राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के खिलाफ विपक्ष लामबंद, लाया अविश्वास प्रस्ताव, जानें अब क्या होगा

जगदीप धनखड़ को हटाने महाभियोग प्रोसेस शुरू, धनखड़ को हटाने सिंघवी, केटीएस तुलसी आए फ्रंट पर. जयराम रमेश बोले- ये बेहद कष्टकारी निर्णय रहा है, लेकिन संसदीय लोकतंत्र के हित में अभूतपूर्व कदम उठाना पड़ा है.

राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़
राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़

रूपक प्रियदर्शी

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न्यूज़ हाइलाइट्स

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महाभियोग पास होने के लिए बहुमत जरूरी.

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लोकसभा में एनडीए को बहुमत.

जगदीप धनखड़ राज्यसभा के सभापति चुने नहीं गए थे. वो तो उपराष्ट्रपति चुने गए. संविधान में व्यवस्था है कि उपराष्ट्रपति ही राज्यसभा के चेयरमैन की जिम्मेदारी संभालेंगे. 2022 में उपराष्ट्रपति बनने के बाद जगदीप धनखड़ एक्स ऑफिशियो राज्यसभा के चेयरमैन की कुर्सी पर बैठ गए. धनखड़ के आने से पहले मल्लिकार्जुन खड़गे राज्यसभा में आकर विपक्ष के नेता भी बन चुके थे. जगदीप धनखड़ के आने के साथ शुरू हुआ मल्लिकार्जुन खरगे से रोज तकरार, नोंकझोंक वाला नॉन स्टॉप सिलसिला जो अब बड़े विवाद की तरफ बढ़ चुका है.

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मोदी सरकार ने जगदीप धनखड़ को एनडीए उम्मीदवार बनाकर उपराष्ट्रपति बनाया था. धनखड़ सरकार और बीजेपी के लिए काम के आरोपों से घिर गए. विपक्ष को बोलने नहीं देना, माइक ऑफ कर देना, पक्षपात करने, लोकतंत्र की हत्या करने-जगदीप धनखड़ पर ऐसे आरोप रोज की बात हो गई. दूसरे सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठे धनखड़ के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी न करने की मर्यादाएं टूटने लगीं. 

खड़गे और धनखड़ का मामला तो तकरार, नोंकझोंक तक सीमित रहा, लेकिन डेरेक ओ ब्रायन, संजय सिंह, राघव चड्ढा, प्रियंका चतुर्वेदी समेत विपक्ष के दर्जनों सांसदों ने धनखड़ का कोप झेला. डांट सुनी, सस्पेंशन झेला. उपराष्ट्रपति पद पर बैठे जगदीप धनखड़ राज्यसभा चेयरमैन के तौर पर काम करने के तौर-तरीकों से अविश्वास के अधिकारी हो गए. जब धैर्य का बांध टूटने लगा तो 
पूरे विपक्ष ने जगदीप धनखड़ के खिलाफ no-confidence या  impeachment resolution लाकर तहलका मचा दिया. धनखड़ से विपक्ष इतना आजिज है कि पहले ही डोज में 80 सांसदों ने साइन करके धनखड़ पर अविश्वास जता दिया. अगस्त में भी ऐसा प्लान बन रहा था, लेकिन सत्र खत्म होने से धनखड़ बच गए. 

क्या कहता है नियम? 

राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री-संविधान में सबके लिए व्यवस्था है कि कौन नियम से नियुक्त हो सकता है, कौन नियम से बर्खास्त हो सकता है. कहीं किसी ने गड़बड़ी की तो महाभियोग या impeachment resolution लाकर हटाया जा सकता है. इसके लिए अनुच्छेद 67(बी) में नियम बने हुए हैं. हालांकि अलग से राज्यसभा सभापति के खिलाफ महाभियोग लाने की कोई संवैधानिक व्यवस्था है नहीं. जो कुछ होना है वो उपराष्ट्रपति के नाम पर होना है. उपराष्ट्रपति पर महाभियोग साबित हुआ तो ऑटोमेटिकली राज्यसभा चेयरमैन की भी विदाई हो जाएगी. अब से पहले कभी भी किसी उपराष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग, अविश्वास, या impeachment resolution की नौबत आई नहीं. 

