सीहोर के सेठ परिवार और ब्रिटिश हुकूमत के बीच का 109 साल पुराना वित्तीय विवाद एक बेहद दिलचस्प और पेचीदा मोड़ पर आ गया है. प्रथम विश्व युद्ध के दौर यानी साल 1917 में ब्रिटिश राज को दिए गए 35 हजार रुपये के कर्ज और उसके भुगतान को लेकर छिड़ी इस कानूनी जंग में नया अपडेट सामने आया है. यूके डेट मैनेजमेंट ऑफिस द्वारा इस कर्ज का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड न मिलने की बात कहते हुए जिम्मेदारी से साफ इनकार कर दिया गया है. ब्रिटिश सरकार के इस रुख से असंतुष्ट रूठिया परिवार ने अब इस मामले को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाने तथा नए कानूनी कदम उठाने का ऐलान किया है.
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1917 में दिया गया था 35 हजार रुपये का कर्ज
यह पूरा मामला साल 1917 का है, जब सीहोर के सेठ जुम्मालाल रूठिया ने प्रशासनिक व्यवस्था के लिए ब्रिटिश सरकार को 35 हजार रुपये का कर्ज दिया था. परिवार का दावा है कि इस मूलधन और ब्याज का भुगतान आज तक नहीं किया गया है. अपने पुरखों के इस हक के लिए परिवार ने ब्रिटिश सरकार को कानूनी नोटिस भेजा था.
इसके जवाब में यूके डेट मैनेजमेंट ऑफिस ने 16 अक्टूबर को यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उनके पास ऐसा कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है. हालांकि, यूके सरकार के इस इनकार से रूठिया परिवार बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं है. परिवार का कहना है कि ब्रिटिश सरकार का यह जवाब पूरी तरह से निराशाजनक है. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए परिजन विनय रूठिया ने नाराजगी जताई है
ठोस सबूत जुटा रहा है रूठिया परिवार
फिलहाल 109 साल पुराने इस ऐतिहासिक कर्ज विवाद ने एक रोमांचक मोड़ ले लिया है. एक तरफ जहां यूके डेट मैनेजमेंट ऑफिस ने दस्तावेजों का अभाव बताकर पल्ला झाड़ लिया है, वहीं सीहोर का रूठिया परिवार अपने दावों को लेकर पूरी तरह अडिग है.परिवार ने साफ कर दिया है कि वे केवल एक नोटिस भेजकर रुकने वाले नहीं हैं, बल्कि वे ब्रिटिश हुकूमत के दौर के और अधिक ठोस सबूत और ऐतिहासिक रिकॉर्ड खंगाल रहे हैं. जरूरत पड़ने पर वे ब्रिटिश पक्ष को दोबारा कानूनी नोटिस भेजेंगे और अपने पुरखों के इस हक की लड़ाई को अंत तक लड़ेंगे.
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