Charchit Chehra: पिछले कुछ सालों से चुनाव आयोग के कई फैसलों पर राहुल गांधी और विपक्ष की भारी नाराजगी रही है . विपक्ष की तरफ से लगातार खुलकर ये गंभीर आरोप लगे कि पूरा चुनाव आयोग बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाले काम कर रहा है . अब तक देश में यही इम्प्रेशन था कि चुनाव आयोग के सारे फैसलों में तीनों चुनाव आयुक्तों ज्ञानेश कुमार, विवेक जोशी और एसएस संधू की पूरी सहमति या मिलीभगत है . 2025 में जब बिहार में चुनावी माहौल गरमाया, तब रीगा की रैली में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने मंच से सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ विवेक जोशी और एस.एस. संधू को भी लपेटे में ले लिया था.
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चुनाव आयोग से राहुल गांधी की लड़ाई तो राजीव कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए शुरू हुई थी लेकिन तब चुनाव आयुक्तों पर कोई उंगुली नहीं उठाता था. राजीव कुमार के समय चुनाव आयुक्त रहे ज्ञानेश कुमार पर भी कोई सवाल नहीं उठते थे. पहली बार नाम लेकर प्रियंका गांधी ने विवेक जोशी और एस.एस. संधू पर निशाना साधा था. आगे दिल्ली के रामलीला मैदान की रैली में भी गरजी कि ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी-इन तीन चुनाव आयुक्तों के नाम नहीं भूलेगा . राहुल गांधी ने भी ज्ञानेश कुमार, डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी के नाम लेकर चुनाव आयोग पर बीजेपी सरकार के लिए काम करने के आरोप लगाए थे.
अब तक ज्ञानेश कुमार के साथ विवेक जोशी और एसएस संधू भी राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और समूचे सरकार विरोधी कैंप के लिए विलेन थे लेकिन जैसे इंडियन एक्सप्रेस ने ज्ञानेश कुमार से दोनों चुनाव आयुक्तों की भारी असहमति की कुंडली खोली तो अचानक विलेन से हीरो और चर्चित चेहरा बन गए विवेक जोशी और एसएस संधू. चूंकि विवेक जोशी के अगला मुख्य चुनाव आयुक्त बनने की भी बात है इसलिए सवाल ये है कि ऐसे तेवरों के साथ आगे कोई कठिनाई तो नहीं आएगी?
कैसा रहा विवेक जोशी का बचपन
यूपी के विवेक जोशी बचपन से पढ़ाई में बेहद तेज थे इसलिए करियर में जो बनना, करना चाहे हासिल करते रहे. स्कूलिंग करने के बाद पहले इंजीनियरिंग को करियर चुना. आईआईटी रुड़की से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बी.ई. (B.E.) की डिग्री हासिल की. जब इंजीनियरिंग कर ली तो मन इकोनॉमिक्स की ओर भागा. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड (IIFT) दिल्ली से इंटरनेशनल बिजनेस में पीजी डिप्लोमा किया. ज्ञान की भूख यहीं नहीं रुकी, आगे स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ जिनेवा से इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में एम.ए. और पीएचडी (Ph.D.) कर ली. वहीं से नाम के आगे लगा डॉक्टर. विवेक जोशी उन गिने-चुने आईएएस में से हैं जो ग्लोबल ट्रेड और ग्लोबल इकोनॉमी की बारीक समझ रखते हैं. इंजीनियरिंग और इकोनॉमिक्स करने के बाद विवेक जोशी ठान लिए कि आगे आईएएस बनना है. उन्होंने यूपीएससी (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा दी और 1989 में फर्स्ट अटेम्ट में पास करके आईएएस बन गए. कैडर मिला हरियाणा.
