Charchit Chehra: ममता बनर्जी ने शत्रुघ्न सिन्हा के लिए ऐसा क्या किया था कि अब नहीं छोड़ रहे उनका साथ? बीजेपी से दूरी और TMC से प्रेम की पूरी कहानी

Charchit Chehra Shatrughan Sinha: जानिए शत्रुघ्न सिन्हा की राजनीति का पूरा सफर, बीजेपी से दूरी और ममता बनर्जी की TMC से जुड़ने की कहानी. कैसे आडवाणी युग के करीबी रहे 'बिहारी बाबू' मोदी-शाह दौर में अलग हुए, क्यों ममता बनर्जी ने उनके डूबते राजनीतिक करियर को सहारा दिया और आज TMC संकट के बीच वह ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में क्यों गिने जाते हैं.

Shatrughan Sinha Biography
शत्रुघ्न सिन्हा

रूपक प्रियदर्शी

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कहा जाता है कि काम ऐसा करो कि दुनिया याद रखें, लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों ने मीम बना दिया कि काम ऐसा करो कि लोग भर-भर गालियां दें. कोलकाता से दिल्ली एयरपोर्ट पर लैंड करने के बाद मुंह छिपाकर निकली सयानी घोष को भी आजकल भर-भर कर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा हैं. 4 मई तक दीदी, दीदी करने वाली सयानी घोष भी तृणमूल कांग्रेस के उन बागियों से जा मिलीं जो बीजेपी से जा मिले. इसी बीच सयानी घोष को कोसने वालों में शत्रुघ्न सिन्हा भी शामिल हो गए हैं. सयानी घोष की उम्र है 33 साल है और शत्रुघ्न सिन्हा की उम्र है 80 साल. सयानी घोष की पैदाइश तक शत्रुघ्न सिन्हा में लंबी पारी खेल चुके थे. 

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अलग-अलग मीडिया इंटरव्यू में सयानी घोष को एहसान-फरोशी के लिए रगड़ दिया कि दीदी-दीदी करने वाली केवल एक कॉपी कैट यानी नकल करने वाली नेता हैं. कल तक जो लोग ममता जी की नकल करके राजनीति चमकाते थे, वो आज मुश्किल वक्त में उनका साथ छोड़ रहे हैं. ये जरा गौर करने वाली बात है कि तृणमूल कांग्रेस के जितने नेता बागी हुए वो ममता को नहीं, अभिषेक बनर्जी को कोसते हुए निकले हैं. शत्रुघ्न सिन्हा ने भी साफ-साफ कहा कि अभिषेक बनर्जी नहीं, बल्कि उनकी एकमात्र नेता सिर्फ और सिर्फ ममता बनर्जी हैं. अभी भी गारंटी नहीं कि अभिषेक के दौर में केवल ममता को नेता मानने वाले सिन्हा साहब के तृणमूल में कितने दिन बचे हैं.

तृणमूल कांग्रेस जब रोज टूट रही है तब चर्चित चेहरा बने हैं शत्रुघ्न सिन्हा. आखिर कैसे फिल्मों के टॉप गियर में चलते हुए 'बिहारी बाबू' राजनीति में आ गए? क्या वाकई उन्होंने महानायक अमिताभ बच्चन की देखादेखी की थी? बीजेपी के 'आडवाणी युग' के चहेते शॉटगन की मोदी-शाह के दौर में क्यों बिगड़ी, और बंगाल की दीदी यानी ममता बनर्जी ने उन्हें डूबते करियर में कैसे तिनके का सहारा दिया? आज टीएमसी में मची भारी बगावत के बीच शत्रुघ्न सिन्हा अपनी ही पार्टी की फायरब्रांड नेता सायोनी घोष के बारे में क्या-क्या क्यों बोले जा रहे शत्रुघ्न सिन्हा? विस्तार से जानिए पूरी कहानी.

ममता के लिए ढाल बने शत्रुघ्न!

