Breaking News: SIR जारी रहेगा या रुकेगा?...सुप्रीम कोर्ट ने सुना दिया बड़ा फैसला, जानिए कोर्ट ने क्या-क्या कहा

SIR Supreme Court Decision: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की शक्तियों और SIR की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपना बड़ा फैसला सुना दिया है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले में निर्णय दिया है जिसके बाद इस पूरी प्रक्रिया पर स्थिति साफ हो गई है.

SIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
SIR पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

न्यूज तक डेस्क

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Supreme Court Verdict on SIR: सुप्रीम कोर्ट ने आज SIR की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई महत्वपूर्ण याचिकाओं पर अपना अहम फैसला सुना दिया है. यह पूरा मामला चुनाव आयोग की शक्तियों और उसके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा हुआ था. इस बड़े मामले पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनाई कर रही है. कोर्ट याचिका की सुनाई के दौरान कहा कि SIR करना चुनाव आयोग का अधिकार है. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने SIR की प्रक्रिया को हरी झंडी दे दी है और निर्वाचन आयोग के अभियान को सही बताया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है. इसके फैसले के बाद अब देशभर में SIR का काम चलता रहेगा. 

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR की प्रक्रिया में पूरे नियमों का पालन हुआ है. SIR चुनाव आयोग का अधिकार है. चुनाव आयोग SIR करा सकता है. उसकी शक्तियां बरकरार हैं. SIR की प्रक्रिया में कोई खामी नहीं है.

आपको बता दें कि अदालत को इस मामले में मुख्य रूप से यह तय करना था कि चुनाव आयोग को भारत के संविधान के अनुच्छेद 326, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 और उससे जुड़े नियमों के तहत मौजूदा स्वरूप में SIR कराने का कानूनी और संवैधानिक अधिकार है या नहीं.

नाम हटाने की कार्रवाई तय नियमों के तहत हुई- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने का कोई रोक नहीं लगाई जा सकती. अदालत ने माना कि चुनाव आयोग ने यह प्रक्रिया अपने संवैधानिक अधिकारों के दायरे में रहकर लागू की है. कोर्ट के अनुसार, वोटर लिस्ट से नाम हटाने की कार्रवाई तय नियमों के तहत की गई और प्रभावित लोगों को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने का अवसर भी दिया गया. अदालत ने कहा कि कौन से दस्तावेज मान्य होंगे, इसका निर्णय लेने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है. कोर्ट के निर्देश के बाद आधार कार्ड को भी दस्तावेजों की सूची में शामिल किया गया और इस व्यवस्था को मनमाना नहीं माना जा सकता.

हटाए गए नामों को लेकर ये दिया निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि SIR प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग ने किसी व्यक्ति की नागरिकता तय नहीं की, बल्कि केवल यह जांच की कि वो व्यक्ति वोटर लिस्ट में शामिल होने के योग्य है या नहीं. अदालत ने कहा कि SIR के जरिए न तो किसी को नागरिकता दी जाती है और न ही छीनी जाती है. कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन लोगों के नाम गैर-नागरिक होने के संदेह में हटाए गए हैं, उनके मामलों को चार सप्ताह के भीतर गृह मंत्रालय और विदेशी न्यायाधिकरण जैसी संबंधित एजेंसियों को भेजा जाए, ताकि नागरिकता पर अंतिम निर्णय वही संस्थाएं लें.

अदालत ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR प्रक्रिया चुनाव आयोग की संवैधानिक शक्तियों के भीतर आती है और यह अनुपातिकता (Proportionality) के सिद्धांत के अनुरूप है. कोर्ट ने माना कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं और इसे शुरू करने के लिए चुनाव आयोग के पास उचित व वैध आधार थे.

चुनाव आयोग को लेकर कही ये बात

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि नागरिकता से जुड़ी जांच केवल मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने या हटाने के सीमित उद्देश्य तक ही की जा सकती है. अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग ने भी केवल इसी सीमित प्रश्न पर विचार किया है और ऐसी किसी भी जांच को कानून की तय सीमाओं के भीतर ही रहना होगा. कोर्ट के मुताबिक, यह आकलन उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा. साथ ही अदालत ने माना कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची में नाम शामिल करने से इनकार करने का अधिकार है, लेकिन ऐसी कार्रवाई को नागरिकता तय करने की प्रक्रिया नहीं माना जा सकता.

जनवरी में पूरी हुई थी सुनवाई

SIR मामले को लेकर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से हलचल बनी हुई थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बीते 29 जनवरी को सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसके बाद से ही पूरे देश की नजरें इस निर्णय पर टिकी थीं. इस बीच अदालत ने SIR प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, जिसके चलते बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह प्रक्रिया पूरी भी हो चुकी है, जबकि उत्तर प्रदेश, गुजरात और राजस्थान समेत कई राज्यों में अब भी जारी है.

दरअसल, जून 2025 में बिहार में SIR लागू होने के बाद इसको लेकर सबसे ज्यादा याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई थीं, जिनमें चुनाव आयोग के अधिकारों और प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई थी. इस मामले में अदालत का दरवाजा खटखटाने वालों में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा, मनोज झा, केसी वेणुगोपाल और सुप्रिया सुले समेत कई बड़े नेता और संगठन शामिल थे, जिन्होंने SIR प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए थे.

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