राजनीति में किसी भी नए प्रोजेक्ट या बिल्डिंग का फीता काटने के लिए नेताओं में होड़ मची रहती है . हर कोई क्रेडिट लेने की रेस में सबसे आगे खड़ा होना चाहता है . लेकिन कर्नाटक की राजनीति के पावरहाउस सीएम डीके शिवकुमार ने एक ऐसा जस्चर दिखाया, जिसने पूरे देश की राजनीति को हैरान कर दिया . प्रोजेक्ट कर्नाटक सरकार का था, जमीन बेंगलुरु की थी, श्रेय और फीता काटने का पूरा अधिकार भी डीके शिवकुमार का ही था . लेकिन उन्होंने राजनीतिक दीवारों को गिराते हुए एक अलग ही मिसाल पेश की. खुद आगे बढ़कर एनडीए के पाले में बैठे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू को मुख्य अतिथि के रूप में बुला लिया .
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बेंगलुरु में मौका था टिकाऊ निर्माण और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों पर केंद्रित 'द अर्थ सेंटर' (The Earth Centre) के भव्य शुभारंभ का . अब सवाल यह है कि डीके शिवकुमार के लिए ऐसा करना कतई जरूरी नहीं था, फिर भी उन्होंने नायडू को बुलाकर उनके सम्मान में पलक-पावड़े क्यों बिछाए? इसके पीछे दिल्ली से लेकर पूरे दक्षिण भारत तक क्या सियासी मैसेज छिपा है?
विरोधी विचारधाराएं और अलग-अलग गठबंधन
राजनीति में जब विरोधी विचारधाराएं और अलग-अलग गठबंधन एक मंच पर आकर एक-दूसरे की तारीफों के पुल बांधने लगें, तो समझ जाइए कि बात सिर्फ राजनीति की नहीं, बल्कि उससे परे एक खास केमिस्ट्री और विजन की है . डीके ने ऐसा क्यों किया और चंद्रबाबू नायडू क्या सोचकर उनके हिस्से का फीता काटने आए, इसकी गुत्थी अभी तो सुलझेगी भी नहीं. ऐसा पहली बार नहीं हुआ या हो रहा कि साउथ के सीएम किसी सरकारी कार्यक्रम में मिल रहे हैं.
जब कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और चंद्रबाबू नायडू ने मंच साझा किया, तो एक नया सियासी अध्याय खुला . मुलाकात के बाद खबर ये बनी कि डीके शिवकुमार ने चंद्रबाबू नायडू की जमकर तारीफ की. कहा कि आज हैदराबाद विकास की जिन ऊंचाइयों पर है, उसकी मजबूत नींव और विजनरी ढांचा किसी और ने नहीं, बल्कि खुद चंद्रबाबू नायडू ने ही तैयार किया था . लेकिन इस मंच के पीछे की असली कहानी क्या है? क्यों बीजेपी के साथ गठबंधन में होने के बावजूद चंद्रबाबू नायडू की कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों से इतनी शानदार पटती है? सवाल ये भी कि बीजेपी के सबसे मजबूत सारथी होने के बावजूद, कांग्रेस के दिग्गज मुख्यमंत्रियों के जरिए क्या राहुल गांधी के साथ चंद्रबाबू नायडू के रिश्ते इतने सहज और व्यावहारिक बने हुए हैं?
अनोखी और हाईटेक बिल्डिंग
द अर्थ सेंटर-व्हाइटफील्ड में बनी ये एक ऐसी अनोखी और हाईटेक बिल्डिंग है, जिसे पूरी तरह 'इको-फ्रेंडली' या पर्यावरण को ध्यान में रखकर बनाया गया है . करीब 9 लाख स्क्वायर फीट में फैले इस परिसर को ऐसे डिजाइन किया गया है कि इसमें काम करने वाले लोगों को कंक्रीट के किसी दफ्तर जैसा नहीं, बल्कि प्रकृति के बीच होने का अहसास होगा . इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसकी दीवारों और शीशों पर अत्याधुनिक सोलर पैनल लगे हैं, जो धूप से खुद ही बिजली पैदा करते हैं . पानी की एक-एक बूंद को रीसायकल किया जाता है और बारिश के पानी को सहेजने का पूरा इंतजाम है . उद्घाटन के मौके पर चंद्रबाबू नायडू ने भी यही कहा कि आज के दौर में हमें शहरों में सिर्फ कंक्रीट के जंगल खड़े नहीं करने हैं, बल्कि प्रकृति को बचाते हुए ऐसा ही 'हरा-भरा विकास' करना है .
