भारत में होने वाली अगली जनगणना सिर्फ सिरों की गिनती भर नहीं होगी बल्कि यह हमारे बदलते समाज का एक आईना भी बनने वाली है. इस बार जनगणना के डिजिटल फॉर्म में शामिल 34 सवाल कुछ ऐसे हैं, जो आपकी पर्सनल लाइफ, रसोई और यहां तक कि आपके रिश्तों की पारंपरिक परिभाषा को भी चुनौती दे सकते हैं. आइए जानते हैं कि इस बार परिवार शब्द के मायने सरकार की नजर में कैसे बदल गए हैं.
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1. दो पत्नियां तो दो अलग परिवार पर दो पति तो एक ही घर!
सोशल मीडिया पर इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा उस नियम की है जो वैवाहिक स्थिति और घरेलू व्यवस्था से जुड़ा है. नए नियमों के अनुसार अगर किसी पुरुष की दो पत्नियां हैं और वे अलग-अलग घरों में रह रही हैं तो उन्हें दो अलग-अलग परिवार माना जाएगा. वहीं इसके विपरीत अगर किसी महिला के दो पति हैं (जो कि कुछ जनजातीय क्षेत्रों में प्रचलित है), तो उसे एक ही परिवार की कैटेगोरी में रखा जाएगा. विशेषज्ञों का कहना है कि यह नियम किसी के निजी जीवन पर फैसला सुनाने के लिए नहीं बल्कि यह समझने के लिए है कि देश में रसोई और चूल्हा (Domestic Economy) कैसे चल रहा है.
2. अब घर का 'बॉस' कौन? आप खुद तय करेंगे
अब तक के चलन में घर के सबसे बुजुर्ग पुरुष को ही बिना सोचे-समझे मुखिया मान लिया जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. जनगणना रजिस्टर में मुखिया का नाम दर्ज करने का अधिकार अब घर के सदस्यों को दिया गया है. यानी अब बहू, बेटी, पत्नी या दादी भी घर की मुखिया बन सकती हैं. शर्त सिर्फ इतनी है कि परिवार के बाकी सदस्य उन्हें अपना लीडर मानें. यह बदलाव ये बताता है कि भारतीय घरों में अब महिलाएं आर्थिक और सामाजिक फैसलों की कमान संभाल रही हैं.
3. दोस्त और नौकर भी अब फैमिली का हिस्सा
क्या आपका घरेलू सहायक या घर पर काम करने वाला शख्स आपके साथ रहता है और आपकी ही रसोई में बना खाना खाता है? अगर हां, तो इस जनगणना में वह आपके परिवार का सदस्य माना जाएगा. सरकार का मानना है कि परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं, बल्कि साझा भोजन और छत से बनता है. ठीक इसी तरह महानगरों में पढ़ाई या नौकरी के लिए फ्लैट शेयर करने वाले चार दोस्त भी एक 'परिवार' के रूप में दर्ज किए जा सकते हैं. वे आपस में तय कर सकते हैं कि उनका मुखिया कौन होगा.
क्या दुकान या बरामदा भी 'घर' है?
आवास की गुणवत्ता मापने के लिए भी कड़े नियम बनाए गए हैं. अगर कोई परिवार दुकान के अंदर सोता है तो उसे 'आवासीय मकान' नहीं गिना जाएगा. इसके अलावा रहने और इस्तेमाल होने वाले बरामदे, गैलरी या छज्जों को भी 'कमरों' की गिनती से बाहर रखा गया है. ऐसा इसलिए किया गया है ताकि सल में कितने भारतीयों के पास सम्मानजनक और पर्याप्त रहने की जगह उपलब्ध है इसका डेटा जुटाया जा सके.
क्यों जरूरी है यह बारीकी?
सरकार इन आंकड़ों के जरिए यह समझना चाहती है कि आधुनिक भारत का सामाजिक ढांचा कैसे बदल रहा है. भविष्य में स्कूल, अस्पताल और राशन की दुकानों का आवंटन भी इसी डेटा पर निर्भर करेगा. इसके अलावा अकेले रहने वाले लोग और बिना खून के रिश्तों वाले साझा परिवारों की बढ़ती संख्या को नीति-निर्माण में जगह देना जरूरी हो गया है.
सोशल मीडिया पर भले ही इन नियमों को लेकर मीम्स बन रहे हों लेकिन समाजशास्त्रियों के नजरिए से यह भारतीय समाज की विविधता और वास्तविकता को स्वीकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है. अगली बार जब जनगणना कर्मी आपके दरवाजे पर आएं तो याद रखिएगा कि आपका 'परिवार' अब सिर्फ आपकी 'फैमिली ट्री' तक सीमित नहीं है.
जाते जाते जान लीजिए क्या होती है ये जनगणना?
जनगणना किसी देश के विकास का वह 'रिपोर्ट कार्ड' है, जिससे पता चलता है कि वहां की जनता असल में कैसी स्थिति में है. इसके जरिए सरकार घर-घर जाकर यह हिसाब लगाती है कि देश में कितने लोग रहते हैं, उनकी उम्र और पढ़ाई-लिखाई क्या है, वे क्या काम करते हैं और उनके पास बुनियादी सुविधाएं (जैसे घर और बिजली-पानी) मौजूद हैं या नहीं. जनगणना से मिलने वाले इन सटीक आंकड़ों के आधार पर ही सरकारें भविष्य के लिए जरूरी योजनाएं, स्कूल, अस्पताल और नीतियां तैयार करती हैं, ताकि देश की तरक्की का लाभ हर नागरिक तक पहुंच सके.
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