NEET आंदोलन ने कैसे Gen-Z को सड़कों पर ला दिया? वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने बताए दो सबसे बड़े टर्निंग प्वाइंट

न्यूज तक डेस्क

26 Jul 2026 (अपडेटेड: Jul 26 2026 1:02 PM)

नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों, छात्रों के आंदोलन और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद देशभर में नई राजनीतिक बहस छिड़ गई है. क्या यह आंदोलन सिर्फ परीक्षा सुधार तक सीमित रहेगा या आने वाले समय में राजनीति की तस्वीर भी बदल देगा? जानें वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी की राय.

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जंतर-मंतर पर नीट (NEET) परीक्षा में गड़बड़ियों और पेपर लीक के विरोध में छात्रों का आंदोलन और उसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे ने देशभर में नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है. अब सवाल उठ रहा है कि क्या यह आंदोलन सिर्फ परीक्षा व्यवस्था तक सीमित रहेगा या फिर देश की राजनीति की दिशा भी बदल सकता है. इसी मुद्दे पर इंडिया टुडे ग्रुप के 'तक' चैनल्स के मैनेजिंग एडिटर मिलिंद खांडेकर ने 'न्यूज़ तक' के साप्ताहिक कार्यक्रम 'साप्ताहिक सभा' में वरिष्ठ पत्रकार, इंडियन एक्सप्रेस की कंट्रीब्यूटिंग एडिटर और लेखिका नीरजा चौधरी से विस्तार से बातचीत की.

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देश की राजनीति को विगत 40 से 50 सालों से को करीब से देख रहीं नीरजा चौधरी का मानना है कि आजादी के बाद देश में हुए प्रमुख आंदोलनों जैसे जयप्रकाश नारायण (JP) का संपूर्ण क्रांति आंदोलन, असम छात्र आंदोलन और 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन की तरह ही इस छात्र आंदोलन में भी देश की राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता है.

अतीत के आंदोलनों से तुलना: मुद्दा, नेतृत्व और राजनीतिक पार्टी

चर्चा के दौरान नीरजा चौधरी ने बताया कि भारत के इतिहास में जितने भी बड़े आंदोलन हुए हैं, उन्होंने राजनीति को जरूर बदला है:

जयप्रकाश नारायण (JP) आंदोलन: गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन से प्रेरित होकर बिहार के छात्रों ने जेपी को आमंत्रित किया था. जेपी ने 'संपूर्ण क्रांति' की मांग की, विपक्षी दल एकजुट हुए और अंततः 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी की सरकार को नॉर्थ इंडिया से साफ कर दिया.

असम आंदोलन (1980 का दशक): बांग्लादेश से आए विदेशी प्रवासियों के खिलाफ छात्रों (प्रफुल्ल महंता, भृगु फुकन आदि) ने अगुवाई की. 1985 में असम समझौता हुआ, उन्होंने पार्टी बनाई और 4 महीने के भीतर असम में कांग्रेस को हराकर सत्ता में आ गए.

अन्ना हजारे आंदोलन (2011): लोकपाल बिल और भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की लीडरशिप में आंदोलन शुरू हुआ. बाद में अरविंद केजरीवाल ने पार्टी बनाई और दो साल के भीतर दिल्ली में 70 में से 67 सीटें जीतकर सरकार बनाई.

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का उभार

नीरजा चौधरी ने बताया कि 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) एक ओवरनाइट फिनोमिना के रूप में सामने आई. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया द्वारा इस शब्द के इस्तेमाल के बाद 24 घंटे में अभिजीत दीपके ने कॉकरोच जनता पार्टी ऑनलाइन लॉन्च कर दी और एक सप्ताह में इसके 2 करोड़ ऑनलाइन फॉलोअर्स हो गए. पार्टी ने नीट परीक्षा की धांधली और एग्जामिनेशन सिस्टम की खामियों को मुद्दा बनाते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग रखी.

वे दो 'टर्निंग प्वाइंट्स' जिन्होंने आंदोलन को दिया बड़ा रूप

शुरुआत में अभिजीत दीपके की रैलियों में ऑनलाइन जैसा तूफान ग्राउंड पर नहीं दिख रहा था, लेकिन आंदोलन में दो बड़े टर्निंग प्वाइंट्स आए:

1. सोनम वांगचुक का साथ आना: लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने CJP के साथ हाथ मिलाया और शिक्षा व्यवस्था में सुधार व धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की.

