Parle Melody history: भारतीय बचपन की यादों का जिक्र जब भी होगा, मेलोडी चॉकलेट का नाम सबसे ऊपर आएगा. एक दौर था जब मोहल्ले की किराना दुकानों पर कांच के बड़े जार मेलोडी टॉफियों से भरे रहते थे. स्कूल में जन्मदिन का मौका हो या दोस्तों के साथ खुशियां बांटनी हों, चंद पैसों में मिलने वाली इस टॉफी ने हर चेहरे पर मुस्कान बिखेरी. कारमेल की बाहरी परत और अंदर चॉकलेट के जादुई स्वाद वाली यह टॉफी आज चार दशक बाद भी लोगों की पहली पसंद बनी हुई है. लेकिन आज इसकी चर्चा देश ही नहीं विदेशों में होने लगी है.
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इंटरनेट पर क्यों ट्रेंड कर रही है मेलोडी?
यह आइकॉनिक टॉफी की सोशल मीडिया पर जबरदस्त तरीके से चर्चा हो रही है. इसकी वजह है- एक ताजा वीडियो. इस वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को मेलोडी टॉफी का पैकेट गिफ्ट देते हुए नजर आ रहे हैं. इसी वाकये के बाद मेलोडी अचानक चर्चा में आ गई. अब लोग इस ब्रांड के इतिहास को इंटरनेट पर सर्च कर रहे हैं.
1980 का दौर में हुई एंट्री!
अगर इतिहास के पन्नों को पलटें तो साल 1980 के आस-पास भारत में टॉफी और कैंडी का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा था. उस समय मार्केट में कैडबरी की 'एक्लेयर्स' का एकतरफा राज था. इसी को टक्कर देने के इरादे से मार्केट में आई पारले कंपनी की मेलोडी. टॉफी का कॉन्सेप्ट काफी हद तक मिलता-जुलता था यानी बाहर कारमेल और अंदर चॉकलेट. लेकिन पारले अपनी इस टॉफी को एक बिल्कुल नई और अनोखी पहचान देना चाहता था.
एक विज्ञापन जिसने बदल दी ब्रांड की किस्मत
मेलोडी को दूसरे ब्रांड्स से अलग और खास दिखाने की जिम्मेदारी पारले की विज्ञापन एजेंसी 'एवरेस्ट' को दी गई. इसी दौरान एक ऐसा सवाल तैयार हुआ जो आने वाले समय में भारतीय पॉप कल्चर का हिस्सा बन गया. इस विज्ञापन की जादुई टैगलाइन को मशहूर कॉपीराइटर सुलेखा बाजपेयी ने लिखा था. वह लाइन थी "मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?" और इसका जवाब बेहद सीधा और दिलचस्प था - "मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ!"
कंपनी की रणनीति लोगों के मन में जिज्ञासा पैदा करने की थी. पारले चाहता था कि ग्राहक खुद सोचें कि आखिर इस टॉफी में ऐसा क्या खास है. यह अनूठी मार्केटिंग स्ट्रेटजी पूरी तरह काम कर गई. 'मेलोडी है चॉकलेटी' का यह जिंगल बच्चों से लेकर युवाओं के दिमाग में इस कदर बस गया कि बिक्री के सारे रिकॉर्ड टूट गए.
विज्ञापनों से लेकर फिल्मों और मीम्स तक जलवा
मेलोडी के टीवी विज्ञापनों ने इसे घर-घर का पसंदीदा नाम बना दिया. क्लासरूम में टीचर का पूछना हो या खेल के मैदान में कोच का सवाल, हर जगह यही एक नारा गूंजता दिखाई देता था. वक्त बदला लेकिन इस टैगलाइन का क्रेज कभी कम नहीं हुआ.
साल 2019 में आई बॉलीवुड फिल्म 'छिछोरे' में भी इस डायलॉग का बहुत मजेदार अंदाज में इस्तेमाल किया गया था. आज के डिजिटल युग में भी सोशल मीडिया पर मेलोडी को लेकर अक्सर नए-नए मीम्स बनते रहते हैं.
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