Shesh Bharat: अमित शाह के सामने दक्षिण के 4 CM! महाबलीपुरम में बनेगा नया सियासी समीकरण

रूपक प्रियदर्शी

• 09:21 AM • 20 Aug 2026

अमित शाह की अध्यक्षता में महाबलीपुरम में Southern Zonal Council की बैठक हो रही है. इसमें दक्षिण भारत के मुख्यमंत्री केंद्र के साथ टैक्स, परिसीमन, भाषा, शिक्षा और नदी विवाद जैसे मुद्दे उठाएंगे. बैठक से पहले डीके शिवकुमार के दक्षिणी राज्यों की एकजुटता वाले बयान ने सियासी माहौल और गर्म कर दिया है.

amit shah
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पीएम मोदी से, गृह मंत्री अमित शाह से विपक्ष को राहुल गांधी को गैर-शासित राज्यों के सीएम को चाहे जितनी शिकायतें हों, उनसे मिलने जाना ही पड़ता है. जब बुलाएं तो मिलने आना ही पड़ता है. गुरुवार की बैठक अमित शाह ने बुलाई है, जिसमें दक्षिण भारत के राज्यों के सीएम को जाना है. Southern Zonal Council की हाई लेवल बैठक तमिलनाडु के महाबलीपुरम में हो रही है, जो केंद्र सरकार और दक्षिण भारतीय राज्यों के बीच समन्वय, सुरक्षा और विकास से जुड़े क्षेत्रीय मुद्दों को सुलझाने के लिए हो रही है. आंध्र के सीएम चंद्रबाबू नायडू, कर्नाटक के सीएम डीके शिवकुमार, तमिलनाडु के सीएम विजय, तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी, केरल के सीएम वीडी सतीशन, राज्यपालों, अपने-अपने मुख्य सचिवों और गृह सचिवों के साथ अमित शाह की टेबल पर बैठेंगे.

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Zonal Council का क्या है मकसद?

Zonal Council Statutory Body है, जिसे राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत बनाया गया था. इसका मकसद केंद्र और राज्यों के बीच सामाजिक-आर्थिक योजना, सीमा विवाद, भाषाई अल्पसंख्यकों और अंतर-राज्यीय परिवहन से जुड़े साझा मुद्दों पर आपसी सहमति और सहयोग से समाधान निकालना है. परिषद के अध्यक्ष देश के गृह मंत्री, जो अभी अमित शाह हैं, होते हैं और मेजबान राज्य के मुख्यमंत्री इसके उपाध्यक्ष. मतलब विजय उपाध्यक्ष हैं. अमित शाह से पहले राजनाथ सिंह गृह मंत्री होने के नाते ऐसी बैठकें लेते थे.

महाबलीपुरम में दक्षिण की सियासत का पावर सेंटर

महाबलीपुरम की यह बैठक सिर्फ कागजी एजेंडों पर चर्चा नहीं है, बल्कि यह दक्षिण भारत की राजनीति का वो पावर सेंटर है, जहां से अगले कुछ सालों की देश की राजनीति तय होगी. पानी की हर बूंद का हिसाब, टैक्स के हर रुपये की मांग और परिसीमन पर अपनी ताकत का अहसास कराने के लिए दक्षिण के मुख्यमंत्री पूरी तैयारी के साथ आ रहे हैं. ये ऐसी बैठक है, जिसमें अमित शाह का सामना आंध्र के चंद्रबाबू नायडू और पुद्दुचेरी के एन. रंगासामी को छोड़कर बाकी सारे गैर-बीजेपी, गैर-एनडीए सीएम से होना है. बैठक में कुल 3 सीएम डीके शिवकुमार, विजय और वीडी सतीशन पहली बार ऑफिशियली गृह मंत्री अमित शाह के मंच पर आमने-सामने बैठेंगे.