2. पुलिसिया कार्रवाई और लाठीचार्ज: 21वें दिन जब सरकार ने सोनम वांगचुक को जबरन उठाकर सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया और संसद मार्च कर रहे छात्रों पर लाठीचार्ज किया, तो यह गुस्सा देश के हर मध्यमवर्गीय (Middle Class) परिवार के घर तक पहुंच गया.

दिल्ली, मुंबई, गोवा, दादर और मापसा जैसे शहरों से 15 से 18 साल के युवा ('Gen-Z') और उनके माता-पिता बिना किसी राजनीतिक बुलावे के स्वतःस्फूर्त (Spontaneous) तरीके से सड़कों पर उतर आए. नीट और जेईई के अभियार्थियों के अलावा वे लोग भी सामने आए जिन्हें सिस्टम से पीड़ा और डर महसूस हो रहा था.

सरकार से कहां हुई चूक और मिसकैलकुलेशन?

नीरजा चौधरी ने कहा कि बंगाल चुनाव में जीत के बाद सरकार के भीतर एक प्रकार का 'कॉम्प्लेसेंसी' (आत्मसंतोष) और 'इनविंसिबिलिटी' (अजेय होने का भाव) आ गया था. उन्हाेंने कहा कि सरकार को 15 दिन पहले ही सीनियर मंत्रियों को भेजकर सोनम वांगचुक और छात्रों से बातचीत कर इस मामले को शांत कर देना चाहिए था. नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और तमिलनाडु (जहां थलपति विजय के उभार में युवाओं का बड़ा योगदान रहा) के उदाहरणों को देखते हुए छात्र आंदोलन को हल्के में लेना एक बड़ी भूल थी. नीरजा चौधरी ने कहा कि सरकार को यह डर था कि दबाव में आकर इस्तीफा लिया तो UPA-2 की तरह एक के बाद एक इस्तीफों की झड़ी लग जाएगी. हालांकि, यह आंदोलन किसी राजनीतिक एजेंडे का नहीं, बल्कि देश के बच्चों और भविष्य का था.

24 घंटे में सरकार का 'कॉस्ट करेक्शन' और पीएम मोदी की पहल

आंदोलन के बढ़ते प्रभाव को देखकर पिछले 24 घंटों में सरकार ने डैमेज कंट्रोल शुरू किया है:

  • गृह मंत्री ने कई घंटों तक वरिष्ठ मंत्रियों के साथ बैठक की.
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इंस्टाग्राम के जरिए छात्रों को दो बार सीधे संबोधित किया और मंत्रियों को भी सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल करने को कहा.
  • जान देने वालों को 22 नीट छात्रों के परिवारों को ₹1-1 करोड़ का मुआवजा देने पर सरकार ने सकारात्मक रुख दिखाया.
  • इन आश्वासनों के बाद सोनम वांगचुक ने अपना अनशन समाप्त कर दिया है.

कांग्रेस और विपक्ष की स्थिति

आंदोलन में कांग्रेस की रणनीति पर नीरजा चौधरी ने कहा कि राहुल गांधी या कांग्रेस का सीधे मंच पर न जाना एक तरह से आंदोलन के लिए अच्छा रहा, क्योंकि इससे कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक की गैर-राजनीतिक साख (Credibility) बनी रही. लेकिन यदि युवा वर्ग में असंतोष बढ़ता है तो 30 साल से कम उम्र की 50% आबादी वाले इस देश में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते स्वाभाविक लाभार्थी होगी.

सिर्फ इस्तीफे से नहीं, सिस्टम में बदलाव से बनेगा काम

नीरजा चौधरी ने अंत में जोर देकर कहा कि सिर्फ शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, एफआईआर वापसी या 1 करोड़ का मुआवजा काफी नहीं है. जिस तरह निर्भया कांड के बाद 'जस्टिस वर्मा कमेटी' बनाकर कानूनों में ऐतिहासिक बदलाव किए गए थे, उसी तरह प्रधानमंत्री की अगुवाई में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों, सोनम वांगचुक, विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं के साथ 'राउंड टेबल मीटिंग' होनी चाहिए ताकि देश की परीक्षा प्रणाली और शिक्षा व्यवस्था में ठोस और स्थाई सुधार लाया जा सके.