कौन हैं सौरव दास? रिपोर्टिंग से शुरू हुआ सफर, अब छात्र आंदोलन के बने चर्चित चेहरे, जानिए उनकी पूरी कहानी

रूपक प्रियदर्शी

• 11:57 AM • 22 Jul 2026

Saurav Das Biography: दिल्ली में नीट परीक्षा में कथित धांधली और पेपर लीक के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के बीच सौरव दास सबसे चर्चित चेहरा बनकर उभरे हैं. खोजी पत्रकार से CJP के मुख्य प्रवक्ता तक उनका सफर, आंदोलन में भूमिका और विवादों से जुड़ी पूरी कहानी जानिए इस विशेष रिपोर्ट में.

कौन हैं सौरव दास?
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Saurav Das Cockroach Janata Party: दिल्ली में नीट परीक्षा में धांधली और पेपर लीक के खिलाफ चल रहे छात्र आंदोलन के बीच सौरव दास का नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में है. खोजी पत्रकार से 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के मुख्य प्रवक्ता बने सौरव दास आज इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा माने जा रहे हैं. जंतर-मंतर से संसद तक पहुंची इस मुहिम में उनकी सक्रिय भूमिका, सरकार के साथ हुई बातचीत, तीखे बयान और आंदोलन की रणनीति ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है. पत्रकारिता से जनआंदोलन तक उनका सफर कैसे शुरू हुआ, CJP से उनका जुड़ाव कैसे हुआ और आखिर क्यों आज हर तरफ उनकी चर्चा हो रही है? आइए विस्तार से जानते हैं, आखिर कौन हैं सौरव दास.

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पत्रकारिता से जनांदोलन तक का सफर

सौरव दास पेशे से एक Investigative Journalist हैं. जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएट होने के बाद 2020 से लिख रहे हैं. सत्ता की जवाबदेही, न्यायिक पारदर्शिता और जन-सरोकार के मुद्दों पर अपनी बेबाक रिपोर्टिंग से अपनी पहचान बनाई. एक मिडिल क्लास फैमिली बैकग्राउंड से आने वाले सौरव ने हमेशा अपनी धारदार कलम और कानूनी रिसर्च से बड़े-बड़े मामलों का खुलासा किया है. ऐसा नहीं है कि सौरव दास अचानक ट्रेनी बनकर किसी आंदोलन से जुड़े. आंदोलन का पहला एक्सपीरियंस तब लिया जब उन्होंने नवंबर 2025 में इंडिया गेट पर दिल्ली के प्रदूषण के खिलाफ एक बड़े नागरिक आंदोलन का भी नेतृत्व किया था.

शिक्षा और विचार: 'जो हमारे भीतर जीते-जी मर जाता है'

सौरव दास ओडिशा के रहने वाले हैं. शुरुआती पढ़ाई ओडिशा में करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन लेकर लॉ की पढ़ाई की. सौरव दास के एक्स हैंडल पर उनके बायो में अमेरिकी लेखक नॉर्मन कज़िन्स का एक कोट लिखा है.  डेथ इज नॉट द ग्रेटेस्ट लॉस इन लाइफ़. द ग्रेटेस्ट लॉस इज व्हाट डाइज इनसाइड अस व्हाइल वी लिव यानी जीवन में सबसे बड़ा नुक़सान मृत्यु नहीं है. सबसे बड़ा नुकसान वह है जो हमारे भीतर जीते-जी मर जाता है. सौरव दास को अपने भीतर कुछ तो दिखता है जिसे वो मरने नहीं देना चाहते इसलिए कॉकरोच आंदोलन से जुड़े और सरकार की नजरों में चुभ रहे होंगे.

RTI से कारवां मैग्जीन तक: सिस्टम की पोल खोलती रिपोर्टिंग

लॉ की डिग्री लेने के बाद सौरव दास ने कोर्ट रूम में प्रैक्टिस करने के बजाय सिस्टम की कमियों को उजागर करने के लिए पत्रकारिता की राह चुनी. देश के एक्टिव RTI एक्टिविस्ट और स्वतंत्र खोजी पत्रकार के तौर पर अपना करियर बनाया. उन्होंने गृह मंत्रालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ढेर सारी RTI अर्जियां दाखिल करके सरकार की नीतियों और न्यायिक सिस्टम की पोल खोलने वाले दावे किया. 2017 में, उन्होंने जनहित से जुड़े मामलों से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेज़ प्राप्त करने के लिए सूचना के अधिकार (RTI) का उपयोग करना शुरू किया था. करियर को सबसे बड़ा मुकाम मिला द कारवां मैग्जीन से, जहां उन्होंने Investigative Journalist के तौर पर काम करना शुरू किया. कारवां में रहते हुए उन्होंने सत्ता के गलियारों, नौकरशाही और जजों की वर्किंग स्टाइल पर एक के बाद एक कई बड़ी ग्राउंड रिपोर्ट्स और कवर स्टोरीज लिखीं, जिसने दिल्ली की सत्ता और न्यायिक व्यवस्था दोनों को हिलाकर रख दिया.

