Cauvery Water Dispute: पचास साल पुराना पानी का एक ऐसा विवाद, जिसने दो राज्यों के बीच दुश्मनी की दीवार खड़ी कर दी. एक नदी, जिसे दोनों राज्य अपनी मां कहते हैं, लेकिन उसी के बंटवारे पर हर साल युद्ध छिड़ जाता है. तमिलनाडु से लेकर कर्नाटक तक इन दिनों भूचाल आया हुआ है. सेंटर में है कावेरी नदी पर बनने वाला 'मेकेदातु बांध'.
ADVERTISEMENT
14 साल बाद आमने-सामने बातचीत की तैयारी
कहानी में ट्विस्ट तब आया, जब 14 साल का गतिरोध तोड़कर तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री थलापति विजय ने 3 अगस्त को बेंगलुरु में कर्नाटक सीएम डी.के. शिवकुमार से फेस-टू-फेस मीटिंग करने की ठानी. मुलाकात से पहले ही चेन्नई से लेकर बेंगलुरु तक सियासी तलवारें खिंच चुकी हैं. विपक्ष इसे तमिलनाडु का 'सरेंडर' कह रहा है, तो कर्नाटक इसे अपनी 'जीत' मान रहा है. लगभग 14 साल के लंबे अंतराल के बाद दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच यह पहली आमने-सामने की बातचीत होने जा रही है, जिसने दोनों राज्यों की सियासत में हलचल तेज कर दी है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और केंद्र के बयान से नया मोड़
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट हाल ही में संसद और कानूनी गलियारों से निकलकर आया है. सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में कावेरी जल विवाद पर अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए दोनों राज्यों का पानी का कोटा तय कर दिया था. सामान्य मानसून साल में तमिलनाडु को 404.25 TMC और कर्नाटक को 284.75 TMC पानी मिलना तय है. दो दिन पहले केंद्र सरकार के जल शक्ति मंत्रालय ने संसद में एक बड़ा लिखित बयान दिया, जिसने तमिलनाडु में आग लगा दी है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कर्नाटक को मेकेदातु में 'बैलेंसिंग रिजर्वोइयर' (बांध) बनाने के लिए तमिलनाडु या किसी और राज्य की सहमति लेने की कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है.
विपक्ष ने विजय की रणनीति को बताया 'सरेंडर'
इस बयान ने विपक्ष के हाथों में जलता हुआ कोयला दे दिया. पूर्व सीएम एम.के. स्टालिन और एआईएडीएमके ने विजय को घेरते हुए कहा कि 'जब केंद्र और कर्नाटक मिलकर तमिलनाडु के पैरों तले से जमीन खिसका रहे हैं, तो विजय खुद चिट्ठी लिखकर मिलने का समय क्यों मांग रहे हैं? यह सीधे तौर पर सरेंडर है.'
पीएम मोदी को विजय ने लिखा सख्त खत
चौतरफा घिरे विजय ने तुरंत डैमेज कंट्रोल करते हुए पीएम मोदी को एक बेहद सख्त खत लिखा और केंद्र के बयान को कानूनी रूप से गलत बताते हुए मेकेदातु की मंजूरियां रोकने की मांग की है. यानी माहौल पूरी तरह पक चुका है. एक तरफ विजय अपने इस 'खुद के फैसले' के जरिए एक बड़े समाधानकर्ता बनने बेंगलुरु जा रहे हैं, तो वहीं चेन्नई में विपक्ष इसे खुदकुशी बताकर उनके इस्तीफे की जमीन तैयार कर रहा है!
स्टालिन समेत विपक्ष ने खोला मोर्चा
पूर्व मुख्यमंत्री और DMK अध्यक्ष एम.के. स्टालिन समेत पीएमके (PMK) और तमाम विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री विजय के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. एम.के. स्टालिन ने सीएम विजय को पत्र लिखकर इस 'गुमराह करने वाली मुलाकात' को तुरंत रद्द करने की मांग की है. कहना ये है कि जब कावेरी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आ चुका है, तो कर्नाटक से सीधी बातचीत करना अदालत की अवमानना है. तमिलनाडु के किसान संगठनों का आरोप है कि विजय कानूनी रास्ते को छोड़कर बातचीत की मेज पर जाकर तमिलनाडु के अधिकारों के साथ समझौता कर रहे हैं. विपक्ष की मांग है कि विजय को बेंगलुरु जाने से पहले तमिलनाडु में एक सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए थी.
क्या पॉलिटिकल जुआ खेल रहे हैं विजय?
