Exclusive: राम सेतु पर बड़ा खुलासा! चुनावी घोषणापत्रों में 'राष्ट्रीय विरासत', लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में 'शून्य'- RTI में चौंकाने वाला जवाब

Ram Setu RTI revelation: राम सेतु को लेकर RTI में बड़ा खुलासा हुआ है. ASI ने साफ किया है कि इसे 'राष्ट्रीय महत्व का स्मारक' घोषित नहीं किया गया है और सरकारी रिकॉर्ड में इससे जुड़ी कोई आधिकारिक पहचान मौजूद नहीं है. वहीं बीजेपी इसे अपने घोषणापत्र में राष्ट्रीय विरासत बताती रही है. जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी और क्या है सुप्रीम कोर्ट में चल रहा मामला.

Ram Setu RTI revelation
राम सेतु को लेकर हुआ बड़ा खुलासा

अशोक उपाध्याय

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राम सेतु, जिसे करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक और भारत की सांस्कृतिक विरासत माना जाता है, उसे लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. भारतीय जनता पार्टी ने राम सेतु को पिछले कई सालों से अपनी चुनावी घोषणापत्र में शामिल कर इसे राष्ट्रीय विरासत घोषित करने का वादा किया है, लेकिन अगर आज के समय में हकीकत की बात करें तो यह इससे कोसों दूर है. एक विशेष RTI (सूचना का अधिकार) के जवाब में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने साफ कर दिया है कि सरकारी रिकॉर्ड में राम सेतु को लेकर ऐसी कोई आधिकारिक पहचान मौजूद नहीं है. 

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RTI में ASI ने क्या कहा?

इंडिया टुडे में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक RTI के जवाब में ASI के स्मारक अनुभाग (Monument Section) ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि, राम सेतु को 'राष्ट्रीय महत्व के स्मारक' के रूप में संरक्षित नहीं किया गया है. साथ ही ASI हेडक्वार्टर (नई दिल्ली) में इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का कोई प्रस्ताव भी नहीं बचा हुआ है. RTI के तहत मांगी गई अन्य जानकारियों को विभाग ने 'शून्य' (Nil) करार दिया है. यानी राम सेतु फिलहाल केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित स्मारकों की सूची में शामिल नहीं है और न ही फिलहाल ऐसी कोई योजना है.

क्या है राम सेतु का भूगोल और इतिहास?

राम सेतु (जिसे 'एडम्स ब्रिज' के नाम से भी जाना जाता है) भारत के रामेश्वरम और श्रीलंका के मन्नार द्वीप के बीच चूना पत्थर की एक 48 किलोमीटर लंबी श्रृंखला है. यह मन्नार की खाड़ी और पाक जलडमरूमध्य को अलग करने वाली एक कोरल रिज (प्रवाल भित्ति) जैसी संरचना है. रामायण के अनुसार, यह वही पुल है जिसे भगवान राम की वानर सेना ने लंका तक पहुंचने के लिए बनाया था. इसी धार्मिक महत्व के कारण इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग दशकों से उठती रही है.

राजनीति बनाम हकीकत: घोषणापत्रों का वादा

यह खुलासा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की बड़ी राजनीतिक पार्टियां इसे लेकर बड़े वादे करती रही हैं:

भाजपा का 2009 का घोषणापत्र: भारतीय जनता पार्टी ने राम सेतु को 'हमारी राष्ट्रीय विरासत' बताया था. तब इसके धार्मिक महत्व के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा (थोरियम भंडार) के नजरिए से भी इसके संरक्षण की बात कही गई थी.

2014 का घोषणापत्र: पार्टी ने फिर से इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बताया और कहा कि 'सेतुसमुद्रम शिप चैनल प्रोजेक्ट' पर कोई भी फैसला लेते समय इसकी सुरक्षा का ध्यान रखा जाएगा.

संसद में सरकार का पक्ष: 'स्पष्ट कहना मुश्किल'

राम सेतु को लेकर सरकार का रुख संसद में भी चर्चा का विषय रहा है. दिसंबर 2022 में राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा था कि संरचना के सटीक स्वरूप और उत्पत्ति का निर्धारण करने की कुछ सीमाएं हैं. उन्होंने कहा था, 'आसान शब्दों में कहें तो, यह कहना मुश्किल है कि वहां राम सेतु का वास्तविक स्वरूप मौजूद है. हालांकि, कुछ संकेत मिलते हैं कि वहां कोई संरचना हो सकती है.' 

उन्होंने सैटेलाइट डेटा का हवाला देते हुए बताया कि चूना पत्थर के जमाव और द्वीप जैसी आकृतियां समुद्र में एक निरंतरता दिखाती हैं, लेकिन यह 18,000 साल पुराने मानव निर्मित पुल होने का ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं देतीं.

अब सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं निगाहें

राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की लड़ाई अब देश की सबसे बड़ी अदालत में है. सुब्रमण्यम स्वामी ने इस संबंध में एक याचिका दायर की है, जिस पर 29 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. स्वामी की मांग है कि राम सेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने पर एक समयबद्ध (time-bound) निर्णय लिया जाए. बता दें कि साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट के काम पर रोक लगा दी थी और यह मामला अब भी लंबित है.

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