मुश्किल और महासंकट में शत्रुघ्न सिन्हा ममता के लिए कमिटेड, लॉयल बने हुए हैं. स्वेच्छा से खुद को दीदी के एहसानों से दबा लिया. जब उनके पास फिर से पुरानी पार्टी बीजेपी के पास जाने का रास्ता खुला तो उन्होंने 'दीदी' के लिए ढाल बनने का रास्ता चुना. किसी को नहीं मालूम कि अगले कुछ दिनों, महीनों में ममता की पार्टी का क्या होगा लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा ने तो बड़ा जोखिम ले लिया ऐसे कश्ती पर सवार रहने का जिसके न डूबने की कोई गारंटी नहीं. क्या सिर्फ इसलिए कि संसद सदस्यता को लेकर कोई रिस्क लेना नहीं चाहते या फिर वही गलती कर रहे पॉलिटिकली इनकरेक्ट रहने और नदी की धारा तैरने का जिसका उन्हें काफी नुकसान हो चुका है. 

शत्रुघ्न के फैसले से चौंकाने वाले फैसले!

शत्रुघ्न सिन्हा की करीब 40 साल की राजनीति में ये मामला जरा यूनिक है कि उन्होंने हमेशा बड़े फैसले तब लिए जब राजनीति की हवा किसी और दिशा में बह रही थी. आज जब ममता की पार्टी का दम निकल रहा तब वो फैसला करते हैं कि दीदी के साथ रहेंगे. एक जमाना वो भी था जब उनको दिख रहा था कि बीजेपी में आडवाणी का दौर आ रहा है, मोदी-शाह का दौर आ रहा तब भी उन्हें आडवाणी को बहाना बनाकर मोदी-शाह से बैर मोल लिया. नतीजा ये कि न मंत्री बन पाए, न टिकट मिला और एक दिन राजी खुशी पार्टी ने बाहर जाने दिया. ये कहना मुश्किल है कि उन्होंने डूबते जहाज या उगते सूरज को जज करने में मिस्टेक किया या वही मास्टरस्ट्रोक कि आज भी राजनीति में लंबी रेस का घोड़ा बने हैं.

कैसे राजनीति में आए थे शत्रुघ्न सिन्हा?

1984 में बीजेपी सिर्फ दो लोकसभा सांसदों वाली पार्टी थी. दो ही नेता थे अटल और आडवाणी. उन दिनों बॉलीवुड में शत्रुघ्न सिन्हा का सिक्का चल रहा था. फिल्मी करियर एकदम पीक पर थे. उस दौर में उनके दोस्त-यार एक्टर अमिताभ बच्चन, सुनील दत्त, वैजयंतीमाला बाली, राजेश खन्ना फ्रंट से या बैकडोर से कांग्रेसी बन चुके थे. तब लालकृष्ण आडवाणी को भी पार्टी के इमेज मेकओवर के लिए कोई बड़ा फेस चाहिए था. उनकी तलाश शत्रुघ्न सिन्हा पर जाकर रूकी. 

शत्रुघ्न सिन्हा का कोई मूड नहीं था राजनीति में आने का लेकिन लालकृष्ण आडवाणी को मना नहीं कर सके. उन्होंने उस दौर में बीजेपी जॉइन की जब किसी सेलिब्रिटी के लिए बीजेपी कोई ऑप्शन नहीं थी. आडवाणी को गुरु, गाइड, फिलॉसफर मानकर शत्रुघ्न सिन्हा बीजेपी में शामिल हुए. नागालैंड से लेकर कन्याकुमारी तक, पार्टी के पहले 'ऑफिशियल स्टार कैंपेनर' बनकर उभरे. अटल और आडवाणी के साथ मिलकर उन्होंने पार्टी को खड़ा करने में अपना खून-पसीना बहाया. हालांकि ये डर बना रहा कि कहीं राजनीति फ्लॉप न हो जाए.

पार्टी जॉइन की, लेकिन 12 साल तक कोई चुनाव नहीं लड़ा

शत्रुघ्न सिन्हा ने एक इंटरव्यू में बताया कि आडवाणी ने ही उनका डर दूर किया. गांधीजी के मंत्र समझाया कि किसी भी बड़े आंदोलन या राजनीतिक सफर को पूरा करने के लिए चार दौर से गुजरना पड़ता है- पहला, लोग आपकी हंसी उड़ाएंगे. लोग उपेक्षा करेंगे. आपसे लड़ेंगे और चौथा, अंत में आप जीत जाएंगे. लालकृष्ण आडवाणी की उस सीख ने शॉटगन को राजनीति का लंबी रेस का घोड़ा बना दिया.

