Shesh Bharat: अमित शाह से मिलकर क्यों गदगद हो गए राम चरण? चिरंजीवी के घर पहुंचने के पीछे क्या है कहानी?

रूपक प्रियदर्शी

• 09:14 AM • 04 Nov 2026

अमित शाह ने हैदराबाद में अभिनेता चिरंजीवी और राम चरण से मुलाकात की. इस दौरान फिल्म इंडस्ट्री में AI और डीपफेक के बढ़ते खतरे पर चर्चा हुई. हालांकि, इस मुलाकात को दक्षिण भारत में बीजेपी की राजनीतिक रणनीति और चिरंजीवी परिवार के प्रभाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है.

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एआई जेनरेटेड डीपफेक से सेलिब्रिटीज बहुत परेशान हैं, ये बात तो ठीक है. चिरंजीवी, पवन कल्याण और राम चरण भी इसके पीड़ितों में शामिल हैं. कौतूहल तब बढ़ा, जब गृह मंत्री अमित शाह हैदराबाद पहुंचे और चिरंजीवी अपने बेटे राम चरण के साथ उनसे मिलने पहुंचे. बातचीत एआई जेनरेटेड डीपफेक के खतरे को लेकर हुई. पुराने राजनेता रहे चिरंजीवी और राम चरण की हैदराबाद में अमित शाह से मुलाकात की काफी चर्चा हो रही है. कहा यही जा रहा है कि एआई जेनरेटेड डीपफेक के खतरों को लेकर चिरंजीवी-राम चरण की यह मुलाकात हुई. लेकिन क्या कहानी इतनी सिंपल है, जब तमिलनाडु में स्टार थलपति विजय ने राजनीति बदल दी है और 2028 में तेलंगाना चुनावों पर सबकी नजरें टिकी हैं.

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राम चरण ने बताया मुलाकात का मकसद

राम चरण ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते हुए साफ किया कि उन्होंने गृह मंत्री के सामने फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों के खिलाफ AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) और डीपफेक टेक्नोलॉजी के बढ़ते दुरुपयोग का गंभीर मुद्दा उठाया, जिस पर अमित शाह ने कड़े कानून और त्वरित कार्रवाई का भरोसा दिया है. लेकिन चर्चा यह है कि जब अमित शाह किसी बड़े राजनीतिक रसूख वाले परिवार के घर जाते हैं, तो उसके मायने सिर्फ सिनेमा तक सीमित नहीं रहते. इसे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अपने पैर पसारने और क्षेत्रीय 'कैपिटल्स' के साथ मधुर संबंध बनाए रखने की क्रोनोलॉजी से जोड़कर देखा जा रहा है.

दक्षिण भारत में मेगा फैमिली का राजनीतिक रसूख

दक्षिण भारत में चिरंजीवी परिवार को 'मेगा फैमिली' कहा जाता है, जिसका सिनेमा और राजनीति दोनों में जबरदस्त रसूख है. चिरंजीवी आंध्र की राजनीति में बड़ा दांव खेल चुके हैं. उनके छोटे भाई पवन कल्याण आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और जनसेना पार्टी (JSP) के प्रमुख हैं. आंध्र प्रदेश की कुल आबादी में अच्छी-खासी हिस्सेदारी रखने वाले कापू (Kapu) समुदाय में इस परिवार का जबरदस्त सामाजिक और भावनात्मक प्रभाव है, जो किसी भी चुनाव का पासा पलटने का माद्दा रखता है. यही कारण है कि दिल्ली की सत्ता पर बैठी बीजेपी इस परिवार को हमेशा बेहद अहमियत देती है.

मुलाकात में क्यों नहीं दिखे पवन कल्याण?

इस मुलाकात के दौरान सबकी निगाहें आंध्र प्रदेश के डिप्टी सीएम और जनसेना प्रमुख पवन कल्याण को ढूंढ रही थीं. पवन कल्याण के इस मुलाकात में साथ न होने के पीछे कोई राजनीतिक खटास नहीं, बल्कि विशुद्ध प्रशासनिक और प्रोटोकॉल की वजहें मानी जा रही हैं. यह बैठक चिरंजीवी के व्यक्तिगत हैदराबाद आवास पर एक पारिवारिक और फिल्म इंडस्ट्री के डेलिगेशन के तौर पर आयोजित की गई थी, जबकि पवन कल्याण आंध्र प्रदेश में अपनी सरकारी और पार्टी की व्यस्तताओं में थे. जानकारों का कहना है कि पवन कल्याण पहले ही एनडीए के जरिए अमित शाह और पीएम मोदी के सीधे संपर्क में हैं, इसलिए इस पारिवारिक-कम-इंडस्ट्री बैठक में उनके न रहने का कोई नकारात्मक राजनीतिक संदेश नहीं निकाला जाना चाहिए.

क्या राजनीति में एंट्री करेंगे राम चरण?

'आरआरआर' और 'गेम चेंजर' जैसी फिल्मों से ग्लोबल स्टार बन चुके राम चरण की राजनीतिक एंट्री को लेकर अक्सर कयास लगते रहे हैं. हाल ही में तमिल सुपरस्टार थलपति विजय की बड़ी राजनीतिक रैली और सफलता के बाद प्रशंसकों का दबाव राम चरण पर भी था कि वे राजनीति की कमान संभालें. हालांकि, राम चरण ने अपनी राजनीतिक लाइन बिल्कुल क्रिस्टल क्लियर रखी है. उन्होंने बार-बार कहा है, "पॉलिटिक्स मेरा रास्ता नहीं है, मैं कभी राजनीति में नहीं आऊंगा. मेरे लिए दो नावों पर एक साथ सवार होना बहुत मुश्किल है और मेरा पूरा ध्यान सिर्फ देश का सबसे बड़ा एंटरटेनर बनने पर है." हालांकि, वे अपने चाचा पवन कल्याण की जनसेना पार्टी को पारिवारिक तौर पर नैतिक समर्थन हमेशा देते आए हैं.