पूर्व CJI चंद्रचूड़ पर 16 हजार शब्दों की बहुचर्चित रिपोर्ट

सौरव दास और देश के पूर्व चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ के बीच का किस्सा किसी सस्पेंस थ्रिलर से कम नहीं है . पत्रकारिता और कानूनी गलियारों में ये बात बेहद मशहूर है कि द कारवां मैग्जीन के लिए कवर स्टोरी लिखते वक्त सौरव दास ने पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डी वाई चंद्रचूड़ को इंटरव्यू के लिए अपरोच किया. क्वेशनायर भी भेजा था. इंटरव्यू का समय मांगा था लेकिन चंद्रचूड़ ने सौरव दास को इंटरव्यू नहीं दिया. कैमरा और माइक न मिलने के बावजूद सौरव दास पीछे नहीं हटे. उन्होंने इंटरव्यू की जगह एक ऐसी ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन शुरू की जिसने भारतीय न्यायपालिका की परतों को खोलकर रख दिया.

बेबाक पड़ताल और तीखे सवाल

इंटरव्यू रिजेक्ट होने के बाद सौरव दास ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के 40 से ज्यादा मौजूदा और रिटायर्ड जजों, वकीलों और चंद्रचूड़ के पुराने करीबियों से खुफिया और ऑफ-द-रिकॉर्ड बातचीत की. महीनों की इस कड़ी रिसर्च के बाद सौरव ने 16,000 शब्दों की प्रोफाइल रिपोर्ट लिखी, जिसका टाइटल था रिपोर्ट ने देश में तहलका मचा दिया. सौरव दास ने दावा किया किया कि कैसे जस्टिस चंद्रचूड़ मंचों और भाषणों में तो बड़ी-बड़ी प्रगतिशील और लोकतांत्रिक बातें करते थे, लेकिन जब असल में सरकार को कटघरे में खड़ा करने या कड़े फैसले लेने का वक्त आता था, तो उनके कदम पीछे खिंच जाते थे. सौरव दास ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उनके घर गणेश पूजा पर आने और उमर खालिद की बेल पिटीशन को जानबूझकर बेंच बदलने जैसे कई गंभीर मुद्दों को जनता के सामने रखा. इसी निर्भीक और खोजी बैकग्राउंड की वजह से जब सौरव दास कॉकरोच जनता पार्टी का चेहरा बन गए. आज देश का बड़ा हिस्सा उनके पीछे उठ खड़ा हुआ है.

CJI का बयान और 'कॉकरोच आंदोलन' का जन्म

मई में जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने बेरोजगारी और सिस्टम के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे युवाओं और कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर पैरासाइट और कॉकरोच कहा, तो युवाओं का गुस्सा भड़क उठा. कोर्ट रूम से निकले इन दो शब्दों कॉकरोच और पैरासाइट ने देश के बेरोजगार और संघर्ष कर रहे युवाओं के आत्मसम्मान पर गहरी चोट की. हालांकि, चौतरफा घिरने के बाद सीजेआई ने सफाई दी लेकिन तब तक तीर कमान से छूट चुका था. चीफ जस्टिस के मुंह से निकला शब्द आज बीजेपी और सरकार के गले में फंसे हैं. न उगल सकते हैं, न निकल सकते हैं.

अभिजीत दिपके की पहल और सीजेपी में सौरव दास की एंट्री

इस गुस्से को एक संगठित आंदोलन का रूप दिया पॉलिटिकल कम्यूनिकेशन स्ट्रैटेजिस्ट अभिजीत दिपके ने, जिन्होंने 16 मई को कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP नाम के एक सटायरिकल मूवमेंट की बुनियाद रखी. अभिजीत दिपके को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो मीडिया के कैमरों के सामने और सरकारी बैठकों में युवाओं का पक्ष मजबूती और तार्किकता से रख सके. जून की शुरुआत में दिपके ने सौरव दास की प्रतिभा, निर्भीकता और खोजी पत्रकारिता के उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें सीजेपी का मुख्य प्रवक्ता यानी Chief Spokesperson बनाया. यहीं से एंट्री होती है खोजी पत्रकार और सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास की. कॉकरोच जनता पार्टी' के जन्म और देश के इस सबसे बड़े छात्र आंदोलन के पीछे डिजिटल दुनिया की एक बेहद दिलचस्प इनसाइड स्टोरी है. आंदोलन के दोनों बड़े चेहरे अभिजीत दिपके और सौरव दास एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से बहुत जानते नहीं थे. बस सोशल मीडिया के जरिए जानते थे.