अमित शाह की बैठक से पहले डीके का बड़ा बयान

अमित शाह की बैठक से ठीक पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने दिल्ली से लेकर महाबलीपुरम तक सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है. विधानसभा के मंच से सीधे शाह और मोदी सरकार को चुनौती देते हुए डीके ने साफ कहा कि 'अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को एक ग्लोबल इकनॉमिक पावरहाउस बनाना चाहते हैं, तो यह सिर्फ तभी मुमकिन है, जब दक्षिण के सभी राज्य एकजुट होकर खड़े हों. बेंगलुरु में लाखों आईटी प्रोफेशनल्स और विदेशी पासपोर्ट धारकों की ताकत का हवाला देते हुए उन्होंने साफ संदेश दिया कि देश की आर्थिक रीढ़ दक्षिण के पास है, इसलिए दिल्ली उन्हें नजरअंदाज करने की भूल कतई न करे. शाह की टेबल पर बैठने से पहले डीके का यह 'साउथ सिंडिकेट' बनाने का खुला ऐलान महज एक बयान नहीं, बल्कि केंद्र के खिलाफ दक्षिण के मुख्यमंत्रियों को लामबंद करने का वो सीधा पॉलिटिकल प्रेशर है, जिसने महाबलीपुरम की इस सरकारी बैठक को 'दिल्ली बनाम दक्षिण' के हाई-वोल्टेज अखाड़े में तब्दील कर दिया है.

पैसे, पावर और राजनीतिक वजूद की लड़ाई

बैठक ऐसे समय हो रही है, जब साउथ के कई सीएम केंद्र सरकार से भिड़े हुए हैं. बीजेपी और दक्षिण के मुख्यमंत्रियों के बीच की यह लड़ाई सिर्फ विचारधारा की नहीं, बल्कि पैसे, पावर और राजनीतिक वजूद की है, जिसे दक्षिण के नेता 'तरक्की की सजा' बता रहे हैं. इस महासंग्राम के तीन बड़े मोर्चे हैं - पहला वित्तीय अन्याय, जहां कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्य आरोप लगाते हैं कि वे दिल्ली के खजाने में ₹100 का टैक्स देते हैं तो बदले में उन्हें मात्र 13 से 29 पैसे वापस मिलते हैं, जबकि उत्तर भारत के राज्यों को ₹200 से ₹700 तक लौटाए जाते हैं.

परिसीमन और दक्षिण की सीटों का डर

दूसरा और सबसे विस्फोटक मुद्दा है 2026 का लोकसभा परिसीमन. विपक्ष का आरोप है कि जनसंख्या नियंत्रण और शिक्षा में बेहतरीन काम करने के बावजूद, आबादी के नए गणित से दक्षिण की संसदीय सीटें कम हो जाएंगी और देश की सत्ता की चाबी पूरी तरह उत्तर भारत के पास चली जाएगी. तीसरा मोर्चा है क्षेत्रीय स्वाभिमान बनाम केंद्रीय जांच एजेंसियां और भाषाई विवाद. केरल, तेलंगाना और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों का सीधा आरोप है कि बीजेपी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) को दक्षिण से हटाकर गुजरात ले जाने का दबाव बनाती है, हिंदी थोपने की कोशिश करती है और राजभवनों व केंद्रीय एजेंसियों (ED/CBI) के जरिए विपक्षी सरकारों को काम नहीं करने देती. यही वजह है कि महाबलीपुरम की यह टेबल सरकारी से ज्यादा राजनीतिक हो चुकी है, जहां एक तरफ बीजेपी अपना 'मिशन साउथ' बचाना चाहती है, तो दूसरी तरफ दक्षिण के सुल्तान अपना वजूद. जिस तमिलनाडु में ये सब हो रहा है, उसके सीएम विजय के अपने मुद्दे हैं. नीट परीक्षा को रद्द करने, डिलिमिटेशन का विवाद और शिक्षा के लिए रुका हुआ फंड, जो थ्री लैंग्वेज पॉलिसी के विवाद में फंसा है.

