Charchit Chehra: कांग्रेस छोड़ BJP में बने स्टार, अब इस्तीफा देकर किया सरप्राइज... कौन हैं शहजाद पूनावाला, जो एंटी राहुल होकर भी पार्टी में नहीं टिक पाए? जानिए पूरी कहानी

रूपक प्रियदर्शी

• 12:19 PM • 01 Aug 2026

Shehzad Poonawalla News: बीजेपी के सबसे चर्चित राष्ट्रीय प्रवक्ताओं में शामिल शहजाद पूनावाला ने अचानक पद छोड़कर सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है. कांग्रेस से बगावत, मोदी के करीबी चेहरे बनने, भाई तहसीन से रिश्ते टूटने और बदले हुए सोशल मीडिया बायो तक, जानिए उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा और इस्तीफे के पीछे उठ रहे बड़े सवाल.

शहजाद पूनावाला के प्रवक्ता पद से इस्तीफे ने बढ़ाया सियासी सस्पेंस
शहजाद पूनावाला के प्रवक्ता पद से इस्तीफे ने बढ़ाया सियासी सस्पेंस
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Shehzad Poonawalla Resignation: बीजेपी के सबसे आक्रामक और चर्चित चेहरों में से एक, राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने अचानक पार्टी के प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया है. 31 जुलाई की सुबह, शहजाद ने X के बायो से 'बीजेपी नेशनल स्पोक्सपर्सन' का टैग हटा दिया. उन्होंने अपने नए बायो में खुद को "धर्म से इस्लाम, संस्कृति से हिंदू और विचारधारा से भारतीय" बताया है, साथ ही पीएम नरेंद्र मोदी का 'लाइफलांग फॉलोअर' भी लिखा है. कहा तो जा रहा है कि व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए उन्होंने बीजेपी को इस्तीफा सौंपा है. अब आगे क्या करेंगे, इसी का इंतजार है. हालांकि अभी तक बीजेपी की तरफ से या खुद शहजाद की तरफ से ऑन-कैमरा कोई बयान या प्रेस रिलीज जारी नहीं हुई है.

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कांग्रेस में करियर की शुरुआत और राहुल गांधी से बगावत

शहजाद पूनावाला भी देश के उन्हीं नेताओं में से हैं जिन्होंने कांग्रेस से राजनीति ज्वाइन की. राहुल गांधी की लीडरशिप में काम करने की ढेर सारी कसमें खाईं. जब 2014 से बीजेपी छाने लगी तो कांग्रेस, राहुल गांधी बहुत पीछे छोड़कर चल दिए. 2017 तक शहजाद पूनावाला पक्के कांग्रेसी रहे. इतने कि कांग्रेस अध्यक्ष बनने का ख्वाब देखने लगे. जब राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने की बात आई तो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ने की ठान कर सीधे उन्हीं को चुनौती दी. उन्होंने राहुल गांधी को चुनौती दी कि वे पहले अपने पद से इस्तीफा दें और एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह चुनाव लड़ें. कांग्रेस ने इसे अनुशासनहीनता माना और शहजाद को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. उनके मनमुताबिक चीजें नहीं हुईं तो उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनावों को 'धांधली' बताकर राहुल गांधी के खिलाफ खुली बगावत कर दी और चले गए बीजेपी.

पीएम मोदी की तारीफ और बीजेपी में एंट्री

कांग्रेस छोड़ने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात चुनाव की एक जनसभा में शहजाद की हिम्मत की खुलकर तारीफ की थी, जिसके बाद वो भाजपाई बन गए. तब से लगातार बीजेपी के मीडिया फेस बनकर राहुल गांधी के खिलाफ कैंपेन चलाते रहे. अब अचानक न जाने क्या हुआ कि बीजेपी से नाता तोड़ लिया. न जाने क्यों एंटी राहुल फेस बनकर भी क्यों बीजेपी में सरवाइव नहीं कर पाए शहजाद पूनावाला? शहजाद पूनावाला के अचानक इस्तीफे की खबरों ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है.