एक ट्वीट जिसने इंटरनेट पर ला दिया सैलाब

आपसी सम्मान और कनेक्शन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट तब आया जब जब चीफ जस्टिस के विवादित बयान के तुरंत बाद अभिजीत दिपके ने इंटरनेट पर एक गेम-चेंजर ट्वीट किया "क्या होगा अगर देश के सारे कॉकरोच एक हो जाएं?" दिपके का यह ट्वीट देखते ही देखते वायरल हो गया और उन्होंने तुरंत सीजेपी की डिजिटल मेंबरशिप फॉर्म की लिंक जारी कर दी. इसके बाद दिपके ने सीधे ट्विटर पर सौरव दास से संपर्क कर इस मुहिम को आगे बढ़ाने की अपील की. जैसे ही खोजी पत्रकार सौरव दास ने इस डिजिटल फॉर्म को 'कोट-ट्वीट' (Quote Tweet) किया, इंटरनेट पर मानों सैलाब आ गया और महज कुछ ही दिनों में लाखों युवाओं ने खुद को 'कॉकरोच' मानकर इस इंकलाब का रजिस्ट्रेशन करा लिया, जिसने आगे चलकर सीधे जेपी नड्डा के दरवाजे तक दस्तक दे दी

वैचारिक बैकग्राउंड और विवाद: आलोचक बनाम समर्थक

छात्र प्रवक्ता के रूप में सौरव दास का चेहरा सोशल मीडिया पर जितना लोकप्रिय है, उतना ही उनके कुछ पुराने राजनीतिक रुख को लेकर चर्चाओं में भी रहता है. इंटरनेट पर उनके कुछ पुराने सोशल मीडिया पोस्ट्स अक्सर सुर्खियों में रहते हैं, जिनमें उन्होंने दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद को 'सबसे बहादुर' बताते हुए उनके प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया था. इस वैचारिक बैकग्राउंड के कारण आलोचक उन्हें लेफ्ट एक्टिविस्ट भी मानते हैं जबकि उनके समर्थक और सीजेपी के फाउंडर अभिजीत दिपके का मानना है कि सौरव का यह स्टैंड नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberties) और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति उनकी गहरी निष्ठा को दिखाता है, जिसने आज इस आंदोलन को इतनी निर्भीक आवाज दी है.

सटायर से सत्ता को चुनौती और सोनम वांगचुक का साथ

कॉकरोच जनता पार्टी कभी इतना बड़ा आंदोलन बन जाएगा, इसकी कल्पना शायद दिपके या उनकी टीम ने भी नहीं की होगी. आंदोलन की सबसे अनोखी कहानी है कि युवाओं ने इस अपमान का जवाब पत्थरों या हिंसा से नहीं, बल्कि बेहद अनोखे और धारदार 'पॉलिटिकल सटायर' से दिया. कॉकरोच जनता पार्टी के इस आंदोलन को सबसे बड़ा बूस्ट तब मिला, जब देश के जाने-माने सोनम वांगचुक नीट परीक्षा पीड़ितों और छात्रों के समर्थन में 28 जून से जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठ गए. वांगचुक के इस कदम ने आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में ला दिया. करीब 20 दिनों के अनशन के बाद वांगचुक अस्पताल में जबरन भर्ती किए गए. अभिजीत दिपके ने अनशन छोड़ा लेकिन जंतर मंतर नहीं छोड़ा.

जेपी नड्डा से मुलाकात और आंदोलन की भावी रणनीति

तब कॉकरोच को ऐसे चेहरे की जरूरत थी जो जेपी नड्डा जैसे सीनियर मंत्री से बात कर सके. विकल्पों की तलाश सौरव दास पर जाकर रूकी. सौरव दास और एक कॉकरोच साथी आशुतोष रांका के साथ जेपी नड्डा के घर पहुंचे. जहां दो घंटे के इंतजार के बाद उनकी 10 मिनट की मुलाकात हुई और उन्होंने सरकार के सामने अपनी मांगें रखीं. वांगचुक के अस्पताल जाने और जेपी नड्डा से कॉकरोच की मुलाकात के बाद ये इम्प्रेशन बनना शुरू हुआ कि आंदोलन बस खत्म हो ही गया लेकिन सौरव दास ने मुलाकात के बाद डंके की चोट पर एलान कर दिया कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, आंदोलन थमेगा नहीं. 24 घंटे में बड़ी चीज ये हुआ कि पीएम मोदी ने पेपर लीक के मुद्दे को पहली बार छुआ. एनडीए की बैठक में घोर पाप का नाम दिया.