Shesh Bharat: सियासत की पिच पर क्या मोहम्मद अजहरुद्दीन क्लीन बोल्ड होने वाले हैं? क्या हैदराबाद के नवाब को अपनी मंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ेगी? तेलंगाना की राजनीति में इस वक्त एक दिलचस्प सस्पेंस थ्रिलर चल रहा है. एक-एक दिन, एक-एक पल भारी है. सेंटर में पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान और मौजूदा कैबिनेट मंत्री मोहम्मद अजहरुद्दीन. मोहम्मद अजहरुद्दीन की मंत्री की कुर्सी पर इस्तीफे की तलवार लटक रही है. वजह न तो कोई घोटाला है और न ही कोई नाराजगी, बल्कि वजह है संवैधानिक डेडलाइन.
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99 टेस्ट मैच खेलने के बाद मोहम्मद अजहरूद्दीन का एक्सीडेंटल क्रिकेट रिटायरमेंट हुआ. 99 टेस्ट पर ऐसे रूके कि 100वां टेस्ट खेलने को तरस गए. मैच फिक्सिंग के आरोप लगते ही अजहरुद्दीन का करियर बैठ गया. बाद में मैच फिक्सिंग का दाग तो धुला लेकिन अजहर वापसी नहीं कर पाए. राजनीति में आए लेकिन क्रिकेट की तरह ही उतार-चढ़ाव चल रहा है. कांग्रेस में राहुल गांधी ने ले लिया. 2009 में कांग्रेस के टिकट पर उत्तर प्रदेश की मुरादाबाद सीट से लोकसभा चुनाव जीतकर सांसद बने.
2014 के चुनाव में उन्होंने राजस्थान की टोंक-सवाई माधोपुर सीट से किस्मत आजमाई, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. तब से अजहर के लिए चीजें खराब होने लगी. एकदम पॉलिटिक्स साइलेंट हो गई. लौट गए अपने होम स्टेट तेलंगाना. बरसों तक किनारे लगे रहने के बाद होम स्टेट तेलंगाना पहुंचे रेवंत रेड्डी के पास. रेवंत रेड्डी ने मोहम्मद अजहरूद्दीन की उपयोगिता देखी. राजनीति में संजीवनी का खाद-पानी डाला.
2018 में तेलंगाना कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. 2023 के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में उन्होंने हैदराबाद की हाई-प्रोफाइल जुबली हिल्स सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन वहां भी हार हो गई. हार के बावजूद, राहुल गांधी और रेवंत रेड्डी ने प्रोफाइल, मुसलमान चेहरे के कारण सीधे कैबिनेट मंत्री बना दिया. उसी समय से शर्त चिपक गई कि 30 अप्रैल तक MLC बनना पड़ेगा. तेलंगाना में एक्टिव करके कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों को साधने की बड़ी चाल चली. अजहर के बेटे मोहम्मद असदुद्दीन को तेलंगाना कांग्रेस का वर्किंग प्रेसीडेंट बनाया. जुबली हिल्स में उपचुनाव हुआ तो अजहर को टिकट न देकर राहुल गांधी और रेवंत रेड्डी ने अजहर को MLC बनाने का फैसला किया.
अजहरुद्दीन रेवंत रेड्डी कैबिनेट में इकलौते मुस्लिम चेहरा हैं और उनके पास अल्पसंख्यक कल्याण (Minorities Welfare) विभाग है. कांग्रेस के लिए वो एक बड़ा 'क्राउड पुलर' हैं, खासकर हैदराबाद और जुबली हिल्स जैसे इलाकों में.
अजहरुद्दीन ने 31 अक्टूबर, 2025 को तेलंगाना सरकार में मंत्री के रूप में शपथ ली थी. संविधान के नियमों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति विधायक (MLA) या विधान परिषद सदस्य (MLC) नहीं है, तो वह केवल 6 महीने तक ही मंत्री रह सकता है. अजहर की यह मियाद 30 अप्रैल, 2026 को खत्म हो रही है. रेवंत रेड्डी ने अजहर को राज्यपाल कोटे से MLC बनाने की सिफारिश की थी लेकिन राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला ने अभी तक फाइल पर साइन नहीं किए. अजहर का मामला जिष्णु देव वर्मा के राज्यपाल होने के समय से पेंडिंग है.
क्या इसके पीछे बीजेपी नेता रहे राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला की कोई राजनीति या कुछ और. रेवंत रेड्डी और राज्यपाल के बीच ऐसा कोई विवाद नहीं चल रहा है. अब तक मंजूरी न देने के पीछे एक बड़ा कारण सुप्रीम कोर्ट भी है. राज्यपाल कोटे की नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई चल रही है.
