Shesh Bharat: 14 साल बाद कावेरी पर बातचीत, विजय-DKS की दोस्ती क्या खत्म कर पाएगी पानी की जंग?

रूपक प्रियदर्शी

• 08:38 AM • 25 Jul 2026

दक्षिण भारत में नदियों का पानी राज्यों को जोड़ने के साथ सियासी जंग की वजह भी बनता है. कावेरी विवाद को सुलझाने के लिए तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय 3 अगस्त को बेंगलुरु में कर्नाटक के सीएम डी.के. शिवकुमार से मिलेंगे.

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दक्षिण भारत के पांचों राज्यों की नस-नस में बहता नदियों का पानी ही वह सूत्र है, जो इन्हें भौगोलिक रूप से एक-दूसरे के गले का हार भी बनाता है और सियासी रूप से आर-पार की जंग का मैदान भी. पश्चिमी घाट (Western Ghats) की पहाड़ियों से निकलने वाली कावेरी, कृष्णा, गोदावरी और पेरियार जैसी जीवनदायिनी नदियाँ किसी राज्य की राजनीतिक सीमा को नहीं मानतीं; वे कर्नाटक और केरल के पहाड़ों से जन्म लेकर आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु के खेतों को सींचती हुई बंगाल की खाड़ी में समा जाती हैं.

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सदियों से चला आ रहा पानी का यह सफर इन राज्यों के करोड़ों किसानों की किस्मत, यहाँ की संस्कृति और अर्थव्यवस्था (इकोनॉमी) को एक साथ जोड़ता है जहां एक राज्य की भारी बारिश दूसरे की प्यास बुझाती है, वहीं एक राज्य का सूखा पूरे दक्षिण की सियासत में उबाल ला देता है. इन नदियों के पानी के लिए इन राज्यों में लंबे समय तक जंग चली. इस जंग की खास बात यह रही कि सरकारें चाहे किसी भी पार्टी की हों, पानी के सवाल पर पार्टी पॉलिटिक्स नहीं, बल्कि राज्यों का हित ही सबसे ऊपर रहता है.

14 साल बाद कावेरी विवाद पर महा-बैठक का ऐलान

कर्नाटक में डीके शिवकुमार और तमिलनाडु में थलापति विजय की सरकार बनने के बाद दक्षिण भारत की राजनीति में एक ऐसा यू-टर्न आया है जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी. दशकों पुराना, जज्बाती और हिंसक इतिहास समेटे हुए 'कावेरी नदी जल विवाद' को सुलझाने के लिए एक महा-बैठक होने जा रही है.

इस मुलाकात की पहल खुद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने की थी. उन्होंने करीब एक हफ्ते पहले कर्नाटक के सीएम डीके शिवकुमार को पत्र लिखकर कावेरी और मेकेदातु मुद्दे पर मिलने का समय मांगा था. इसके जवाब में डीके शिवकुमार ने इस पहल का स्वागत करते हुए उन्हें 3 अगस्त को बेंगलुरु आने का न्योता दिया. अब तमिलनाडु के कृषि मंत्री आर. विनोद ने कन्फर्म कर दिया है कि मुख्यमंत्री विजय 3 अगस्त को बेंगलुरु का दौरा करेंगे, ताकि कर्नाटक के सीएम डीके शिवकुमार के साथ सीधे टेबल पर बात हो सके. यह सिर्फ पानी की जंग नहीं है, यह दो राज्यों के बीच 14 साल से जारी उस सन्नाटे के टूटने की कहानी है जिसने सियासत को हमेशा गरमाए रखा. आखिर क्या है इस मुलाकात का इनसाइड ट्रैक और क्या है इसका असली पॉलिटिकल एंगल?