विवेक जोशी के 35 साल के प्रशासनिक करियर में कई ऐसी कहानियां हैं जो उनके सरकार के प्रिय और संकटमोचक होने का सबूत देती हैं. केंद्र सरकार में रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त बने. वित्तीय सेवा विभाग (DFS) के सचिव के तौर पर, उन्होंने बैंकों के डूबते कर्ज NPA को नियंत्रित करने और आम लोगों तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाने के लिए कई कड़े रिफॉर्म्स लागू किए. उन्हें प्रशासनिक गलियारे में एक ऐसा फाइल मास्टर माना जाता है जो नियमों की आड़ में काम रोकने के बजाय, नियमों के दायरे में रहकर जनता के काम बनाने का रास्ता ढूंढते हैं.
विवेक जोशी का करियर बेदाग और शांत रहा. जब हरियाणा के मुख्य सचिव थे, तभी फरवरी 2025 में नए चुनाव आयुक्त कानून के तहत प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति ने उन्हें चुनाव आयुक्त चुना. वहां से चर्चित होने लगे विवेक जोशी.
चुनाव आयुक्त बनते ही डॉ. विवेक जोशी पर सत्ता की पसंद का टैग लगा और इसका आधार बना उनकी गृह मंत्रालय में रही पोस्टिंग. 2019 से 2022 के बीच, विवेक जोशी गृह मंत्रालय के अधीन रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त रहे. ये वही समय था जब अमित शाह देश के गृह मंत्री बने थे. डॉ. विवेक जोशी ने करीब 3 साल से ज्यादा समय तक सीधे अमित शाह के अंडर में काम किया . ज्ञानेश कुमार भी अमित शाह के साथ रहे और आखिरकार मुख्य चुनाव आयुक्त बने. आज भी विपक्ष की भयंकर ट्रोलिंग का सामना करते हैं.
पीएम मोदी की टीम के भी माने जा सकते हैं
विवेक जोशी पीएम मोदी की टीम के भी माने जा सकते हैं. वित्त मंत्रालय, गृह मंत्रालय में पोस्टिंग के साथ DoPT (कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग) के भी सचिव बने जो सीधे PMO के तहत काम करता है. दिल्ली में इन बड़ी-बड़ी पोस्टिंग के बाद उन्हें बीजेपी शासित राज्य हरियाणा का मुख्य सचिव बनाकर भेजा गया और वहीं से वापस दिल्ली बुलाकर चुनाव आयोग में बिठाया गया लेकिन य़हां तो उन्होंने क्रांति कर दी.
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं . समिति में गृह मंत्री अमित शाह और राहुल गांधी शामिल थे . फरवरी 2025 में जब मुख्य चुनाव आयुक्त और नए चुनाव आयुक्त के नाम फाइनल करने के लिए PMO में समिति की बैठक हुई, तब राहुल गांधी भी बैठक का हिस्सा थे . राहुल गांधी चयन प्रक्रिया में शामिल जरूर थे, लेकिन उन्होंने ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाने और विवेक जोशी को चुनाव आयुक्त नियुक्त करने के फैसले पर सहमति नहीं जताई थी . उन्होंने इस नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर अपनी आधिकारिक असहमति (Dissent Note) दर्ज कराई थी . हालांकि राहुल गांधी ने विवेक जोशी या ज्ञानेश कुमार के नामों का विरोध केवल व्यक्तिगत आधार पर नहीं, बल्कि चयन की पूरी प्रक्रिया को लेकर किया था .
जब द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद यह साफ हुआ है कि राहुल गांधी की आपत्ति के बावजूद नियुक्त किए गए चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और एस.एस. संधू ने ही मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों के खिलाफ 14 बार मोर्चा खोला था, तो इस पूरी कहानी में बड़ा राजनीतिक मोड़ आ गया है . एसएस संधू और विवेक जोशी के कारण चुनाव आयोग पर निशाना साधने, हमला करने के लिए राहुल गांधी को अब ढेर सारा मसाला मिला है जिसकी गूंज आगे सुनाई देती रहेगी.