बीजेपी में 9 साल का सफर और बढ़ता कद

पिछले 12-15 सालों में बीजेपी इतनी बड़ी हो गई कि उसे कतई शहजाद पूनावाला की जरूरत नहीं है. ऐसे ढेरों पड़े थे लेकिन शहजाद ने पिछले 9 साल में न केवल पार्टी में जगह बनाई बल्कि पार्टी के नेशनल मीडिया फेस बने. 2017 में बीजेपी में आए. कुछ साल ऐसे ही बैठे रहे. 2021 से उनका कद बढ़ना शुरू हुआ. पार्टी ने शहजाद को दिल्ली बीजेपी के आईटी (IT) और सोशल मीडिया सेल का इंचार्ज बना दिया. टीवी डिबेट्स में पीएम मोदी के लिए जोरदार डिफेंस और राहुल गांधी पर जोरदार अटैक की काबिलियत की बदौलत एक दिन ऐसा भी आया कि पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता बन गए. या तो वो एक जैसा काम करते हुए बोर होने लगे या लाइन से भड़कने लगे या कुछ पाने की हसरत जागने लगी, इन सबका जवाब शहजाद ही दे सकते हैं लेकिन अब सच ये है कि करीब 7-8 साल तक बीजेपी के सबसे फ्रंट फेस रहने के बाद उनका नाता टूट रहा है.

'राष्ट्रवादी मुस्लिम' की पहचान और बीजेपी की रणनीति

प्रवक्ताओं में शामिल होना उनकी एक खास राजनीतिक समझ और रणनीति का हिस्सा रहा है. शहजाद पूनावाला ने पारंपरिक 'मुस्लिम राजनीति' की लकीर को छोड़कर 'राष्ट्रवादी मुस्लिम' की एक नई पहचान बनाई. यही वजह रही कि दक्षिणपंथी (Right-Wing) विचारधारा वाली बीजेपी में भी वे न सिर्फ टिके रहे, बल्कि स्टार परफॉर्मर बने रहे. शहजाद पूनावाला का मुसलमान होकर भी भारतीय जनता पार्टी (BJP) में न सिर्फ टिकना, बल्कि पार्टी के शीर्ष और सबसे चहेते चेहरों में शामिल होना चर्चा का विषय रहा. शहजाद पूनावाला ने बीजेपी की 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' (Cultural Nationalism) की पिच को पूरी तरह अपना लिया था. वह खुलकर कहते रहे कि मेरा मजहब इस्लाम है, लेकिन मेरी संस्कृति हिंदू है और मेरी विचारधारा भारतीय है. शहजाद पूनावाला मुस्लिम समुदाय के 'शिया आगा खानी' (और पसमांदा) वर्ग से आते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में पसमांदा और शिया मुसलमानों को अपने पाले में लाने के लिए विशेष आउटरीच प्रोग्राम चलाए हैं. शहजाद इस नीति के लिए बीजेपी का सबसे बड़ा और पढ़ा-लिखा चेहरा बन गए.

डिबेट्स में फायरब्रांड शैली और राइट-विंग में लोकप्रियता

टीवी डिबेट्स में शहजाद पूनावाला कभी भी 'मुस्लिम विक्टिमहुड' (मजहबी लाचारी) का कार्ड नहीं खेलते थे, बल्कि वे कट्टरपंथ और तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ सबसे आक्रामक आवाज बनते थे. शरिया अदालतों, हिजाब विवाद, या कट्टरपंथी बयानों पर वे बीजेपी की लाइन पर रहकर विपक्षी प्रवक्ताओं को उन्हीं के जाल में फंसा देते थे. इस 'फायरब्रांड' शैली के कारण बीजेपी समर्थकों (राइट-विंग) के बीच वे बेहद लोकप्रिय हो गए और उन्हें कभी "बाहरी" या "गैर-मजहबी" नहीं माना गया.

