'सबूत दिए, घर आए अफसर, फिर भी काट दिया नाम',  संविधान सजाने वाले नंदलाल बोस के परिवार का नाम वोटर लिस्ट से कटा!

West Bengal election: भारतीय संविधान को चित्रों से सजाने वाले महान कलाकार नंदलाल बोस के पोते सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी का नाम पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से हटा दिया गया है. जरूरी दस्तावेज जमा करने और सरकारी जांच के बावजूद नाम गायब होने से परिवार आहत है. प्रशासन ने उन्हें अब ट्रिब्यूनल जाने की सलाह दी है.

West Bengal election
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न्यूज तक डेस्क

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West Bengal election: भारतीय संविधान को अपनी कला से जीवंत बनाने वाले महान कलाकार नंदलाल बोस के परिवार को लेकर एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले, नंदलाल बोस के पोते सुप्रबुद्ध सेन और उनकी पत्नी दीपा सेन का नाम वोटर लिस्ट से गायब पाया गया है. ताज्जुब की बात यह है कि तमाम जरूरी दस्तावेज और सबूत देने के बाद भी यह बुजुर्ग दंपत्ति अब अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं कर पाएगा.

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दस्तावेज दिए, फिर भी लिस्ट से नाम बाहर

शांतिनिकेतन में रहने वाले 88 वर्षीय सुप्रबुद्ध सेन और 82 वर्षीया दीपा सेन ने बताया कि उन्होंने चुनाव आयोग को पासपोर्ट, पेंशन रिकॉर्ड, इंजीनियरिंग सेवा के दस्तावेज और विश्व भारती के सर्टिफिकेट तक सौंपे थे. अधिकारियों ने घर आकर वेरिफिकेशन भी किया था, लेकिन जब फाइनल सप्लीमेंट्री लिस्ट आई, तो उसमें उनका नाम शामिल नहीं था. सिर्फ यही नहीं, उनके साथ पिछले 52 वर्षों से रह रहे चक्रधर नायक का नाम भी सूची से नदारद है.

नंदलाल बोस की विरासत और सुप्रबुद्ध सेन

सुप्रबुद्ध सेन, नंदलाल बोस की छोटी बेटी जमुना सेन के पुत्र हैं. उनका बचपन अपने दादा के सानिध्य में बीता. नंदलाल बोस वही शख्सियत थे जिन्हें देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संविधान की मूल कॉपी को चित्रों से सजाने की जिम्मेदारी दी थी. सुप्रबुद्ध स्वयं जादवपुर यूनिवर्सिटी से इंजीनियर रहे हैं और दामोदर वैली कॉरपोरेशन (DVC) में 32 साल सेवा देने के बाद 1996 में शांतिनिकेतन में बस गए थे. चूंकि यह जोड़ा काम की वजह से कहीं और रह रहा था, इसलिए 2002 की वोटर लिस्ट में उनके नाम शामिल नहीं थे.

अब तक, छह सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी की जा चुकी हैं और लगभग 50 लाख नामों की जांच की गई है, जिनमें से 45 प्रतिशत नामों को हटा दिया गया है. इन सप्लीमेंट्री लिस्ट में सुप्रबुद्ध सेन और दीपा सेन के नाम गायब हैं.

प्रशासन का क्या है कहना?

इस मामले पर श्रीनिकेतन की बीडीओ अर्पिता चौधरी का कहना है कि फिलहाल नाम कटने की सटीक वजह स्पष्ट नहीं है. उन्होंने सुझाव दिया है कि प्रभावित लोग इस फैसले के खिलाफ ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटा सकते हैं.

रिपोर्ट: Anupam Mishra

 

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