Shesh Bharat: BC आरक्षण पर चंद्रबाबू को बड़ा झटका, हाईकोर्ट ने रद्द किया फैसला, क्या करेंगे CM नायडू?

रूपक प्रियदर्शी

• 08:23 AM • 03 Oct 2026

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने चंद्रबाबू नायडू सरकार के स्थानीय निकाय चुनावों में BC को 34% आरक्षण देने वाले आदेश रद्द कर दिए हैं. कोर्ट ने कुल आरक्षण 50% की सीमा से अधिक नहीं होने की बात कही.

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Shesh Bharat: क्या मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू का मास्टरस्ट्रोक कानून के चक्रव्यूह में फंस गया है? स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़ों को किंगमेकर बनाकर मसीहा बनने की चंद्रबाबू नायडू की कोशिश को बड़ा झटका लगा है. स्थानीय निकाय चुनाव से ठीक पहले आरक्षण की जंग अदालत तक पहुंची तो चंद्रबाबू नायडू के कल्याणकारी और राजनीतिक दांव दोनों को झटका लग गया. आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकार के उस फैसले को खारिज कर दिया है, जिसके तहत बीसी (BC) समुदाय को 34 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया गया था.

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34% बीसी आरक्षण का चुनावी वादा और सरकारी आदेश

चंद्रबाबू नायडू सरकार ने अगस्त में बड़ा फैसला लेते हुए ग्रामीण स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों (BC) के लिए 34% आरक्षण और शहरी स्थानीय निकायों में 33.33% आरक्षण देने के दो सरकारी आदेश जारी किए थे. इस तर्क के साथ कि राज्य में पिछड़े वर्गों की आबादी लगभग 50.54% है, इसलिए सत्ता और फैसलों में उनकी हिस्सेदारी बढ़ाना सामाजिक न्याय के लिए जरूरी है. यह कदम टीडीपी के 2024 के उस चुनावी वादे को पूरा करने के लिए उठाया गया था, जिसमें बीसी आरक्षण को 20% से बढ़ाकर 34% करने की बात कही गई थी.

हाईकोर्ट की 50% आरक्षण सीमा और 6 हफ्ते की मियाद

मामला तब फंसने लगा जब सरकार के इस फैसले को कोर्ट में चुनौती दे दी गई. आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने चंद्रबाबू नायडू सरकार के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया. हाईकोर्ट ने कहा कि स्थानीय निकाय चुनावों में कुल आरक्षण की सीमा सुप्रीम कोर्ट से तय की गई 50 फीसदी की कानूनी सीमा से ज्यादा नहीं हो सकती. कोर्ट ने राज्य सरकार के आंकड़ों पर भी सवाल उठा दिए. सरकार कुछ और सोच पाए या कर पाए, उससे पहले ही हाईकोर्ट ने यह शर्त भी लगा दी कि बिना किसी देरी के 6 हफ्तों के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव की प्रक्रिया शुरू की जाए.

सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा और नया राजनीतिक कार्ड

हाईकोर्ट ने चंद्रबाबू नायडू के हाथ-पैर बांध दिए हैं, लेकिन चंद्रबाबू झुकने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने भरी रैली में एलान कर दिया कि पिछड़ों के सशक्तिकरण से कोई समझौता नहीं होगा. वे हाईकोर्ट के आरक्षण रद्द करने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पेटीशन (SLP) दायर करेंगे और 34% आरक्षण को बहाल कराने के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे. उन्होंने इस कानूनी झटके को पिछड़े वर्ग के बीच एक नया राजनीतिक कार्ड बना दिया है. वे अब जनता के बीच यह संदेश लेकर जा रहे हैं कि 'हम तो आपको हक देना चाहते थे, लेकिन विपक्ष और कानूनी दांवपेंचों ने इसे रोक दिया.'

सुप्रीम कोर्ट में होगा आर-पार का मुकाबला

एक तरफ सरकार सामाजिक आबादी के हिसाब से 34% कोटा देना चाहती है, तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट का वह 50% का नियम है, जिसके उल्लंघन की बात कहकर हाईकोर्ट ने इस पर ब्रेक लगा दिया है. अब असली और फाइनल मुकाबला सुप्रीम कोर्ट में होगा. सुप्रीम कोर्ट से ही तय होगा कि चंद्रबाबू नायडू की 'आरक्षण पॉलिटिक्स' को हरी झंडी मिलती है या फिर स्थानीय निकाय चुनाव नए समीकरणों के साथ कराने पड़ेंगे.

अदालत में क्यों फंसा सरकार का फैसला?

