली दिन दर्ज किया गया. राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने आज संसद के उच्च सदन में नवनिर्वाचित और पुन निर्वाचित 19 सदस्यों को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई. इस शपथ ग्रहण समारोह में कई दिग्गज नेताओं के साथ-साथ एक ऐसा नाम शामिल रहा जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा.
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पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद बनीं डॉ. मेनका गुरुस्वामी देश की पहली ऐसी सांसद हैं, जिन्होंने खुलकर अपनी पहचान एक क्वीर(LGBTQ+) के रूप में दुनिया के सामने रखी है. उनके शपथ लेते ही हर जगह सवाल उठने लगे है कि कौन हैं ये सांसद और ये TMC से कैसे जुड़ी? तो आइए विस्तार से जानते है पूरी कहानी.
पहले जानिए कौन हैं डॉ. मेनका गुरुस्वामी?
डॉ. मेनका गुरुस्वामी सुप्रीम कोर्ट की एक वरिष्ठ और सम्मानित वकील के रूप में पहचानी जाती हैं. उन्हें देश के सबसे ऐतिहासिक संवैधानिक मामलों में से एक, 'धारा 377' को रद्द कराने की कानूनी जंग के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है. उनकी दमदार दलीलों और कानूनी समझ के चलते ही साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया था.
उनकी इसी प्रतिभा और दूरदर्शी सोच के कारण वर्ष 2019 में उन्हें 'टाइम मैगजीन' की 100 सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची और 'फॉरेन पॉलिसी मैगजीन' की 'ग्लोबल थिंकर्स' लिस्ट में शामिल किया गया था.
वकालत का सफर और शैक्षणिक बैकग्राउंड
डॉ. गुरुस्वामी का वकालत का सफर साल 1997 में भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल अशोक देसाई के मार्गदर्शन में शुरू हुआ था. वह अशोक देसाई को अपना मेंटर मानती हैं और उनके साथ उन्होंने लिटिगेशन व जटिल संवैधानिक मामलों पर गहराई से काम किया. उनकी शैक्षणिक यात्रा भी बेहद प्रभावशाली रही है.
उन्होंने 2001 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से सिविल लॉ (BCL) और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से लॉ में मास्टर्स (LLM) की डिग्री प्राप्त की. ऑक्सफोर्ड के रोड्स हाउस के मिलनर हॉल में उनका पोर्ट्रेट लगाया गया है, जो उन्हें यह विशेष सम्मान पाने वाली पहली भारतीय और दुनिया की मात्र दूसरी महिला बनाता है.
तृणमूल कांग्रेस के साथ जुड़ाव और राजनीतिक भूमिका
राजनीति में सक्रिय होने से पहले ही डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने कानूनी मोर्चे पर तृणमूल कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उन्होंने अदालत में पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हुए राजनीतिक सलाहकार संगठन I-PAC के दफ्तरों पर हुई ईडी की छापेमारी को कानूनी चुनौती दी थी. संवैधानिक मामलों की गहरी समझ और पार्टी के रणनीतिक बचाव में उनके योगदान ने उन्हें संसद के लिए एक योग्य उम्मीदवार के रूप में स्थापित किया. अब सदन के भीतर वह न केवल अपनी पार्टी बल्कि सामाजिक न्याय और समावेशिता के मुद्दों पर भी अपनी राय रखेंगी.
क्यों हो रही उनकी इतनी चर्चा?
डॉ. मेनका गुरुस्वामी का संसद पहुंचना केवल एक राजनीतिक पद की प्राप्ति नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में समावेश और विविधता की दिशा में एक बड़ा कदम है. वह देश की पहली ऐसी सांसद बनी हैं जो अपनी क्वीर पहचान के साथ सदन में प्रतिनिधित्व करेंगी. उनकी यह उपलब्धि LGBTQ+ समुदाय के लिए समाज में बढ़ती स्वीकृति और राजनीतिक सशक्तिकरण का प्रतीक मानी जा रही है. डॉ. गुरुस्वामी के शपथ लेने के साथ ही भारतीय संसद के गलियारों में अब एक ऐसी आवाज गूंजेगी जिसने सालों तक अदालतों में हाशिए पर खड़े लोगों के हक की लड़ाई लड़ी है.
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