मैथ में सिर्फ 51 नंबर लाने वाला पवन कुमार चंदना कैसे बन गए देश के सबसे बड़े रॉकेट मैन?

अलका कुमारी

19 Jul 2026 (अपडेटेड: Jul 19 2026 1:11 PM)

प्रधानमंत्री मोदी ने विक्रम-1 की सफल लॉन्चिंग के बाद स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापकों से बात की और उनसे कहा, "आपने न केवल अंतरिक्ष में एक नया पेड़ लगाया है, बल्कि अगली पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए जमीन पर भी नई जड़ों को मजबूत किया है."

स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक
स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापक
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क्या आप सोच सकते हैं कि स्कूल के दिनों में मैथ्स के पेपर में सिर्फ 51 नंबर लाने वाला कोई लड़का आगे चलकर देश का बड़ा रॉकेट साइंटिस्ट बन सकता है. आमतौर पर जब हम किसी अंतरिक्ष वैज्ञानिक या रॉकेट बनाने वाले इंसान की कल्पना करते हैं तो हमारे दिमाग में एक ऐसा चेहरा आता है जो बचपन से ही अपनी क्लास का टॉपर रहा हो, जिसे नंबरों से प्यार हो और जिसके रिपोर्ट कार्ड में हमेशा 100 में से 100 नंबर चमकते हों. लेकिन सफलता का कोई तय फॉर्मूला नहीं होता और इसी बात को सच साबित कर दिखाया है एक भारतीय युवा ने जिनका नाम है पवन कुमार चंदना.

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आज पवन कुमार चंदना किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. उनकी कंपनी 'स्काईरूट एयरोस्पेस' द्वारा तैयार किए गए रॉकेट 'विक्रम-1' ने अंतरिक्ष की गहराइयों को छूकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम हमेशा के लिए दर्ज करा दिया है.

ये कोई मामूली कामयाबी नहीं है, बल्कि ये स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है जब किसी निजी यानी प्राइवेट कंपनी द्वारा पूरी तरह से विकसित किए गए रॉकेट ने स्पेस में कदम रखा हो. ये कहानी सिर्फ एक मशीन के आसमान में जाने की नहीं है, बल्कि ये कहानी एक साधारण लड़के की असाधारण जिद, बड़े सपनों और भारत के स्पेस सेक्टर में एक नए युग की शुरुआत की है.

जब नंबरों से ज्यादा 'मशीनों की धड़कन' समझ आने लगी

हैदराबाद के एक बेहद साधारण, मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे पवन कुमार चंदना का बचपन बिल्कुल वैसा ही था, जैसा देश के करोड़ों अन्य बच्चों का होता है. न तो जेब में बहुत पैसे थे और न ही किस्मत में कोई शॉर्टकट. शुरुआत में पढ़ाई-लिखाई को लेकर उनका कोई बहुत गहरा नाता नहीं था. स्कूल के दिनों में जब गणित के जटिल सवाल सामने आते, तो पवन के पसीने छूट जाते थे. यही वजह थी कि एक बार गणित की परीक्षा में उन्हें 100 में से महज 51 नंबर मिले.

आज के समय में अगर किसी बच्चे के इतने नंबर आ जाएं, तो शायद माता-पिता और टीचर्स उसका भविष्य अंधकार में मान लें. लेकिन पवन के पास एक ऐसी चीज थी जो अक्सर किताबी कीड़ों के पास नहीं होती और वो है कौतूहल और मशीनों के प्रति बेइंतहा लगाव. 

पवन को इस बात में ज्यादा दिलचस्पी थी कि उनके आसपास की चीजें, खिलौने और गाड़ियां आखिर काम कैसे करती हैं. वो घंटों मशीनों को देखते, उन्हें समझने की कोशिश करते. इस पूरे सफर में सबसे खास बात यह रही कि कम नंबर आने के बावजूद पवन के पिता ने कभी उनका हौसला टूटने नहीं दिया. मुश्किल से मुश्किल वक्त में भी उनके पिता एक मजबूत चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे और हमेशा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया.