पुणे से वकालत तक: शहजाद पूनावाला की शुरुआती जिंदगी

शहजाद पूनावाला का जन्म महाराष्ट्र के पुणे में 'आगा खानी मुस्लिम' परिवार में हुआ था. बचपन में ही पिता सरफराज पूनावाला का साया सिर से उठ जाने के बाद, मां यासमीन पूनावाला ने शहजाद और उनके बड़े भाई तहसीन पूनावाला की परवरिश की. शहजाद पूनावाला पेशे से एक वकील (Lawyer) हैं. उन्होंने पुणे यूनिवर्सिटी से कानून (LLB) की पढ़ाई की है. 'एमआईटी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट' (MIT-SOG), पुणे से राजनीति और गवर्नेंस का कोर्स भी किया है. महज 15 से 20 साल की उम्र में ही उनकी दिलचस्पी देश की सियासत में जाग चुकी थी. साल 2008 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी के साथ अपने राजनीतिक करियर की औपचारिक शुरुआत की और बहुत कम समय में अपनी जुनून के दम पर महाराष्ट्र कांग्रेस के सचिव पद तक पहुंच गए.

गांधी-वाड्रा परिवार से पारिवारिक कनेक्शन

पूनावाला परिवार का कांग्रेस के 'प्रथम परिवार' यानी गांधी-वाड्रा परिवार से बेहद करीबी और सीधा रिश्ता है. शहजाद के बड़े भाई तहसीन पूनावाला की शादी साल 2016 में मोनिका वाड्रा से हुई थी. मोनिका वाड्रा, प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा की सगे चचेरी बहन (कजिन) हैं. इस हाई-प्रोफाइल शादी में खुद सोनिया गांधी और राहुल गांधी भी शामिल हुए थे. इस पारिवारिक रिश्ते के कारण पूनावाला भाइयों की कांग्रेस हाईकमान और राहुल गांधी के दफ्तर तक सीधी पहुंच थी, जिससे पार्टी के कई वरिष्ठ नेता भी हैरान रहते थे.

सगे भाई तहसीन पूनावाला से बिगड़े संबंध

शहजाद और तहसीन पूनावाला राजनीति के दो चर्चित भाई हैं. एक जमाने में दोनों भाई राहुल-राहुल किया करते थे. फिर शहजाद बीजेपी गए तो तहसीन अकेले पड़ गए. बचपन से एक साथ जवां हुए तहसीन और शहजाद के रिश्ते भी कांग्रेस-बीजेपी के चक्कर में खराब हुए. जब शहजाद ने राहुल गांधी के खिलाफ बगावत की तो आग उनके घर में ही लगी. सगे बड़े भाई तहसीन पूनावाला, जो खुद पॉलिटिकल कमेंटेटर हैं, कांग्रेस-राहुल समर्थक हैं और आजकल E-20 को लेकर सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे हैं, शहजाद की बगावत से बुरी तरह आहत हुए. तहसीन ने सार्वजनिक रूप से बयान जारी कर शहजाद से अपने सारे पारिवारिक और आधिकारिक रिश्ते हमेशा के लिए तोड़ लिए. तहसीन का कहना था कि वे राहुल गांधी के प्रति वफादार हैं और शहजाद ने पीठ में छुरा घोंपा है, जबकि उन्होंने शहजाद को बेटे की तरह पाला था. तब से दोनों भाइयों के बीच बातचीत पूरी तरह बंद है. तहसीन ने कुछ दिन पहले न्यूज तक के मंच पर भी साफ किया था कि शहजाद से कोई संबंध नहीं है और अब हमारी बातचीत नहीं होती.

बचपन के क्रिकेट की कहानी और सियासत का सच

शहजाद अपने भाई तहसीन से 6 साल छोटे हैं. बचपन में जब दोनों पुणे में क्रिकेट खेलते थे, तो बड़े भाई होने के नाते तहसीन हमेशा पहले बल्लेबाजी करते थे. जैसे ही तहसीन आउट होते, वह गुस्से में अपना बैट लेकर घर भाग जाते थे और छोटे भाई शहजाद को सिर्फ फील्डिंग ही करनी पड़ती थी. बचपन की यह छोटी सी नोकझोंक आज दोनों की ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच बन चुकी है—एक भाई (तहसीन) आज भी कांग्रेस की तरफ से बैटिंग कर रहा है, जबकि दूसरे भाई (शहजाद) को बीजेपी में आकर पूरी फील्डिंग संभालनी पड़ी, लेकिन उसने ये काम भी छोड़ दिया.