थलापति विजय के मन में क्या है, ये तो वही जानें, लेकिन उन्होंने पानी के लिए अड़ने के बजाय मिलने का रास्ता चुनकर पॉलिटिकल जुआ खेला है. विजय ने मई में ही सरकार बनाई है. इस समय वे बहुत ही आक्रामक और अलग किस्म की राजनीति कर रहे हैं. तमिलनाडु की दशकों पुरानी नीति रही है कि जब भी पानी का विवाद होता था, वे बातचीत के बजाय कोर्ट का दरवाजा खटखटाते थे. लेकिन विजय 14 साल के इस गतिरोध को तोड़कर सीधे बातचीत के जरिए एक व्यावहारिक समाधान यानी Pro-rata basis पर पानी निकालना चाहते हैं, ताकि 5 अगस्त से शुरू हो रहे तमिलनाडु के बजट सत्र से पहले वे किसानों को राहत दे सकें.
14 साल की पारंपरिक राजनीति को चुनौती
तपते मानसून में जब तमिलनाडु के खेत पानी के बिना दरकने लगे, तो चेन्नई के पावर कॉरिडोर से एक ऐसा फैसला निकला, जिसने 14 साल की पारंपरिक राजनीति को हिलाकर रख दिया. यह माहौल रातों-रात नहीं बना, बल्कि इसके पीछे तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री थलापति विजय का एक बेहद आक्रामक और सीधा कूटनीतिक दांव है. विजय ने खुद डी.के. शिवकुमार को चिट्ठी लिखकर बेंगलुरु में मुलाकात का वक्त मांगा. विजय का यह कदम तमिलनाडु की पारंपरिक नीति के बिल्कुल उलट था, क्योंकि इससे पहले की सरकारें बातचीत के खिलाफ थीं. कर्नाटक ने विजय के इस अनुरोध को स्वीकार किया और 3 अगस्त की तारीख मुकर्रर हुई. विजय बस इतना चाहते हैं कि कम बारिश के अनुपात में (Pro-rata basis) तमिलनाडु के हक का कम से कम 3 TMC पानी तुरंत मिले, ताकि किसानों को राहत मिले.
क्या टूट रही दक्षिण में 'ईगो की दीवार'?
डी.के. शिवकुमार और थलापति विजय का लगभग एक ही वक्त में सीएम बनना इस जटिल विवाद में उम्मीद की एक नई किरण इसलिए है, क्योंकि दशकों बाद तमिलनाडु के पावर कॉरिडोर से 'अदालत और विरोध' के बजाय 'सीधी बातचीत और समाधान' की भाषा सुनने को मिली है. इससे पहले जब तमिलनाडु में DMK या AIADMK की पारंपरिक सरकारें थीं, तो कावेरी मुद्दे पर उनका रुख बेहद कड़ा और राजनीतिक रूप से तय होता था. वे कर्नाटक से सीधे संवाद करने के बजाय ट्रिब्यूनल या सुप्रीम कोर्ट जाते थे. दोनों राज्यों के बीच बातचीत के सारे रास्ते बंद थे.
मेकेदातु को 'ड्रीम प्रोजेक्ट' मानते हैं डीके शिवकुमार
डी.के. शिवकुमार (DK) का मेकेदातु बांध को लेकर स्टैंड हमेशा से बेहद आक्रामक और अडिग रहा है और वे इसे अपना 'ड्रीम प्रोजेक्ट' मानते हैं. इसके लिए वे साल 2022 में विपक्ष में रहते हुए भारी कोविड पाबंदियों के बावजूद कनकपुरा से बेंगलुरु तक 5 दिनों की ऐतिहासिक 'मेकेदातु पदयात्रा' (Mekedatu Padayatra) निकाल चुके हैं. वे मेकेदातु को 'दक्षिण भारत का दिल' बताते हैं. शुरू से उनका एक ही तर्क रहा है कि कावेरी नदी पर 67 TMC क्षमता वाले इस संतुलन जलाशय (Balancing Reservoir) का निर्माण केवल बेंगलुरु शहर की प्यास बुझाने और 400 मेगावाट पनबिजली पैदा करने के लिए किया जा रहा है, न कि सिंचाई के लिए.
केंद्र के बयान से मजबूत हुआ कर्नाटक का पक्ष
शिवकुमार का इतिहास गवाह है कि वे इस प्रोजेक्ट को कर्नाटक के गौरव से जोड़कर देखते हैं और हाल ही में 27 जुलाई को केंद्र सरकार द्वारा संसद में यह साफ किए जाने के बाद कि कर्नाटक को मेकेदातु बनाने के लिए तमिलनाडु की सहमति की कोई कानूनी जरूरत नहीं है. शिवकुमार का पक्ष और ज्यादा मजबूत हो गया है. उनका साफ स्टैंड है कि सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले के मुताबिक कर्नाटक अपने हिस्से की जमीन पर बांध बनाने के लिए स्वतंत्र है और वे मुख्यमंत्री विजय के सामने यही भरोसा रखना चाहते हैं कि इस बांध के बनने से अतिरिक्त पानी का भंडारण होगा, जिससे सूखे के संकट काल में तमिलनाडु को भी बिना किसी देरी के तय कोटा (177 TMC) का पानी ज्यादा आसानी से मिल सकेगा.
