AAP BJP Merger 10th Schedule of Constitution: आम आदमी पार्टी में एक बड़ी राजनीतिक बगावत सामने आई है. राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा सहित 7 सांसदों ने पार्टी छोड़ दी और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए हैं. इसके साथ ही उन्होंने दावा किया है कि पार्टी के दो-तिहाई सांसद यानी कुल 10 में से 7 सांसद उनके साथ हैं. उनके इस कदम ने न सिर्फ AAP के भीतर हलचल मचा दी है, बल्कि दल-बदल कानून को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है. ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि संविधान के मुताबिक मर्जर यानी विलय की प्रक्रिया क्या है और क्या यह कदम वास्तव में कानूनी रूप से वैध है या महज एक राजनीतिक रणनीति. ऐसे में आइए समझते हैं कि यह कानून क्या कहता है और इस पूरे मामले पर कानून के जानकार कपिल सिब्बल की क्या राय है.
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1985 का दल-बदल विरोधी कानून और 10वीं अनुसूची
भारत में राजनीति को साफ-सुथरा बनाने के लिए 1985 में संविधान की 10वीं अनुसूची (10th Schedule) लागू की गई थी. उस दौर में 'आया राम गया राम' की राजनीति बहुत मशहूर थी, जहां नेता निजी लाभ के लिए पार्टियां बदलते रहते थे. इसी को रोकने के लिए सांसदों और विधायकों की सदस्यता रद्द करने का प्रावधान लाया गया. पहले इसमें 'स्प्लिट' यानी पार्टी टूटने का नियम था, जिसमें एक-तिहाई सदस्य अलग हो सकते थे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और संशोधनों के बाद अब स्प्लिट के प्रावधान को खत्म कर दिया गया है.
मर्जर के लिए पहली शर्त: राजनीतिक दल का विलय
संविधान के 10वीं अनुसूची के अनुसार, मर्जर की प्रक्रिया दो चरणों में होती है. सबसे पहले मूल राजनीतिक दल (Organizational Level) को यह फैसला लेना होता है कि वो किसी दूसरी पार्टी के साथ विलय कर रहा है. इसके लिए पार्टी को अपनी बैठक बुलाकर औपचारिक प्रस्ताव पास करना पड़ता है. यानी अगर आम आदमी पार्टी के सांसद भाजपा में जाना चाहते हैं तो पहले आम आदमी पार्टी संगठन को खुद को भाजपा में मर्ज करने का संकल्प लेना होगा. बिना संगठन के विलय के केवल सांसद खुद को दूसरी पार्टी में मर्ज नहीं कर सकते.
दो-तिहाई बहुमत और सांसदों की स्थिति
राजनीतिक दल जब विलय का फैसला ले लेता है तो तब बात आती है सदन में बैठे सांसदों की. इस मामले में कानून कहता है कि यदि पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सांसद या विधायक इस विलय के लिए तैयार हैं तो तभी उनकी सदस्यता बची रहेगी. अगर 10 में से 7 सांसद (जो कि दो-तिहाई से ज्यादा हैं) तैयार हो भी जाएं तो भी वे तभी कानूनी रूप से सुरक्षित हैं जब उनकी मूल पार्टी पहले विलय का फैसला ले. यदि कुछ सांसद विलय को स्वीकार नहीं करते तो वे एक अलग गुट के रूप में काम कर सकते हैं. इन्हें स्पीकर अलग बैठने की अनुमति दे सकता है.
संवैधानिक संस्थाओं और स्पीकर की भूमिका पर सवाल
वर्तमान राजनीति में एक बड़ी समस्या यह देखी जा रही है कि संवैधानिक नियमों की व्याख्या राजनीतिक हितों के हिसाब से की जा रही है. महाराष्ट्र के घटनाक्रम का उदाहरण देते हुए यह सवाल उठता है कि क्या वाकई कानून का पालन हो रहा है? अक्सर विधानसभा अध्यक्ष या स्पीकर सत्ताधारी दल के दबाव में काम करते हैं, जिससे असंवैधानिक फैसलों को भी मान्यता मिल जाती है. अगर आम आदमी पार्टी के मामले में भी बिना संगठन के विलय के सांसदों को मान्यता दी जाती है तो यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा.
कानून और राजनीति के बीच की जंग
संविधान की धाराएं स्पष्ट रूप से कहती हैं कि सांसदों का मर्जर तभी मान्य है जब पार्टी का मर्जर हो चुका हो. बिना पार्टी के विलय के सांसदों का विलय 10वीं अनुसूची का उल्लंघन माना जाएगा. ऐसे में अब देखना यह है कि क्या भविष्य में इन संवैधानिक बारीकियों का सम्मान किया जाता है या फिर सत्ता की राजनीति कानून पर भारी पड़ती है.
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