पिता के इसी भरोसे का असर था कि धीरे-धीरे पवन का पढ़ाई को लेकर नजरिया बदलने लगा. जिस गणित और विज्ञान को वो कभी अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझते थे. धीरे-धीरे वही उनके सबसे पक्के दोस्त बन गए. जो नंबर कभी डराते थे, अब वो पवन को समझ आने लगे थे.

पहले ही प्रयास में IIT क्रैक और फिर ISRO का बुलावा

जैसे-जैसे पवन बड़े हुए, उनका मशीनों को लेकर जुनून और गहरा होता गया. उन्होंने ठान लिया था कि उन्हें इंजीनियरिंग के क्षेत्र में ही कुछ बड़ा करना है. इसके बाद उन्होंने देश की सबसे कठिन मानी जाने वाली परीक्षा IIT-JEE की तैयारी शुरू की. अपनी मेहनत और लगन के दम पर पवन ने पहले ही प्रयास में इस परीक्षा को न सिर्फ पास किया, बल्कि देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान IIT खड़गपुर में अपनी जगह पक्की कर ली.

IIT खड़गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान अक्सर छात्र इस होड़ में रहते हैं कि उन्हें मल्टीनेशनल कंपनियों में लाखों-करोड़ों रुपये का पैकेज मिल जाए और वो विदेश चले जाएं. लेकिन पवन का दिमाग और दिल दोनों किसी और ही दिशा में चल रहे थे. उनका आकर्षण कंप्यूटर की कोडिंग से ज्यादा आसमान की ऊंचाइयों, तारों और रॉकेट की तकनीक की तरफ था.

पवन की काबिलियत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि IIT कैंपस प्लेसमेंट के दौरान ही उन्हें देश की सबसे बड़ी अंतरिक्ष संस्था इसरो (ISRO - Indian Space Research Organisation) से सीधे नौकरी का ऑफर मिल गया. उनके सामने एक तरफ भारी-भरकम सैलरी वाली कॉर्पोरेट नौकरियां थीं, तो दूसरी तरफ देश के लिए कुछ करने का मौका और कम सैलरी वाली इसरो की सरकारी नौकरी. पवन ने बिना वक्त गंवाए इसरो को चुना, क्योंकि वह जानते थे कि उनके सपनों की उड़ान यहीं से शुरू होगी.

ISRO के बाहुबली रॉकेट पर किया काम

इसरो में शामिल होने के बाद पवन कुमार चंदना को केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर (VSSC) में तैनात किया गया. यहां उन्होंने पूरे 6 साल गुजारे. इन 6 सालों में पवन ने भारत के सबसे भारी और ताकतवर लॉन्च व्हीकल GSLV Mk III (जिसे इसरो का बाहुबली भी कहा जाता है) के प्रोजेक्ट पर बेहद करीब से काम किया.

रॉकेट की डिजाइनिंग, उसकी बारीकियां और अंतरिक्ष में जाने वाले ईंधन के गणित को उन्होंने यहां बहुत गहराई से सीखा. उनके इस बेहतरीन और इनोवेटिव काम के लिए उन्हें इसरो के भीतर 'इंटरनल इनोवेशन अवॉर्ड' से भी सम्मानित किया गया.

इसरो में एक सुरक्षित और सम्मानजनक सरकारी नौकरी थी, समाज में इज्जत थी और करियर भी सेट था. लेकिन पवन के दिमाग में एक अलग ही तूफान चल रहा था. उसी दौरान भारत में स्टार्टअप कल्चर तेजी से पैर पसार रहा था.