राजनीति में अक्सर लोग आते ही टिकट की रेस में दौड़ने लगते हैं. लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा ने पार्टी ज्वाइन करने के बाद भी पूरे 12 साल तक कोई चुनाव नहीं लड़ा. 1984, 1989 और 1991 के आम चुनावों में पूरे देश में बीजेपी के लिए धुआंधार प्रचार तो किया, लेकिन खुद लड़ने की हसरत नहीं पाली. इसका मतलब ये था कि शत्रुघ्न सिन्हा कुछ पाने के लिए राजनीति में नहीं आए थे.

शत्रुघ्न सिन्हा की सबसे बड़ी भूल!

1992 में शत्रुघ्न सिन्हा की जिंदगी बदलने वाला चुनाव आया. लालकृष्ण आडवाणी के ही इस्तीफे से नई दिल्ली लोकसभा सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस ने राजेश खन्ना को उतारा. राजेश खन्ना के टक्कर में कोई नहीं मिला तो फिर आडवाणी ने शत्रुघ्न को उतारा. गहरे दोस्त राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ने की कीमत शत्रुघ्न सिन्हा ने हारकर भी चुकाई. पर्सनल रिलेशन पर भी जीवनभर की सजा मिली लेकिन ये अलग कहानी है. शत्रुघ्न सिन्हा ने बायोग्राफी 'एनीथिंग बट खामोश' में राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ने को अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल बताया लेकिन सच ये है कि अगर शत्रुघ्न सिन्हा वो चुनाव लड़ते तो पता नहीं राजनीति में कहां होते. 

हार के बाद गए राज्यसभा!

1992 की चुनावी हार के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने शत्रुघ्न सिन्हा का हौसला बढ़ाया. 1996 में राज्यसभा भेज दिया. 1999 में वाजपेयी की 5 साल की सरकार बनी तो एक्टर शत्रुघ्न सिन्हा देश के स्वास्थ्य मंत्री, फिर शिपिंग मंत्री बने. पार्टी ने एक और टर्म के लिए राज्यसभा भेज दिया. 2009 का चुनाव लालकृष्ण आडवाणी को पीएम बनवाने का चुनाव था. कायस्थ होने के कारण शत्रुघ्न सिन्हा को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कायस्थ बहुल पटना से चुनाव लड़ने भेजा. तब कांग्रेस ने शेखर सुमन को उतारा था लेकिन जीत शत्रुघ्न सिन्हा की हुई. 

बीजेपी से क्यों अलग हुए शत्रुघ्न सिन्हा?

शत्रुघ्न सिन्हा या तो पार्टी में बदलाव समझने के लिए तैयार नहीं हुए या आडवाणी की निष्ठा का बोझ भारी पड़ा. समझने को तैयार नहीं हुए या समझ नहीं पाए तो आडवाणी तो गए. आगे भविष्य मोदी-शाह के साथ है. उन्हें पसंद नहीं किया कि लालकृष्ण आडवाणी मार्गदर्शक में भेज दिए गए. आग में घी डालने का काम तब हुआ जब मोदी सरकार में शत्रुघ्न सिन्हा मंत्री नहीं बनाए गए. बस तभी से बीजेपी में शत्रुघ्न सिन्हा मोदी-शाह के खिलाफ विपक्ष का काम करने लगे. 

शत्रुघ्न सिन्हा खुलकर कहने लगे कि वो मोदी से ज्यादा आडवाणी को पसंद करते हैं. चीजें खराब होते-होते यहां तक पहुंची कि 2019 के चुनाव में उनका पटना का टिकट कट गया. शत्रुघ्न सिन्हा की मजबूरी हो गई कि वो सब सहते हुए पार्टी में बने रहें या कोई और पार्टी जॉइन करें. बीजेपी छोड़ी कांग्रेस जॉइन किया लेकिन 2019 में बीजेपी, मोदी की लहर में बीजेपी के रविशंकर प्रसाद से हारकर निपट गए. 