कारण जो सामने आ रहे कि बीआरएस (BRS) सरकार के समय से ही राज्यपाल कोटे की नियुक्तियों को लेकर अदालती विवाद चल रहा है. बीआरएस (BRS) नेताओं, दासोजू श्रवण और कुर्रा सत्यनारायण ने अपनी पिछली नियुक्तियों के रद्द होने को अदालत में चुनौती दी थी. राज्यपाल संभवतः कोर्ट के अंतिम फैसले जिसकी अगली सुनवाई 22 जुलाई को है उसका इंतजार कर रहे हैं ताकि कोई संवैधानिक संकट न खड़ा हो. राज्यपाल के पास कुछ ऐसी शिकायतें भी पहुंची हैं जिनमें हैदराबाद क्रिकेट एसोसिएशन (HCA) से जुड़े पुराने मामलों का हवाला देकर अजहर के नामांकन पर आपत्ति जताई गई है. उनकी विधान परिषद (MLC) सदस्यता को लेकर राज्यपाल की तरफ से अब तक हरी झंडी नहीं मिली है.
राज्यपाल कोटे के तहत उन्हीं व्यक्तियों को नामांकित किया जाता है जिन्होंने साहित्य, विज्ञान, कला या समाज सेवा में विशेष योगदान दिया हो. अजहरुद्दीन का राजनीतिक करियर पूर्व सांसद और चुनाव उम्मीदवार राज्यपाल के लिए एक विचारणीय मुद्दा हो सकता है, क्योंकि पहले भी इसी आधार पर कुछ नियुक्तियां खारिज हो चुकी हैं. कुछ रिपोर्टों ये भी है कि राज्यपाल के पास अजहरुद्दीन के खिलाफ हैदराबाद क्रिकेट एसोसिएशन (HCA) से जुड़े पुराने भ्रष्टाचार के आरोपों और शिकायतों के आधार पर आपत्तियां भेजी गई हैं, जिन्हें वे नामांकन से पहले जांचना चाहते हैं.
ये सब तब हो रहा है जब सीएम रेवंत रेड्डी ने अजहर को बचाने के लिए सारा जोर लगाया हुआ है. 19 अप्रैल को व्यक्तिगत रूप से राज्यपाल से मिलकर अजहरुद्दीन के लिए 30 अप्रैल की डेडलाइन की याद दिलाई और जल्द मंजूरी की अपील की थी. राज्यपाल ने अपने अधिकार के तहत अजहर की फाइल, रेवंत की अपील पर सब पर फैसला रोका हुआ है. सवाल ये है कि 30 अप्रैल से पहले राज्यपाल अजहर के लिए ग्रीन सिग्नल देंगे या अजहर का इस्तीफा मंजूर करेंगे.
अगर 30 अप्रैल तक राज्यपाल का अप्रूवल नहीं आता, तो अजहर को इस्तीफा देना ही होगा. लेकिन चर्चा है कि कांग्रेस उन्हें खोना नहीं चाहती. पार्टी का प्लान-B ये है कि अजहर 30 अप्रैल को इस्तीफा तो दे सकते हैं लेकिन कुछ दिनों बाद उन्हें दोबारा मंत्री पद की शपथ दिला दी जाएगी, जिससे उन्हें सदस्यता हासिल करने के लिए फिर से 6 महीने का नया समय मिल जाएगा. दूसरा तरीका ये है कि तेलंगाना में मई में कैबिनेट फेरबदल की चर्चा है. हो सकता है अजहर के मुसलमान चेहरा होने के नाते रेवंत रेड्डी दूसरे रास्ते से फिर से मंत्री बन पाएं. हालांकि इसके लिए भी राज्यपाल की मंजूरी की जरूरत होगी. सरकार मंत्री बनाने की सिफारिश करेगी लेकिन फाइनल मंजूरी तो फिर राज्यपाल की ही लगेगी. मुश्किल ये है कि तेलंगाना में आगे कोई उपचुनाव भी नहीं होने वाला जिसमें अजहर को टिकट देकर विधायक बनवाने की कोशिश की जाए.
तेलंगाना में मुसलमानों की आबादी 12 परसेंट से ज्यादा है. इतने मुसलमान होने पर भी कांग्रेस में कोई बड़ा मुसलमान चेहरा नहीं है. रेवंत रेड्डी की करीब ढाई साल पुरानी सरकार में भी कोई मुसलमान मंत्री नहीं है. अक्सर कांग्रेस और रेवंत रेड्डी को इसके लिए सुनना पड़ रहा था. मुसलमानों को मैसेज देने के लिए मोहम्मद अजहरूद्दीन को प्रमोशन मिले.
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