आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने जनसंख्या को लेकर बड़ा और चौंकाने वाला कदम उठाया है. राज्य सरकार ने अब ऐसी नीति लागू करने का फैसला किया है, जिसमें ज्यादा बच्चे होने पर परिवारों को आर्थिक मदद और कई तरह की सुविधाएं दी जाएंगी. यह फैसला 5 मार्च 2026 को आंध्र प्रदेश विधानसभा में पेश की गई नई Population Management Policy के तहत लिया गया.
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सरकार का कहना है कि राज्य में गिरती जन्म दर चिंता का विषय बन चुकी है. इसी कारण अब परिवारों को तीसरे बच्चे के जन्म पर प्रोत्साहन देने की योजना बनाई गई है.
30 साल पुराना नियम खत्म
सरकार ने लगभग 30 साल पुराना वह नियम खत्म कर दिया है, जिसके तहत दो से ज्यादा बच्चों वाले लोगों को पंचायत और नगर निकाय चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी. अब तीन या उससे अधिक बच्चों वाले लोग भी स्थानीय निकाय चुनाव में उम्मीदवार बन सकेंगे. इस बदलाव को सरकार सामाजिक और आर्थिक संतुलन के लिए जरूरी कदम बता रही है.
तीसरे बच्चे पर मिलेगा आर्थिक प्रोत्साहन
नई नीति के तहत अगर किसी परिवार में तीसरे बच्चे का जन्म होता है तो सरकार कई तरह की सुविधाएं देगी.
- तीसरे बच्चे के जन्म पर ₹25,000 की एकमुश्त आर्थिक सहायता
- पांच साल तक हर महीने ₹1,000 पोषण भत्ता
- 18 साल तक सरकारी या आवासीय स्कूलों में मुफ्त शिक्षा
- महिलाओं को 12 महीने की मातृत्व अवकाश
- पुरुषों को 2 महीने की पितृत्व अवकाश
- इसके अलावा ज्यादा बच्चों वाले परिवारों को राशन कार्ड के माध्यम से अतिरिक्त सब्सिडी वाला अनाज भी दिया जाएगा.
गिरती प्रजनन दर बनी चिंता
सरकार का कहना है कि आंध्र प्रदेश में कुल प्रजनन दर (TFR) तेजी से गिरकर लगभग 1.5 तक पहुंच गई है. जबकि 1990 के दशक में यह करीब 3.0 थी.
कम जन्म दर के कारण राज्य में बुजुर्ग आबादी तेजी से बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. अनुमान है कि यदि स्थिति नहीं बदली तो 2047 तक राज्य की लगभग 23 प्रतिशत आबादी बुजुर्ग हो सकती है.
2023 के आंकड़ों के अनुसार राज्य में हर साल करीब 6.70 लाख बच्चों का जन्म हुआ.
2047 तक युवा आबादी बनाए रखने का लक्ष्य
राज्य सरकार का लक्ष्य प्रजनन दर को बढ़ाकर 2.1 तक लाना है. विशेषज्ञों के अनुसार यही वह स्तर है, जिस पर आबादी स्थिर रहती है और कार्यबल की कमी नहीं होती.
सरकार का मानना है कि अगर आज जन्म दर नहीं बढ़ाई गई तो आने वाले वर्षों में उद्योगों, खेतों और अन्य क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी हो सकती है.
1 अप्रैल 2026 से लागू होगी नीति
नई जनसंख्या प्रोत्साहन नीति 1 अप्रैल 2026 से लागू होगी. सरकार इस योजना पर हर साल करीब 2500 से 3000 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रही है. राज्य सरकार इसे खर्च नहीं बल्कि भविष्य के लिए मानव संसाधन में निवेश मान रही है.
परिसीमन की राजनीति भी बड़ा कारण
विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के पीछे एक राजनीतिक कारण भी है. 2026 के बाद देश में Delimitation यानी लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण होने की संभावना है.
अगर सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर हुआ तो उत्तर भारत के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार की सीटें बढ़ सकती हैं, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें घटने का खतरा है. इसी आशंका को देखते हुए कई दक्षिणी राज्य अपनी जनसंख्या नीति पर दोबारा विचार कर रहे हैं.
दक्षिण भारत में बढ़ी चर्चा
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री M. K. Stalin भी पहले ही इस मुद्दे को उठा चुके हैं. उनका कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को लोकसभा सीटों में कटौती की सजा नहीं मिलनी चाहिए.
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री D. K. शिवकुमार ने भी संकेत दिया है कि दक्षिणी राज्यों को इस मुद्दे पर मिलकर केंद्र सरकार के सामने अपनी बात रखनी चाहिए.
विपक्ष ने उठाए सवाल
विपक्षी दल YSR Congress Party ने इस नीति पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि 1990 के दशक में जनसंख्या नियंत्रण की सख्त नीति लागू करने वाली सरकार अब उलटा कदम उठा रही है.
विपक्ष का यह भी कहना है कि राज्य पहले से कर्ज में है, ऐसे में इतनी बड़ी आर्थिक योजना का बोझ खजाने पर पड़ेगा.
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