डीके शिवकुमार के लिए द अर्थ सेंटर के उद्घाटन पर चंद्रबाबू नायडू को बुलाना कोई प्रशासनिक या संवैधानिक मजबूरी नहीं थी . ये विशुद्ध रूप से दूरगामी राजनीति, व्यक्तिगत संबंधों और आपसी सम्मान का एक बड़ा गेम प्लान था . डीके शिवकुमार ने एक तीर से दो निशाने साधे होंगे. पहला ये कि उन्होंने नायडू के उस विशाल प्रशासनिक अनुभव और आईटी विजन को सम्मान दिया, जिसके खुद डीके फैन रहे हैं . दूसरा और सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश कि डीके शिवकुमार ने दिल्ली से लेकर दक्षिण तक ये मैसेज दिया कि राजनीति में कुछ परमानेंट नहीं होता. अलायंस तो कतई नहीं. इसलिए बड़े नेताओं के बीच संवाद और संबंध कभी खत्म नहीं होने चाहिए . चंद्रबाबू नायडू को मुख्य अतिथि बनाकर डीके ने यह साबित किया कि दक्षिण के विकास और बड़े विजन के मामले में वे आज भी नायडू को एक 'स्टेट्समैन' यानी बड़े मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं, भले ही राजनीति में दोनों विरोधी पालों में खड़े हों .
डीके शिवकुमार और चंद्रबाबू नायडू कभी एक पार्टी में नहीं रहे लेकिन शानदार पर्सनल केमेस्ट्री मेनटेन करते हैं. दोनों नेताओं के बीच की ये बॉन्डिंग बेंगलुरु के इस नए मंच से बहुत पहले, दिसंबर 2023 में बेंगलुरु हवाई अड्डे के रनवे पर दिख चुकी थी . जहां दोनों बड़े नेताओं की उड़ानें अलग थीं, लेकिन जब वे आमने-सामने आए, तो प्रोटोकॉल और पार्टियों की दीवारें टूट गईं . रनवे पर हाथ मिलाते हुए उनकी वह गर्मजोशी आज 'द अर्थ सेंटर' के मंच पर एक बड़े सम्मान में तब्दील हो गई . राजनीति के जानकार जानते हैं कि डीके शिवकुमार खुद कर्नाटक में किंगमेकर और बड़े रणनीतिकार माने जाते हैं और वे नायडू के उस 'आधुनिक और कॉरपोरेट' राजनीतिक मॉडल के बड़े प्रशंसक हैं, जिसने हैदराबाद को 'साइबरआबाद' बनाया था ."
कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ पड़ोसी राज्य तेलंगाना से
कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ पड़ोसी राज्य तेलंगाना से भी आता है . तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू का रिश्ता तो राजनीति में गुरु और शिष्य का सबसे अनोखा उदाहरण है . रेवंत रेड्डी ने अपनी राजनीति की लंबी पारी नायडू की पार्टी टीडीपी (TDP) से ही शुरू की थी . वे एक समय नायडू के सबसे करीबी और भरोसेमंद सिपहसालार थे . आज रेवंत कांग्रेस में हैं और मुख्यमंत्री हैं, लेकिन वे सार्वजनिक रूप से नायडू को अपना राजनीतिक गुरु मानने में कभी संकोच नहीं करते . चाहे 2024 में राज्य के बंटवारे के लंबित मुद्दों को सुलझाने के लिए दोनों मुख्यमंत्रियों की हैदराबाद में गले मिलकर हुई मुलाकात हो, या जनवरी 2025 में ज्यूरिख हवाई अड्डे पर दोनों की अनौपचारिक बैठक—रेवंत और नायडू की पर्सनल ट्यूनिंग राजनीतिक विचारधाराओं से बहुत ऊपर है . यही वजह है कि जब तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी और कर्नाटक के सीएम डीके शिवकुमार, दोनों ही कांग्रेस के बड़े चेहरे होने के बावजूद नायडू से सहजता से मिलते हैं, तो देश की राजनीति हैरान रह जाती है .