कावेरी और मेकेदातु प्रोजेक्ट पर टकराव

राज्यों के आपसी मुद्दे भी हैं, जिसकी पंचायत अमित शाह को करनी पड़ सकती है. कावेरी नदी पर मेकेदातु प्रोजेक्ट को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक में तलवारें खींची हैं. विजय केंद्र सरकार से मांग कर चुके हैं कि वो कर्नाटक को मेकेदातु प्रोजेक्ट शुरू करने से रोके. दोनों राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट में भी केस किया हुआ है. आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम (2014) के तहत दोनों राज्यों के बीच संपत्तियों का बंटवारा, बिजली बिलों का बकाया और कृष्णा-गोदावरी नदी के पानी के बंटवारे जैसे 9 से अधिक गंभीर पेंडिंग मुद्दों पर दोनों नेता शाह की मौजूदगी में आर-पार की बात करेंगे.

अमित शाह के लिए साउथ आउटरीच का मौका

अमित शाह के लिए जोनल काउंसिल की बैठक साउथ के सीएम के साथ सीधे संबंध बनाने का मौका है. दक्षिण भारत में पैर पसारने की कोशिश में जुटी बीजेपी के लिए यह बैठक एक 'सॉफ्ट डिप्लोमेसी' का भी जरिया है. ऐसी बैठकें पहले भी होती रहीं, लेकिन कम चर्चा के साथ. ऐसे में अमित शाह का खुद आकर इस बैठक की अध्यक्षता करना यह संदेश देता है कि केंद्र सरकार 'कोऑपरेटिव फेडरलिज्म' के तहत दक्षिण को साथ लेकर चलना चाहती है, जबकि विपक्षी मुख्यमंत्री एकजुट होकर केंद्र पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं.

'टीम भारत' और 'सबका साथ, सबका विकास' पर जोर

पीएम मोदी के 'टीम भारत' और 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे को जमीन पर उतारने में इन क्षेत्रीय परिषदों (Zonal Councils) ने बड़ी भूमिका निभाई है. हालांकि 1956 में गठन के बाद से Southern Zonal Council की बैठकें सरकारी रस्म बनकर रह गई थीं. साल 2014 से पहले तक इन परिषदों की साल में औसतन केवल दो बैठकें हुआ करती थीं, लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद और खासकर गृह मंत्री अमित शाह के कमान संभालने के बाद इन बैठकों की रफ्तार और धार दोनों बदल गई है. मोदी सरकार के समय क्षेत्रीय परिषदों की 69 से ज्यादा बैठकें बुलाई जा चुकी हैं. जहां 2006 से 2013 के बीच महज 104 मुद्दों पर चर्चा हुई थी, वहीं बीते आठ से दस सालों में 555 से ज्यादा क्षेत्रीय मुद्दों को इस टेबल पर लाया गया, जिनमें से 64 फीसदी से ज्यादा विवादों को आपसी सहमति से सुलझा लिया गया.

तिरुपति से तिरुवनंतपुरम तक बैठक का इतिहास

इससे पहले 29वीं बैठक साल 2021 में आंध्र प्रदेश के तिरुपति में हुई थी, जहां शाह ने तटीय सुरक्षा और बुनियादी ढांचे पर जोर दिया था. इसके बाद 30वीं ऐतिहासिक बैठक सितंबर 2022 में केरल के तिरुवनंतपुरम में आयोजित की गई थी, जिसमें कावेरी और कृष्णा नदी जल विवाद के साथ-साथ आंध्र प्रदेश पुनर्गठन के पेंडिंग पड़े 26 बड़े मुद्दों पर बहस हुई थी और 9 गंभीर मसलों का ऑन-द-स्पॉट निपटारा किया गया था. अब महाबलीपुरम की यह 31वीं बैठक इसी इतिहास को आगे बढ़ाते हुए गतिरोध तोड़ने का एक नया अध्याय लिखने जा रही है.

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