अब सवाल है कि आखिर कानूनी लड़ाई में चंद्रबाबू सरकार कहां चूक गई और किसने इस फैसले के खिलाफ कोर्ट का रुख किया? 34 फीसदी आरक्षण के खिलाफ वकील तांडव योगेश और पी. वेंकट नरसिम्हा शर्मा समेत कई लोगों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की थीं. कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की सबसे बड़ी दलील यह थी कि यदि स्थानीय निकायों में पिछड़ा वर्ग (BC) को 34 फीसदी आरक्षण दिया जाता है, तो अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के कोटे को मिलाकर राज्य में कुल आरक्षण 50 फीसदी की कानूनी लक्ष्मण रेखा को पार कर जाएगा, जो सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन है.

ट्रिपल टेस्ट और आंकड़ों की कमी बनी हार की वजह

हाईकोर्ट में जब बेंच ने सरकार से पूछा कि इस फैसले का आधार क्या है, तो सरकार ने 'राजीव मिश्रा कमीशन' और अपनी 'यूनिफाइड फैमिली सर्वे' की रिपोर्ट का हवाला दिया. लेकिन आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकार के इन दावों को अपर्याप्त माना. कोर्ट ने साफ कहा कि आरक्षण बढ़ाने से पहले सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' के नियमों के तहत एक समर्पित आयोग बनाकर पिछड़ापन तय करने के ठोस आंकड़े (Empirical Data) नहीं जुटाए गए, और इसी तकनीकी-कानूनी आधार पर सरकार यह केस हार गई.

टीडीपी का कोर वोट बैंक और बीसी समुदाय की अहमियत

आंध्र प्रदेश की राजनीति भी जातीय समीकरणों के ताने-बाने पर टिकी है. टीडीपी (TDP) के वोट बैंक के पीछे दिलचस्प सोशल इंजीनियरिंग है. कम्मा (Kamma) समुदाय को टीडीपी का सबसे मजबूत आधार और रीढ़ की हड्डी माना जाता है, जो राज्य में आर्थिक और सामाजिक रूप से बेहद प्रभावशाली हैं. खुद चंद्रबाबू भी इसी जाति से हैं, लेकिन सिर्फ 5 से 6 फीसदी आबादी वाले कम्मा समुदाय के दम पर कोई चुनाव नहीं जीता जा सकता.

यही वजह है कि 1982 में जब एनटी रामाराव ने टीडीपी की बुनियाद रखी थी, तो उन्होंने पिछड़ा वर्ग यानी बीसी (BC) समुदाय को टीडीपी का कोर वोट बैंक बनाया. राज्य की करीब 50% आबादी वाले इस बीसी समुदाय को टीडीपी ने हमेशा अपना 'सच्चा वोट बैंक' माना है और पार्टी संगठन से लेकर सत्ता तक में बड़ी हिस्सेदारी दी है. चंद्रबाबू नायडू की निकाय चुनावों में बीसी को 20% से बढ़ाकर 34% आरक्षण देने की यह जिद भी इसी कोर वोट बैंक को अपने पाले में मजबूत रखने की एक सोची-समझी रणनीति है.

'कम्मा + कापू + बीसी' का राजनीतिक त्रिकोण

आंध्र प्रदेश के इस दंगल में टीडीपी के प्रतिद्वंद्वी जगन मोहन रेड्डी (YSRCP) के पास जहां रेड्डी (Reddy) समुदाय, दलित (SC) और अल्पसंख्यकों का बड़ा समर्थन है, वहीं टीडीपी ने इस त्रिकोण को तोड़ने के लिए एक नया दांव चला है. करीब 15 से 18 फीसदी आबादी वाले कापू (Kapu) समुदाय को अपने पाले में लाने के लिए चंद्रबाबू नायडू ने पवन कल्याण की जनसेना पार्टी (JSP) के साथ गठबंधन किया. टीडीपी का समीकरण 'कम्मा + कापू + बीसी' (Kamma + Kapu + BC) के एक महा-गठबंधन के रूप में देखा जाता है.

6 हफ्ते की चुनौती और आगे का रास्ता

यही वजह है कि जब हाईकोर्ट ने बीसी आरक्षण के आदेश को रद्द किया, तो नायडू के सामने अपने इस सबसे बड़े और पारंपरिक वोट बैंक (BC) को बचाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई, जिसके लिए वे अब सुप्रीम कोर्ट तक जाने की हुंकार भर रहे हैं. पिछड़ों को सत्ता की चाबी सौंपकर खुद को उनका मसीहा साबित करने की राजनीति मानी जा रही है नायडू की. सरकार इसलिए कमजोर स्थिति में है क्योंकि हाईकोर्ट ने 6 हफ्ते में बिना इस बढ़े आरक्षण के चुनाव कराने के निर्देश दे दिए हैं. इतनी जल्दी सुप्रीम कोर्ट जाकर राहत पाना चंद्रबाबू नायडू के लिए आसान नहीं होने वाला. अगर राहत नहीं मिली तो निकाय चुनावों में उन्हें अपनी इस सोशल इंजीनियरिंग को बचाने के लिए जमीन पर नए समीकरण तलाशने होंगे.