पवन अक्सर सोचते थे कि जब अमेरिका में 'स्पेसएक्स' (SpaceX) जैसी प्राइवेट कंपनियां खुद के रॉकेट बनाकर अंतरिक्ष में भेज सकती हैं, तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? क्या रॉकेट बनाने का काम सिर्फ सरकारी संस्थाओं के दायरे में ही सिमटा रहना चाहिए? यह विचार पवन के दिमाग में इस कदर घर कर गया कि उन्होंने एक दिन एक बेहद चौंकाने वाला फैसला लिया. उन्होंने इसरो की अपनी शानदार सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

जून 2018 में हैदराबाद में बोया गया 'स्काईरूट' का बीज

नौकरी छोड़ने के बाद पवन अकेले नहीं थे. उनके साथ इसरो के ही एक और काबिल इंजीनियर नागा भरत डाका भी आ गए जो खुद IIT बॉम्बे के पासआउट थे. इन दोनों युवा वैज्ञानिकों के पास रॉकेट बनाने का हुनर तो था लेकिन जेब में इतने पैसे नहीं थे कि वो स्पेस जैसी महंगी इंडस्ट्री में कदम रख सकें. फिर भी, अपनी जिद और हौसले के दम पर जून 2018 में इन दोनों ने मिलकर हैदराबाद की एक छोटी सी जगह से 'स्काईरूट एयरोस्पेस' की नींव रखी. शुरुआती सफर बेहद कांटों भरा था. भारत में उस वक्त तक स्पेस सेक्टर को प्राइवेट कंपनियों के लिए आधिकारिक तौर पर खोला भी नहीं गया था. ऐसे में किसी प्राइवेट रॉकेट स्टार्टअप पर भरोसा करना इन्वेस्टर्स के लिए जुए जैसा था. जब पवन और उनकी टीम निवेशकों के पास जाते तो लोग उनकी तारीफ तो करते लेकिन पैसा लगाने से कतराते थे.

जब बिन्नी बंसल बने संकटमोचक

पवन की इस अनोखी सोच और विजन पर सबसे पहला भरोसा जताया फ्लिपकार्ट के को-फाउंडर और खुद IIT खड़गपुर के छात्र रहे बिन्नी बंसल ने. उन्होंने स्काईरूट की क्षमता को पहचाना और शुरुआती दौर में 1.5 मिलियन डॉलर (करीब 12 करोड़ रुपये से अधिक) का बड़ा इंवेस्टमेंट किया. इस फंड से कंपनी को पंख मिले और काम तेजी से आगे बढ़ने लगा. लेकिन किस्मत अभी पवन की और परीक्षा लेना चाहती थी. जैसे ही काम ने रफ्तार पकड़ी, साल 2020 में पूरी दुनिया में कोरोना महामारी फैल गई. हर तरफ लॉकडाउन लग गया, आर्थिक गतिविधियां ठप हो गईं और नया फंड जुटाना लगभग नामुमकिन हो गया. रॉकेट के पार्ट्स की सप्लाई रुक गई. ऐसे मुश्किल दौर में रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर की दिग्गज कंपनी ग्रीनको आगे आई. ग्रीनको के वित्तीय सहयोग ने स्काईरूट को उस नाजुक मोड़ पर बिखरने से बचा लिया.

 जब इतिहास खुद चलकर आया पास

जैसे ही मुश्किलें थोड़ी कम हुईं, स्काईरूट ने इतिहास रचना शुरू कर दिया जुलाई 2020 में स्काईरूट ने अपने पहले स्वदेशी रॉकेट इंजन का सफल परीक्षण किया. भारत के महान नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सी.वी. रमन के नाम पर इस इंजन का नाम 'रमन-1' रखा गया था. इसके साथ ही स्काईरूट देश की पहली ऐसी निजी कंपनी बन गई, जिसने खुद का रॉकेट इंजन टेस्ट किया हो.