विजय के दांव के पीछे क्या है रणनीति?
मई में मुख्यमंत्री बनते ही सुपरस्टार विजय ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी (TVK) की छवि चमकाने और एक व्यावहारिक, परिणाम-उन्मुख (Result-oriented) नेता दिखने के लिए इस 14 साल के कूटनीतिक गतिरोध को तोड़ दिया. उन्होंने खुद डी.के. शिवकुमार को पत्र लिखकर मिलने का समय मांग लिया. शिवकुमार को लगता है कि विजय पुरानी क्षेत्रीय राजनीति के बोझ और पूर्वाग्रहों से मुक्त हैं, इसलिए उनके साथ मेकेदातु और पानी के संकट पर किसी ऐसे नए और व्यावहारिक फॉर्मूले (जैसे संकट के समय आनुपातिक बंटवारा) पर रजामंदी बनाना ज्यादा आसान होगा, जिसकी कल्पना पारंपरिक द्रविड़ पार्टियों के दौर में असंभव थी.
आखिर क्या है मेकेदातु डैम प्रोजेक्ट?
मेकेदातु डैम प्रोजेक्ट कावेरी नदी के पानी के लिए बनना है. कर्नाटक सरकार बेंगलुरु शहर में पीने के पानी की किल्लत को दूर करने के लिए रामनगर जिले के कनकपुरा के मेकेदातु में एक विशाल बांध और जलाशय बनाना चाहती है. तमिलनाडु को डर है कि अगर कर्नाटक ने यह बांध बना लिया, तो कावेरी नदी के पानी की चाबी पूरी तरह बेंगलुरु के पास चली जाएगी और तमिलनाडु के डेल्टा क्षेत्र के किसान बूंद-बूंद पानी को तरस जाएंगे.
जहां 150 मीटर से 10 मीटर रह जाती है कावेरी की चौड़ाई
कनकपुरा सीएम डी.के. शिवकुमार का किला है. विशाल कावेरी नदी कनकपुरा के पास 'मेकेदातु' नाम की जगह पर सबसे ज्यादा पतली और संकरी हो जाती है. मेकेदातु से ठीक पहले नदी की चौड़ाई लगभग 150 मीटर से अधिक होती है. लेकिन जैसे ही नदी मेकेदातु के संकरे ग्रेनाइट पत्थरों की घाटी (Gorge) में प्रवेश करती है, इसकी चौड़ाई सिमटकर मात्र 10 मीटर (लगभग 32 फीट) रह जाती है. 'मेकेदातु' यानी 'बकरी की छलांग' नाम इसी से पड़ा.
3 अगस्त की बैठक पर टिकी नजरें
एक तरफ मुख्यमंत्री विजय इस हाई-स्टेक मीटिंग के जरिए खुद को एक परिपक्व और समाधान निकालने वाले राजनेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं. वहीं दूसरी तरफ, DMK और विपक्ष इसे तमिलनाडु के हितों के साथ खिलवाड़ बताकर विजय को घेरने में जुटा है. 3 अगस्त की इस मुलाकात को लेकर अनिश्चितता के बादल भी मंडराने लगे हैं, क्योंकि तमिलनाडु में विरोध चरम पर है. क्या यह मुलाकात होगी? और क्या दक्षिण भारत के इस सबसे बड़े 'वॉटर वॉर' का कोई अंत होगा?
मेकेदातु पर शिवकुमार का तर्क
कर्नाटक इस समय कम मानसूनी बारिश और सूखे जैसे हालात से जूझ रहा है, जिससे उसके अपने जलाशय खाली हैं. ऐसे में जब कावेरी जल नियामक समिति (CWRC) ने कर्नाटक को आदेश दिया कि वह प्रतिदिन 3,500 क्यूसेक पानी तमिलनाडु को दे, तो कर्नाटक में किसान और कन्नड़ संगठन सड़कों पर उतर आए हैं. कर्नाटक के सीएम डी.के. शिवकुमार, जो जल संसाधन मंत्री भी हैं, फौरन विजय से मिलने के लिए तैयार हो गए. केंद्र सरकार से मिली हरी झंडी के बाद कर्नाटक का पक्ष मजबूत हुआ है. शिवकुमार का तर्क है कि मेकेदातु बांध बनने से तमिलनाडु का ही फायदा होगा, क्योंकि अतिरिक्त पानी बहकर बर्बाद होने के बजाय रिजर्व रहेगा.
ADVERTISEMENT