अघोषित नीति तोड़कर विजय ने चुना 'आउट-ऑफ-कोर्ट' रास्ता

कावेरी बेसिन में इस साल कम बारिश के कारण कर्नाटक ने तमिलनाडु का पानी रोक दिया था, जिससे तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्रों में किसानों का गुस्सा भड़क रहा था. सुप्रीम कोर्ट और ट्रिब्यूनल के चक्कर काटने में महीनों का वक्त लग सकता था, इसलिए तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने कानूनी लड़ाई के साथ-साथ एक समानांतर 'पॉलिटिकल रूट' तलाशने का फैसला किया.

2011-12 के बाद से तमिलनाडु की राजनीति में (चाहे सरकार में जयललिता रही हों या एम.के. स्टालिन) यह एक तय और अघोषित नीति बन चुकी थी कि कावेरी जल विवाद पर कर्नाटक सरकार से आमने-सामने बैठकर कोई द्विपक्षीय बातचीत (Bilateral Talks) नहीं की जाएगी. तमिलनाडु का साफ मानना था कि कर्नाटक हमेशा बातचीत के बहाने समय बर्बाद करता है और पानी देने में देरी करता है. इसलिए तमिलनाडु ने तय किया था कि वे सिर्फ सुप्रीम कोर्ट, कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) और ट्रिब्यूनल के कानूनी आदेशों के जरिए ही अपना हक मांगेंगे, किसी राजनेता के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे. सीएम विजय ने इस जिद की नीति को तोड़ते हुए 'आउट-ऑफ-कोर्ट' संवाद का रास्ता चुना है, जो दिखाता है कि उनकी राजनीति का ढर्रा पारंपरिक पार्टियों से बिल्कुल अलग है.

मेकेदातु प्रोजेक्ट: बातचीत की मेज पर सबसे बड़ा कांटा

इस द्विपक्षीय बातचीत की मेज पर सबसे बड़ा कांटा 'मेकेदातु डैम प्रोजेक्ट' है. कर्नाटक के सीएम डीके शिवकुमार बेंगलुरु की प्यास बुझाने के लिए मेकेदातु में हर हाल में बांध बनाना चाहते हैं. वहीं, विजय की सरकार भी अड़ी है कि ऐसा होने नहीं देना है. जून में तमिलनाडु विधानसभा में सीएम विजय ने कर्नाटक के बांध बनाने के इरादे के खिलाफ एकतरफा कड़ा प्रस्ताव पास कराया था. तमिलनाडु का मानना है कि अगर कर्नाटक ने बांध बना लिया, तो उनके डेल्टा क्षेत्र और कावेरी बेसिन के किसानों की किस्मत की चाबी पूरी तरह कर्नाटक के हाथ में चली जाएगी. किसानों को मिलने वाला पानी पूरी तरह कर्नाटक के नियंत्रण में आ जाएगा, जिससे वहाँ सूखा पड़ जाएगा.

मेकेदातु परियोजना पर दोनों राज्यों का स्टैंड बिल्कुल आर-पार की लड़ाई जैसा है. डीके शिवकुमार का साफ स्टैंड है कि बेंगलुरु की पेयजल किल्लत को दूर करने के लिए मेकेदातु बांध का निर्माण हर हाल में किया जाएगा. इसके उलट, तमिलनाडु के सीएम विजय का भी कड़ा स्टैंड है कि वे मेकेदातु में एक इंच भी निर्माण नहीं होने देंगे. इसके लिए वे पीएम मोदी से भी हस्तक्षेप करने की अपील कर चुके हैं.

राजनीतिक समीकरण और गठबंधन की उलझन

मेकेदातु प्रोजेक्ट के विवाद में अच्छी बात यह है कि कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों में समान विचारधारा वाली सरकारों का प्रभाव है. कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, जबकि तमिलनाडु में विजय की सरकार में कांग्रेस पार्टनर है. कर्नाटक में जब डीके बांध के लिए अड़े हैं, तो तमिलनाडु कांग्रेस अध्यक्ष मणिक्कम टैगोर उनके खिलाफ बयान देते हैं कि वे यह काम होने नहीं देंगे. पार्टी पॉलिटिक्स के लिहाज से कोई भी यह रिस्क नहीं ले सकता कि अपने राज्य के लोगों की नाराजगी मोल ली जाए.