ममता ने दिया था सहारा!

जब 2019 की हार के बाद हर कोई शत्रुघ्न सिन्हा को भुला चुका था, तब ममता बनर्जी ने उन्हें लाइफलाइन दी. कभी ममता और शत्रुघ्न सिन्हा का कोई कनेक्शन नहीं रहा लेकिन ममता ने 2022 में आसनसोल लोकसभा उपचुनाव में उन्हें तृणमूल कांग्रेस (TMC) का टिकट थमाकर सबको हैरान कर दिया. सिन्हा ने इस मौके को भुनाया और रिकॉर्ड 3 लाख से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की. 2024 के आम चुनाव में भी उन्होंने आसनसोल से फिर जीत का परचम लहराया. थोड़ी देर पहले हमने जिस एहसान की बात की ये वही है. शत्रुघ्न ने कहा कि जब बुरे वक्त में सबने साथ छोड़ दिया था, तब सिर्फ ममता बनर्जी ने उनका हौसला बढ़ाया और उन्हें दोबारा संसद भेजा.

क्या अमिताभ बच्चन की देखादेखी आए राजनीति में?

राजनीतिक गलियारों और फिल्मी मीडिया में ये चर्चा हमेशा होती रही कि क्या शत्रुघ्न सिन्हा ने अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना की देखादेखी राजनीति में कदम रखा था, लेकिन खुद शत्रुघ्न सिन्हा और राजनीतिक इतिहास इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हैं. शॉटगन के मुताबिक, वे किसी के ट्रेंड को फॉलो करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक सोच के कारण सियासत में आए थे. शत्रुघ्न सिन्हा की थ्योरी और इतिहास के पन्ने कुछ और ही कहानी कहते रहे.

अमिताभ बच्चन ने साल 1984 में इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी के कहने पर राजनीति में कदम रखा था. लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा 1980 के दशक की शुरुआत में ही जयप्रकाश नारायण आंदोलन से प्रभावित हुए थे. आडवाणी को जब ये पता चली तब बात आगे बढ़ी. तब अमिताभ राजनीति के 'र' से भी दूर थे. अमिताभ बच्चन राजनीति में सिर्फ 3 साल रहे और 'बोफोर्स विवाद' के बाद 1987 में इस्तीफा देकर फिल्मों में लौट गए. तब तक सिन्हा तो चुनाव में भी नहीं उतरे थे.

1984 से अभी तक राजनीति में टिके हैं शत्रुघ्न!

राजेश खन्ना बैकडोर से राजनीति में प्रो कांग्रेसी माने जाते थे. राजेश खन्ना 1991 में कांग्रेस में शामिल हुए थे. राजेश खन्ना ने जब 1992 में दिल्ली की सीट जीतकर संसद में कदम रखा, तो लगा कि लंबी पारी खेलेंगे. लेकिन 4 साल में उनका मन कांग्रेस और राजनीति से भरा. कहा जाता है कि 1996 का चुनाव लड़ने से खुद इंकार किया था. अपनी बायोग्राफी में सिन्हा ने साफ किया कि बॉलीवुड स्टार्स अक्सर तब राजनीति में जाते हैं जब उनका फिल्मी करियर ढलान पर होता है जैसा कि राजेश खन्ना के साथ उस दौर में देखा जा रहा था. शॉटगन जब राजनीति में पूरी तरह सक्रिय हुए, तब वे फिल्मों में 'लीड रोल' कर रहे थे और उनका स्टारडम चरम पर था.

अपने दौर के एक्टर पॉलिटिशन में शत्रुघ्न सिन्हा ऐसे अकेले नेता साबित हुए जो 1984 से आज तक मजबूती से टिके हैं. राजनीति को 'पार्ट-टाइम जॉब' नहीं माना, बल्कि तीन दशकों से ज्यादा समय तक संसद से लेकर मंत्रालय तक अपनी कड़क आवाज की धाक जमाए रखी. सुविधा की राजनीति के लिए बीजेपी से कांग्रेस, कांग्रेस से तृणमूल कांग्रेस-दल बदल तो उन्होंने भी किए लेकिन सरवाइव कर रहे हैं.

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