पिता के जाने के बाद तहसीन ने निभाया था पिता का फर्ज

शहजाद जब महज 5 साल के थे, तब उनके पिता सरफराज पूनावाला का अचानक निधन हो गया था. उस वक्त तहसीन सिर्फ 11-12 साल के थे. पिता के जाने के बाद मां यासमीन ने दोनों को पाला, लेकिन तहसीन ने बहुत छोटी उम्र में ही शहजाद के लिए एक पिता की भूमिका निभाना शुरू कर दिया था. शहजाद की पढ़ाई, उनके वकालत के करियर की फीस और दिल्ली में उनका शुरुआती खर्च उठाने में तहसीन ने अपने पिता की तरह जिम्मेदारी निभाई. तहसीन आज भी रो पड़ते हैं जब वह याद करते हैं कि उन्होंने शहजाद को छोटे भाई की तरह नहीं, बल्कि अपने बेटे की तरह बड़ा किया था.

7 सालों के सन्नाटे में एक इकलौता मैसेज

इन 7 सालों के लंबे सन्नाटे के बीच सिर्फ एक रात ऐसी आई थी जब दोनों का खून एक दूसरे की तरफ खिंचा चला आया. जब तहसीन पूनावाला के बेटे 'ज़ुर्वाण' का जन्म हुआ, तब शहजाद अपनी कड़वाहट भूल गए और उन्होंने बड़े भाई तहसीन को बधाई का संदेश भेजा था. इन 7 सालों में दोनों भाइयों के बीच एक्सचेंज हुआ यह इकलौता और आखिरी मैसेज था.

"पिछले कर्मों का कर्ज": तहसीन पूनावाला का छलका दर्द

अक्सर लोग सोचते हैं कि दोनों भाइयों के बीच का यह झगड़ा सिर्फ राजनीतिक पब्लिसिटी स्टंट है, लेकिन तहसीन पूनावाला ने हाल ही में एक पॉडकास्ट में इसे अपनी ज़िंदगी का सबसे गहरा घाव बताया. तहसीन ने कहा, "शहजाद से अलग होना मेरे इस जन्म का कोई 'कार्मिक डेब्ट' (पिछले कर्मों का कर्ज) है, जिसे मुझे चुकाना ही था. मुझे आज भी बहुत दर्द होता है कि हम बात नहीं करते. शहजाद के कांग्रेस छोड़ने की अपनी वजहें थीं और मैं उन वजहों को समझता भी हूँ, लेकिन जिस तरह से उन्होंने गांधी परिवार पर व्यक्तिगत हमले किए, उसे मैं कभी स्वीकार नहीं कर पाया."

कांग्रेस से बीजेपी तक: 'राम भक्त' की नई छवि

बीजेपी में आने के बाद शहजाद पूनावाला ने अपनी छवि को पूरी तरह से बदल दिया. कांग्रेस में रहते हुए जहां वह प्रियंका गांधी और रॉबर्ट वाड्रा के बेहद करीब थे, वहीं बीजेपी में आकर वह कट्टर 'राम भक्त' के रूप में उभरे. उन्होंने बाकायदा एक किताब भी लिखी जिसका नाम है "GST की यात्रा", जिसका जिक्र उन्होंने हाल ही में अपने बदले हुए सोशल मीडिया बायो में भी किया है. टीवी डिबेट के दौरान एक बार खुद शहजाद ने कहा था कि उन्हें अपनी पुरानी राजनीतिक विचारधारा को पीछे छोड़ने में समय जरूर लगा, लेकिन उन्होंने राष्ट्रवाद की राह चुनी, भले ही इसके लिए उन्हें अपने सगे भाई को खोना पड़ा.

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