विजय और DKS की केमिस्ट्री

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान दोनों के बीच काफी तल्खी थी, जब टीवीके (TVK) प्रमुख विजय ने तिरुनेलवेली की जनसभा में कांग्रेस के एक धड़े पर बिकने का आरोप लगाया था. तब डीके शिवकुमार ने चेन्नई जाकर विजय को 'एक अपरिपक्व नेता' बताकर खिल्ली उड़ाई थी. हालांकि, मई में जब चुनाव के नतीजे आए और विजय ऐतिहासिक जीत दर्ज कर मुख्यमंत्री बने, तो राजनीति पूरी तरह बदल गई. चुनाव के बाद कांग्रेस ने तमिलनाडु में विजय की टीवीके सरकार को बाहर से समर्थन दे दिया. इसके तुरंत बाद डीके शिवकुमार ने अपनी पुरानी कड़वाहट भूलकर बड़े भाई की तरह विजय को फोन पर बधाई दी, जिसका वीडियो भी वायरल हुआ था. शिवकुमार ने फोन पर विजय की तारीफ करते हुए कहा था, "आपने इतिहास रच दिया है, युवाओं के जज्बात आपके साथ हैं और सरकार चलाने में हमारा पूरा समर्थन आपके साथ रहेगा."

इसी सुधरी हुई पर्सनल केमिस्ट्री और बदले राजनीतिक समीकरणों का नतीजा है कि आज दोनों नेता कावेरी और मेकेदातु जैसे जटिल मुद्दे पर सीधी बातचीत की मेज तक पहुँच सके हैं. राजनीतिक रूप से दोनों नेताओं के संबंध सहज हैं क्योंकि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार और तमिलनाडु की विजय सरकार के बीच मधुर संबंध हैं. लेकिन असली परीक्षा जनभावनाओं की है. तमिलनाडु में DMK और AIADMK घात लगाए बैठे हैं कि अगर विजय ने बातचीत में जरा भी नरमी दिखाई, तो उन्हें 'तमिलनाडु विरोधी' घोषित कर दिया जाए. वहीं, डीके शिवकुमार पर भी कर्नाटक के हितों की रक्षा करने का भारी दबाव है.

क्या है मेकेदातु डैम प्रोजेक्ट और क्यों है इस पर विवाद?

मेकेदातु प्रोजेक्ट (Mekedatu Dam Project) करीब 9,000 करोड़ रुपये की लागत वाली एक बहुउद्देशीय 'संतुलन जलाशय परियोजना' (Balancing Reservoir Project) है, जिसे कर्नाटक सरकार तमिलनाडु सीमा से महज 4 किलोमीटर पहले कावेरी और उसकी सहायक नदी अर्कावती के संगम (मेकेदातु गॉर्ज) पर बनाना चाहती है. इस प्रोजेक्ट का मुख्य मकसद मानसून के दौरान समुद्र में बेकार बह जाने वाले अतिरिक्त पानी को रोककर 67 TMC (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) पानी स्टोर करना है, ताकि गंभीर जल संकट से जूझ रहे बेंगलुरु शहर को रोजाना 4.75 TMC पीने का साफ पानी पहुंचाया जा सके और साथ ही 400 मेगावाट पनबिजली (Hydroelectric Power) पैदा की जा सके.

कावेरी नदी से इसका जुड़ाव बेहद संवेदनशील है, क्योंकि मेकेदातु कर्नाटक का वह आखिरी छोर है जहाँ से कावेरी का पानी बिना किसी रोक-टोक के सीधे तमिलनाडु की सीमा में प्रवेश करता है. तमिलनाडु का आरोप है कि अगर कर्नाटक ने इस आखिरी बहाव बिंदु पर इतना बड़ा बांध बना लिया, तो निचले राज्य (Lower Riparian State) होने के नाते उनके हिस्से के पानी की चाबी पूरी तरह कर्नाटक के हाथ में आ जाएगी और तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र के लाखों किसानों के खेत पूरी तरह सूख जाएंगे.