साल 2021 में (ISRO के साथ ऐतिहासिक डील): जब भारत सरकार ने अंतरिक्ष के दरवाजे निजी कंपनियों के लिए खोले तो इसरो के साथ आधिकारिक तौर पर समझौता (MoU) करने वाली पहली प्राइवेट कंपनी भी स्काईरूट ही बनी. इसके तुरंत बाद कंपनी ने डीप-टेक सेक्टर में उस समय का सबसे बड़ा यानी 51 मिलियन डॉलर का फंड जुटाकर सबको हैरान कर दिया.

18 नवंबर 2022, वो ऐतिहासिक तारीख थी. जिसने भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का भूगोल बदल दिया. स्काईरूट ने अपना पहला सबऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-एस' सफलता के साथ लॉन्च किया. इस लॉन्चिंग ने साबित कर दिया कि भारत के प्राइवेट युवाओं में स्पेसएक्स को टक्कर देने का दम है.

धीरुभाई अंबानी को मानते हैं गुरु

पवन कुमार चंदना का मानना है कि बिजनेस करने के लिए आपको किसी बड़े विदेशी कॉलेज की डिग्री की जरूरत नहीं होती, बल्कि आपके फंडामेंटल मजबूत होने चाहिए. वो अक्सर भारत के महान बिजनेसमैन धीरुभाई अंबानी का उदाहरण देते हुए कहते हैं- "धीरूभाई अंबानी बिजनेस के बुनियादी नियमों में बहुत पक्के थे. उन्होंने हार्वर्ड या किसी बड़े विदेशी विश्वविद्यालय से जाकर कोई MBA की डिग्री नहीं ली थी, फिर भी उन्होंने देश का सबसे बड़ा बिजनेस खड़ा किया. सब कुछ आपके बेसिक्स और आपकी सोच पर निर्भर करता है."

जब पवन से पूछा जाता है कि युवाओं के लिए सबसे बेहतरीन करियर विकल्प क्या है, तो वो कहते हैं एंटरप्रेन्योरशिप यानी बिजनेस या स्टार्टअप ही सबसे बेस्ट रास्ता है. उनके मुताबिक यह आपको न सिर्फ काम करने की आजादी और आत्मनिर्भरता देता है, बल्कि आपको अपने देश के निर्माण में सीधे हाथ बंटाने और हजारों लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा करने का मौका भी देता है.

जब पीएम मोदी ने थपथपाई पीठ

पवन कुमार चंदना की इस अद्भुत कामयाबी की गूंज वैश्विक स्तर पर भी सुनाई दी. जब फ्रांस की राजधानी पेरिस में '14वें इंडो-फ्रेंच सीईओ फोरम' का आयोजन हुआ तो भारत की तरफ से दिग्गज उद्योगपतियों के बीच इस युवा वैज्ञानिक को भी जगह मिली. वहां उन्होंने भारत और फ्रांस के बीच स्पेस टेक्नोलॉजी को लेकर भविष्य की संभावनाओं पर खुलकर बात की. इसके बाद आया उनकी जिंदगी का सबसे गौरवशाली क्षण.

इसी साल 7 मई को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद स्काईरूट की नई और भारत की सबसे बड़ी प्राइवेट रॉकेट मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटी का उद्घाटन किया. यह वो आधुनिक फैक्ट्री है जहां अब बड़े पैमाने पर कमर्शियल रॉकेट बनाए जा सकते हैं.

जो सफर साल 2018 में सिर्फ दो पूर्व इसरो इंजीनियरों के दिमाग में एक छोटे से विचार के रूप में शुरू हुआ था, आज वह एक विशाल बरगद का पेड़ बन चुका है. आज स्काईरूट एयरोस्पेस में करीब 1,000 से अधिक लोग काम कर रहे हैं. हाल ही में कंपनी ने सिलिकॉन वैली के मशहूर इन्वेस्टर राम श्रीराम की फर्म 'शेरपालो वेंचर्स' के नेतृत्व में 60 मिलियन डॉलर का एक और बड़ा फंड जुटाया है जो यह दिखाता है कि दुनिया का भरोसा अब इस भारतीय स्टार्टअप पर कितना मजबूत हो चुका है.

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