राजनीति की इन बंदिशों को तोड़ती हुई ऐसी ही एक और अद्भुत तस्वीर इसी साल 25 जून 2026 को भी देखने को मिली थी . मौका था तुंगभद्रा बांध (Tungabhadra Dam) के 33 नए स्पिलवे गेट्स के ऐतिहासिक उद्घाटन का . इस बेहद महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजना के मंच पर देश ने एक अभूतपूर्व नजारा देखा, जब चंद्रबाबू नायडू, रेवंत रेड्डी और डीके शिवकुमार—अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा और विरोधी खेमों के ये तीनों दिग्गज नेता—एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे . पानी के बंटवारे जैसे बेहद संवेदनशील और दशकों पुराने अंतरराज्यीय विवादों को दरकिनार कर, तीनों राज्यों के इन मुख्यमंत्रियों ने किसानों और जनता के हित में आपसी सहयोग की एक नई मिसाल पेश की . खुद तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने इस मुलाकात को दक्षिण भारत की राजनीति का 'रेड लेटर डे' (ऐतिहासिक दिन) करार दिया था . यह साझा प्रोजेक्ट सिर्फ पानी के गेट खोलने का जरिया नहीं बना, बल्कि इसने साबित कर दिया कि जब बात विकास और जन कल्याण की हो, तो दक्षिण की यह 'त्रिमूर्ति' राजनीतिक मतभेदों का पानी उतारने में जरा भी देर नहीं लगाती."
टीडीपी और कांग्रेस का अतीत बेहद कड़वाहट भरा रहा
इस केमिस्ट्री का एक बड़ा सिरा सीधे दिल्ली में कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी से भी जुड़ता है . इतिहास गवाह है कि टीडीपी और कांग्रेस का अतीत बेहद कड़वाहट भरा रहा है, क्योंकि टीडीपी का जन्म ही कांग्रेस विरोध की बुनियाद पर हुआ था . लेकिन 2018-19 के दौर में जब चंद्रबाबू नायडू ने राहुल गांधी के घर जाकर उनसे हाथ मिलाया, तो दोनों नेताओं ने एक सुर में कहा था कि 'हमारा साथ आना देश के लिए एक लोकतांत्रिक मजबूरी (है' . उस दौर में राहुल गांधी और नायडू ने अपने पुराने राजनीतिक मतभेदों को पीछे छोड़कर एक-दूसरे के प्रति गहरा सम्मान दिखाया था . भले ही आज चंद्रबाबू नायडू केंद्र में बीजेपी के साथ सरकार चला रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस के प्रति उनका कोई व्यक्तिगत बैर या कड़वाहट नहीं है . नायडू ने बीजेपी के साथ गठबंधन सिर्फ अपने राज्य आंध्र प्रदेश के हितों के लिए किया है, न कि किसी दल से दुश्मनी मोल लेने के लिए ."
तो आखिर कांग्रेस के इन तमाम बड़े नेताओं के साथ चंद्रबाबू नायडू की इतनी शानदार पटती क्यों है? इसके दो बड़े कारण हैं . पहला कारण हो सकता है Pride of the South और क्षेत्रीय मुद्दे . दक्षिण भारत के इन राज्यों-चाहे कर्नाटक हो, तेलंगाना हो या आंध्र प्रदेश-के आर्थिक और ढांचागत सरोकार काफी हद तक एक जैसे हैं . बेंगलुरु को जहां एस. एम. कृष्णा और केन्पेगौड़ा जैसे नायकों ने पहचान दी, वहीं हैदराबाद को नायडू ने चमकाया . विकास की इस साझी समझ के कारण ये नेता एक-दूसरे के विजन का सम्मान करते हैं . दूसरा और सबसे बड़ा कारण यह है कि चंद्रबाबू नायडू ने कभी भी 'परेशान करने वाली या व्यक्तिगत दुश्मनी वाली' राजनीति नहीं की . उन्होंने बीजेपी के साथ अलायंस किया, लेकिन विपक्ष के साथ संवाद के सारे दरवाजे हमेशा खुले रखे . वे देश के इकलौते ऐसे राजनेता हैं जो दिल्ली में एनडीए की सरकार चला रहे हैं और बेंगलुरु व हैदराबाद में कांग्रेस के मुख्यमंत्री उनके सम्मान में पलक-पावड़े बिछाए खड़े रहते हैं . राजनीति में इसे ही कहते हैं-बिना किसी से बैर किए, अपने विजन से सबको मुरीद बना लेना.
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