बीजेपी के करीबी होने के नैरेटिव को पूरी तरह पलट कर रख दिया
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने संधू, जोशी के बीजेपी के करीबी होने के नैरेटिव को पूरी तरह पलट कर रख दिया है . विपक्ष को लंबे समय तक शक रहा कि संधू और विवेक जोशी भी ज्ञानेश कुमार के साथ मिलाकर सरकार के इशारों पर काम कर रहे होंगे लेकिन अंदरूनी दस्तावेजों से पता चला है कि चुनाव आयुक्त बनने के बाद दोनों मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों के आगे घुटने नहीं टेके . विवेक जोशी और एस.एस. संधू ने मिलकर 14 बार लिखित रूप से कड़े ऑब्जेक्शन दर्ज कराए और ज्ञानेश कुमार के कई फैसलों पर गैर-कानूनी टैग लगा दिया.
चुनाव आयोग में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त (ECs) होते हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं एक सीनियर हो गए और बाकी दो जूनियर. संविधान के तहत तीनों चुनाव आयुक्तों की शक्तियां, वेतन, और दर्जा बिल्कुल बराबर होता है . मुख्य चुनाव आयुक्त CEC के पास कोई 'वीटो पावर' नहीं होती. हालांकि तीन लोगों की कुर्सियों में बीच वाली चेयर CEC के लिए ही होती है. अगर किसी फैसले पर मतभेद हो, तो फैसला बहुमत से तय होता है, जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सामने आया है . मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बाद चुनाव आयुक्तों में एस.एस. संधू सीनियर हैं. उन्होंने 15 मार्च 2024 को पद संभाला था, जबकि विवेक जोशी जूनियर हैं. उन्होंने 19 फरवरी 2025 को पद संभाला है लेकिन पावर तीनों के बराबर हैं.
दिसंबर 2023 में आए नए नियुक्ति कानून के तहत सरकार के पास ये अधिकार है कि वो सीनियरिटी से बाहर जाकर भी किसी को CEC बना सकती है, लेकिन आयोग में सीनियरिटी का सम्मान करने की परंपरा रही है. सुखबीर सिंह संधू Senior-most चुनाव आयुक्त हैं लेकिन उनका नंबर कभी मुख्य चुनाव आयुक्त के लिए नहीं आएगा. बल्कि विवेक जोशी मुख्य चुनाव आयुक्त बन सकते हैं.
कोई भी चुनाव आयुक्त अपने पद पर अधिकतम 6 साल या 65 साल की उम्र जो भी पहले पूरा हो तक ही रह सकता है . मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार 26 जनवरी 2029 को रिटायर होंगे . सुखबीर सिंह संधू का जन्म 6 जुलाई 1963 को हुआ था. वो 5 जुलाई 2028 को 65 साल होते रिटायर हो जाएंगे . डॉ. विवेक जोशी फरवरी 2031 में रिटायर होंगे . इसलिए, 26 जनवरी 2029 को जैसे ही ज्ञानेश कुमार रिटायर होंगे डॉ. विवेक जोशी अगले मुख्य चुनाव आयुक्त बन सकते हैं. 2029 का लोकसभा चुनाव कराने वाले वही होंगे.
चुनाव आयोग चुनाव कराने के लिए बना था लेकिन हमेशा से तीन आयुक्तों वाला नहीं था. 3 चुनाव आयुक्तों की व्यवस्था अक्टूबर 1993 को लागू की गई थी, जिसका सीधा कनेक्शन तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन से था . 1990 में पद संभालने के बाद टी.एन. शेषन ने चुनावी धांधली रोकने के लिए नेताओं और सरकारों पर नकेल कसनी शुरू कर दी थी, जिससे परेशान होकर तत्कालीन नरसिम्हा राव की सरकार ने उनका एकाधिकार खत्म करने पावर बैलेंस करने अध्यादेश के जरिए आयोग को 3 सदस्यीय बना दिया.
दो नए चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त के बिल्कुल बराबर शक्तियां दे दीं . टी.एन. शेषन इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए लेकिन हार गए. तब सुप्रीम कोर्ट ने रूलिंग दी थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त के पास कोई वीटो पावर नहीं है. आयोग के सारे फैसले बहुमत से ही तय होंगे, वही व्यवस्था आज भी लागू है जिसका इस्तेमाल ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर सवाल उठाने के लिए विवेक जोशी और एसएस संधू ने किया.
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