देश के कई राज्यों में स्वाइन फ्लू (H1N1) के मामलों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है. दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों से स्वाइन फ्लू के मामले सामने आ रहे हैं. मामलों के बढ़ने से आम लोगों के मन में डर और भ्रम का माहौल है कि इससे कैसे बचा जाए और इसका सही इलाज क्या है. इसी बीच डॉक्टर रवि गोडसे ने बताया है कि, "स्वाइन फ्लू को लेकर घबराने या पैनिक होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह कोई नया पेंडमिक (महामारी) रूप नहीं ले रहा है और इसका म्यूटेशन भी नहीं हुआ है. इसके इलाज के लिए कारगर दवाएं और वैक्सीन पहले से उपलब्ध हैं." आइए विस्तार से जानते हैं पूरी बात.
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किन्हें है स्वाइन फ्लू से सबसे ज्यादा खतरा?
न्यूज तक यूट्यूब चैनल के खास शो 'डॉक्टर साहब' में डॉ. रवि ने बताया कि, "स्वाइन फ्लू अधिकांश लोगों में एक सामान्य फ्लू की तरह होता है और अपने आप ठीक भी हो जाते हैं. हालांकि, इसका असली खतरा हाई-रिस्क (High-Risk) श्रेणी में आने वाले लोगों को होता है. इस श्रेणी में छोटे बच्चे, 75 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग, अनकंट्रोल्ड डायबिटीज या ब्लड प्रेशर के मरीज, कैंसर रोगी, डायलिसिस पर रहने वाले व्यक्ति, अस्थमा या सीओपीडी (COPD) जैसी फेफड़ों की बीमारी से ग्रस्त लोग और कमजोर इम्युनिटी (इम्यूनोसप्रेस्ड) वाले लोग शामिल हैं. सामान्य इम्युनिटी वाले लोगों में इसके गंभीर होने की संभावना बेहद कम होती है.
स्वाइन फ्लू का इलाज और ओसेल्टामिविर
स्वाइन फ्लू (H1N1) के इलाज के लिए एंटी-वायरल मेडिसिन ओसेल्टामिविर (Oseltamivir) पूरे देश में आसानी से उपलब्ध है. यह दवा वायरस को शरीर में फैलने से रोकती है और निमोनिया जैसी गंभीर स्थिति बनने के खतरे को कम करती है. इस दवा को लक्षण शुरू होने के शुरुआती 48 घंटों के भीतर लेना सबसे ज़्यादा असरदार माना जाता है.
हालांकि, 48 घंटे बीत जाने के बाद भी डॉक्टर की सलाह पर इसे लेने से सीरियस डिसीज और निमोनिया का ख़तरा काफी हद तक घट जाता है. एक्सपर्ट्स की सख्त हिदायत है कि बिना डॉक्टरी परामर्श और बिना जांच के कोई भी व्यक्ति खुद से यह दवा (Self-medication) न खाए, क्योंकि इसका गलत या अधूरा कोर्स से वायरस में रेजिस्टेंस (प्रतिरोधक क्षमता) पैदा हो सकती है.
जांच और रोकथाम से जुड़ी सावधानियां
अमेरिका जैसे देशों में रैपिड टेस्टिंग की व्यवस्था होती है, जिससे कुछ ही मिनटों में फ्लू का पता चल जाता है और तुरंत इलाज शुरू हो जाता है. भारत में अभी भी सैंपल लैब भेजने में समय लग जाता है. बचाव के तौर पर मास्क का इस्तेमाल करना और हैंड हाइजीन (हाथ धोना या सैनिटाइजर का उपयोग) रखना बेहतर उपाय है. अगर कोई व्यक्ति फ्लू से संक्रमित है, तो मास्क पहनने से वह दूसरों में संक्रमण फैलने की कड़ी को तोड़ सकता है.
स्वाइन फ्लू की वैक्सीन और प्रिवेंशन
स्वाइन फ्लू से बचाव के लिए मार्केट में वैक्सीन/टीके उपलब्ध हैं, जिनमें क्वाड्रिवेलेंट (Quadrivalent), नेजल स्प्रे, और इन्फ्लूएंजा (टेट्रावेलेंट) वैक्सीन जैसे विकल्प शामिल हैं. हालांकि, वैक्सीन लेने से संक्रमण का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता, लेकिन यह बीमारी की तीव्रता और सीरियस होने के खतरे को बेहद कम कर देती है. जो लोग हाई-रिस्क कैटेगरी में आते हैं, वे अपने डॉक्टर की सलाह से समय रहते स्वाइन फ्लू की वैक्सीन लगवा सकते हैं.
यहां देखें वीडियो
Disclaimer: यह पूरी तरह डॉक्टर रवि गोडसे से बातचीत के आधार पर लिखी गई है. News Tak किसी भी बात की सत्यता और दावे की पुष्टि नहीं करता है.
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