प्रजा राज्यम पार्टी बनाकर चिरंजीवी ने की थी राजनीति में एंट्री

चिरंजीवी का अपना राजनीतिक सफर बेहद उतार-चढ़ाव भरा रहा है. साल 2008 में उन्होंने भारी जनसैलाब के बीच 'प्रजा राज्यम पार्टी' (PRP) बनाकर राजनीति में धमाकेदार एंट्री की थी, जिसमें पवन कल्याण ने भी उनका साथ दिया था. लेकिन 2009 के चुनावों में मनमाफिक सफलता न मिलने के बाद, 2011 में चिरंजीवी ने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया. कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा सांसद बनाया और मनमोहन सिंह की सरकार में केंद्रीय पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया.

आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद कांग्रेस से बनाई दूरी

2014 में जब कांग्रेस ने तेलंगाना राज्य बनाने के लिए आंध्र प्रदेश के विभाजन का फैसला लिया, तो चिरंजीवी आंध्र सेंटीमेंट के साथ गए. आंध्र विभाजन के विरोध में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा भी दे दिया था. राज्य विभाजन के कारण आंध्र प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ भयंकर गुस्सा पैदा हुआ और 2014 के चुनावों में पार्टी का पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया. इस करारी हार और अंदरूनी खींचतान के बाद, चिरंजीवी ने खुद को कांग्रेस की गतिविधियों और सक्रिय राजनीति से पूरी तरह दूर कर लिया. साल 2018 में उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद, उन्होंने तकनीकी तौर पर प्राथमिक सदस्यता भले ही नहीं छोड़ी हो, लेकिन उन्होंने साफ कर दिया कि राजनीति उनके लिए नहीं बनी है और वे जीवनभर राजनीति से दूर रहकर सिर्फ सिनेमा पर ध्यान केंद्रित करेंगे.

पवन कल्याण और चिरंजीवी के राजनीतिक रास्ते हुए अलग

चिरंजीवी का कांग्रेस में जाना छोटे भाई पवन कल्याण को कभी रास नहीं आया, जिसके बाद दोनों भाइयों के राजनीतिक रास्ते अलग हो गए. पवन कल्याण ने 2014 में अपनी अलग 'जनसेना पार्टी' बनाई. चिरंजीवी का सक्रिय राजनीतिक सफर तो धीरे-धीरे कांग्रेस के पतन के साथ खत्म हो गया और उन्होंने दोबारा फिल्मों का रुख कर लिया, लेकिन भाइयों के बीच का पारिवारिक रिश्ता हमेशा अटूट रहा. चिरंजीवी ने राजनीति छोड़ दी. पवन कल्याण जनसेना पार्टी के साथ लगे रहे और 2024 में उन्हें इसका रिजल्ट भी मिला. चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के साथ अलायंस के बाद उनका सिक्का चल निकला. आज जब पवन कल्याण आंध्र के डिप्टी सीएम हैं, तो चिरंजीवी एक अभिभावक के तौर पर उनके साथ खड़े नजर आते हैं. पवन कल्याण की चंद्रबाबू नायडू से ही नहीं, पीएम मोदी से भी बेहतरीन केमिस्ट्री है. पवन कल्याण के जरिए चिरंजीवी का परिवार कांग्रेस या टीडीपी नहीं, बल्कि बीजेपी के नजदीक नजर आता है.

अमित शाह की मुलाकात के पीछे क्या है राजनीतिक रणनीति?

तो क्या शाह से मिलने में वाकई कोई राजनीति है? देखा जाए तो इस मुलाकात के केंद्र में भले ही 'डीपफेक और एआई' का मुद्दा था, लेकिन राजनीति में टाइमिंग ही सब कुछ होती है. अमित शाह का हैदराबाद दौरा और ठीक इसी समय चिरंजीवी-राम चरण से उनके घर जाकर मिलना, दक्षिण में बीजेपी के कल्चरल आउटरीच का हिस्सा है. बीजेपी जानती है कि दक्षिण के राज्यों का किला फतह करने के लिए वहां के सिनेमाई और सामाजिक दिग्गजों का साथ या उनके साथ अच्छे संबंध होना कितना जरूरी है. मुलाकात भले ही चुनावी वैतरणी पार करने के लिए न हो, लेकिन दक्षिण में मेगा फैमिली की अहमियत को रेखांकित करने और भविष्य के समीकरणों को सुगठित रखने का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक जरूर है.

32 महीने बाद हैदराबाद पहुंचे अमित शाह

अमित शाह बहुत अरसे बाद हैदराबाद आए. बीजेपी के 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ' कैंपेन में शाह ने करीब डेढ़ किलोमीटर की पदयात्रा की. इससे पहले मार्च 2024 में हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ माधवी लता को चुनाव जिताने के लिए अमित शाह ने आक्रामक कैंपेन चलाया था. अमित शाह ने हैदराबाद की ओल्ड सिटी इलाके में विशाल रोडशो और चुनावी जनसभा की थी. चुनाव के लिहाज से यह बीजेपी का बेहद आक्रामक प्रचार अभियान था. हालांकि, बीजेपी की लाख कोशिशों के बाद भी वह हैदराबाद यानी मुसलमानों की बड़ी आबादी वाले शहर में जीत नहीं पाई.