Shesh Bharat: असम चुनाव में 'झारखंड एंगल' की एंट्री, क्या सोरेन दिलाएंगे कांग्रेस को सत्ता?

असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए कांग्रेस नेता गौरव गोगोई ने झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन से मुलाकात की है. इस मुलाकात का मकसद असम के चाय बागान मजदूरों और आदिवासी वोटों को साधना है, जो राज्य की करीब 40 सीटों पर हार-जीत तय करते हैं.

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रूपक प्रियदर्शी

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Shesh Bharat: असम विधानसभा चुनाव 2026 की आहट के साथ ही सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है. कांग्रेस के दिग्गज नेता गौरव गोगोई हाल ही में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलने रांची पहुंचे. कहने को तो यह एक 'शिष्टाचार भेंट' थी, लेकिन इसके पीछे असम की सत्ता तक पहुंचने की एक गहरी रणनीति छिपी है.

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क्यों अहम है यह मुलाकात?

असम की राजनीति में चाय बागान मजदूर और आदिवासी समुदाय सबसे बड़ी ताकत हैं. राज्य की करीब 17% से 20% आबादी इसी वर्ग से आती है. ये वोटर्स राज्य की 126 में से लगभग 40 सीटों पर सीधा असर डालते हैं. दिलचस्प बात यह है कि असम के ये आदिवासी मूल रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा से जाकर वहां बसे हैं. हेमंत सोरेन इसी 'कनेक्शन' के जरिए असम में अपनी पैठ बना रहे हैं.

वोटों के बिखराव को रोकने की चुनौती

हेमंत सोरेन की पार्टी (JMM) ने असम में चुनाव लड़ने के संकेत दिए हैं. सोरेन ने तिनसुकिया में रैली कर 'अबुआ दिशुम, अबुआ राज' (हमारा देश, हमारा राज) का नारा भी दिया है. कांग्रेस को डर है कि अगर JMM अकेले चुनाव लड़ती है, तो वह विपक्षी वोटों को काट सकती है, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को होगा. गौरव गोगोई इसी बिखराव को रोकने के लिए सोरेन को 'INDIA' गठबंधन के साथ मजबूती से जोड़ना चाहते हैं.

इन मुद्दों पर टिकी है नजर

असम में आदिवासियों के लिए ST (अनुसूचित जनजाति) का दर्जा, जमीन के अधिकार और चाय बागान मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बड़े मुद्दे हैं. हेमंत सोरेन इन मांगों को पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं. कांग्रेस चाहती है कि सोरेन के जरिए यह संदेश जाए कि आदिवासियों की लड़ाई लड़ने वाला असली चेहरा उनके साथ है.

बीजेपी के गढ़ में सेंधमारी की तैयारी

2021 के चुनाव में चाय समुदाय वाली 37 सीटों में से बीजेपी गठबंधन ने 34 सीटें जीती थीं. गौरव गोगोई और हेमंत सोरेन की यह जोड़ी इसी 'क्लीन स्वीप' को रोकने की तैयारी में है. कांग्रेस ने अपनी पहली 42 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी है और खुद गौरव गोगोई जोरहाट से मैदान में हैं. अब देखना होगा कि झारखंड का यह 'असम प्लान' कितना कामयाब होता है.

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