उपराष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए अनुच्छेद 67(बी) में नियम समझाए गए हैं. नियम ये है कि कम से कम राज्यसभा के 50 सांसदों के साइन होंगे, तब ही अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जा सकता है. अविश्वास प्रस्ताव लाने से पहले 14 दिन का नोटिस दिया जाना जरूरी है. शीतकालीन सत्र 20 दिसंबर तक ही है. इसलिए जगदीप धनखड़ के खिलाफ महाभियोग की कोई भी कार्यवाही मौजूदा सत्र में शुरू नहीं हो पाएगी. महाभियोग प्रस्ताव जगदीप धनखड़ के ही ऑफिस राज्यसभा महासचिव को दिया गया है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक देश के जाने माने वकील कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी, केटीएस तुलसी ने महाभियोग प्रस्ताव का ड्राफ्ट बनाया है. सिंघवी को धनखड़ ने आजकल वैसे ही नाराज किया हुआ है. कुछ दिन पहले राज्यसभा में नोट की गड्डी मिली थी. चेयरमैन ने जांच का आदेश दिया, लेकिन जांच पूरी होने से पहले उन्होंने नाम ले लिया कि अभिषेक मनु सिंघवी की सीट के नीचे से पैसे मिले हैं. 

धनखड़ के खिलाफ कपिल सिब्बल भी 

महाभियोग या impeachment पास होने के लिए बहुमत का होना जरूरी है. राज्यसभा में जगदीप धनखड़ के खिलाफ कुछ महीने पहले महाभियोग आया होता तो स्थिति कुछ और होती. अब स्थिति कुछ और है. इस समय सरकार बहुमत में है. महाभियोग के मामले में सरकार ही जगदीप धनखड़ को बचाने वाले कवच का काम करेगी. विपक्ष यानी इंडिया गठबंधन के पास कुल मिलाकर 103 सांसदों का समर्थन हासिल है. निर्दलीय कपिल सिब्बल को मिलाकर ये नंबर हो जाता है 104. धनखड़ के खिलाफ मुहिम में कपिल सिब्बल भी शामिल हैं. 

लोकसभा में NDA को बहुमत 

अगर राज्यसभा से प्रस्ताव पास हुआ तब भी धनखड़ हटाए नहीं जाएंगे. महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा की मंजूरी के लिए जाएगा. वहां भी मोदी सरकार के पास ठीकठाक बहुमत है.जब तक सरकार धनखड़ की कवच है, विपक्ष को भी पता है कि सारी ताकत लगाकर भी धनखड़ के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पास नहीं कराया जा सकता. महाभियोग तो सांकेतिक क्रांति है धनखड़ को सही रास्ते पर लाने और उनके पक्षपात को हाई लाइट करने का. जयराम रमेश ने साफ किया कि अत्यंत पक्षपातपूर्ण तरीके से सदन संचालन करने के कारण INDIA ग्रुप के पास अविश्वास प्रस्ताव लाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था. ये बेहद कष्टकारी निर्णय रहा है, लेकिन संसदीय लोकतंत्र के हित में अभूतपूर्व कदम उठाना पड़ा है. 

अलग-अलग मुद्दों को लेकर कांग्रेस से कन्नी काटते दिख रही समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के सांसद भी धनखड़ को हटाने की मुहिम में शामिल हो गए. हालांकि तृणमूल कांग्रेस को लेकर अभी भी सस्पेंस है. राज्यसभा में अविश्वास प्रस्ताव के दौरान टीएमसी सांसद सदन से वाकआउट कर गए. पार्टी ने कुछ फाइनल नहीं बोला कि धनखड़ के खिलाफ जाना है या नहीं. चुनावों के बाद बीजेपी से कुट्टी करने वाले नवीन पटनायक ने बीजेडी सांसदों को भी क्लियर लाइन नहीं दी है कि विपक्ष के साथ जाना है या धनखड़ के साथ.

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