तृणमूल कांग्रेस(TMC) में सुदीप, अभिषेक बनर्जी पीड़ित गैंग के सबसे सीनियर नेता हैं. बरसों तक पार्टी में सेकंड मैन इन कमांड रहे. पार्टी में जैसे अभिषेक बनर्जी का सूरज उगना शुरू हुआ वैसे ही सुदीप दा को महसूस होने लगा कि उनका सूरज ढलना शुरू हो गया. यहीं उनका दोष था कि वो ममता की परछाई थे, अभिषेक बनर्जी नहीं थे.
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वंशवादी पॉलिटिक्स का सच समय रहते समझने में देर की कि वो और उन जैसे लोगों की भूमिकाएं पहले इस्तेमाल तक सीमित होती हैं. बेटा, बेटी, भाई-भतीजा का समय शुरू होने पर हाशिए पर जाना ही उनकी नियति होती है. जो सच्चाई भांप लेते हैं, लंबे समय तक टिके रहते हैं. जो सच्चाई से मुंह मोड़ते हैं उनके लिए सांस लेना मुश्किल होता है. सुदीप दा ने सच्चाई भांप ली. सच्चाई से मुंह भी नहीं मोड़े. खुद से साइड हो लिए और जब मौका आया उन्होंने अपनी निष्ठा बीजेपी के लिए समर्पित कर दी. 77 साल में उनकी वफादारी की कसमें भी उतनी ही कच्ची निकलीं जितनी 33 साल की सयानी घोष की.
कोलकाता में जब ममता बनर्जी का शासन होता था जब दिल्ली में आंख, कान, आवाज सुदीप दा हुआ करते थे. सुदीप दा की बागी कैंप में मुंह-दिखाई तब हुई जब बागियों की टोली स्पीकर ओम बिरला से मिलने पहुंची. अब तक बागियों की लीडर काकोली घोष दस्तीदार थी. सुदीप दा के आते वो एक कदम पीछे हो गईं. स्पीकर ओम बिरला से मिलने वालों की लाइन में सबसे आगे खड़े हुए सुदीप बंदोपाध्याय. अपनी इसी चौंकाने वाली राजनीति से देश भर में चर्चा का केंद्र बने हैं सुदीप बंदोपाध्याय. ममता बनर्जी के कारण 6 बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले सुदीप अब NCPI(नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया) के सांसद बनने के लिए बाहें फैलाए अमित शाह के पास पहुंच गए.
चर्चित चेहरा के इस एपिसोड में आज जानिए आखिर कौन हैं सुदीप बंदोपाध्याय? कांग्रेस में रहकर स्टबलिश होने के बाद ममता के क्राइसिस मैनेजर और अब सबसे बड़े 'विद्रोही' बनने वाले सुदीप की कौन सी कहानी है जो सब नहीं जानते. विस्तार से जानिए पूरी कहानी.
ममता के लिए चट्टान की तरह डटे रहें!
सुदीप बंदोपाध्याय और ममता बनर्जी का रिश्ता पिछले तीन दशकों में 'भरोसे, बगावत और फिर वापसी' के उतार-चढ़ाव भरे दौर से गुजरा है. सुदीप दा केवल ममता के लिए लॉयल नहीं थे. नेता होने के नाते ममता ने भी उनके लिए लॉयल्टी निभाई. सुदीप बंदोपाध्याय की जिंदगी का सबसे अनूठा और भावुक मोड़ जनवरी 2017 में आया, जब ममता बनर्जी के सत्ता में रहते रोज वैली घोटाले में सीबाई ने गिरफ्तारी किया.
भुवनेश्वर जेल की उमस भरी कोठरी में फर्श पर सोना पड़ा था. इस कठिन दौर में सुदीप दा ने हार मानने के बजाय जेल की खस्ताहाल लाइब्रेरी का अपनी जेब से कायाकल्प किया और कैदियों को संविधान पढ़ाकर जेल के भीतर भी 'सर' का आदर कमाया. जब बीमार होकर अस्पताल पहुंचे, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद फ्लाइट पकड़कर उनसे मिलने भुवनेश्वर गईं, जहां सुदीप ने दीदी का हाथ पकड़कर रोते हुए कहा था कि 'मेरा कुर्ता मैला हुआ है, दामन नहीं'.
सुदीप बंदोपाध्याय करीब 136 दिनों तक जेल में रहे. उनकी कहानी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जो सुदीप दा तब जेल की यातनाओं और विरोधियों के प्रेशर के आगे ममता के लिए चट्टान की तरह डटे रहे, वही सुदीप 2026 में बंगाल की सत्ता दीदी के हाथ से जाने के बाद उपेक्षा का बहाना बनाकर अमित शाह के साथ हो लिए. पूछा जा रहा है कि 77 साल की उम्र के हो चुके सुदीप बंदोपाध्याय के मन में अब न जाने कौन सी महत्वाकांक्षी जागी कि उन्होंने दीदी को छोड़कर NCPI नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया जाना स्वीकार किया.
कांग्रेस से की थी राजनीतिक एंट्री
1949 को मुर्शिदाबाद में जन्मे सुदीप बंदोपाध्याय ग्रेजुएशन की डिग्री लेने के बाद एलआईसी में नौकरी करने लगे. लेकिन नौकरी में मन नहीं लगा तो सब छोड़ छोड़कर राजनीति में कूद पड़े. तब कांग्रेस बंगाल की बड़ी पार्टी थी जो अकेले लेफ्ट से लड़ रही थी. सुदीप दा में कलकत्ता के भद्र पुरुष वाले वो सारे गुणे थे जो आगे राजनीति में काम आए. जल्द ही बंगाल कांग्रेस का उभरता हुआ चेहरा बन गए. 1987 में पहली बार बाउबाजार विधानसभा सीट से विधायक चुने गए.
1998 में थामा था TMC का दामन
जब ममता बनर्जी कांग्रेस के खिलाफ बागी हुईं तो सुदीप को न जाने क्या फायर दिखा कि कांग्रेस छोड़कर पूरे तन मन धन से दीदी को अपना नेता मान लिया. 1998 में तृणमूल कांग्रेस नाम की पार्टी बनी तो कांग्रेस छोड़कर संस्थापक नेताओं में शामिल हुए सुदीप दा. 1998 तथा 1999 में तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर लगातार दो बार लोकसभा चुनाव जीते. ममता को ऐसा जमीनी नेता मिला था जो अपने दम पर लोकसभा जैसा बड़ा चुनाव जीतने का माद्दा रखता है.
सुदीप और नयना की लव--स्टोरी
जब छात्र नेता सुदीप राजनीति में आने बढ़ने के रास्ते तलाश रहे थे तब जलपाईगुड़ी के सामान्य से घर में नयना दास बड़ी पारी खेलने के लिए तैयार हो रही थीं. दसवीं में पढ़ते समय नयना को बड़े डायरेक्टर तरुण मजूमदार ने नोटिस किया. 1986 में सुपरस्टार प्रसेनजीत चटर्जी के अपोजिट बांग्ला फिल्म पथभोला में लॉन्च कर दिया. नयना देखते ही देखते बंगाली सिनेमा की मशहूर और ग्लैमरस चेहरा बन गईं. फिर कहीं किसी रोज नयना और सुदीप टकराए. नयना के कजरारे नयना सुदीप को ऐसे भाए कि अपना दिल हार बैठे थे. पहले मिलना-मिलाना हुआ. फिर प्यार हुआ और एक दिन 1991 में शादी कर ली. हालांकि सुदीप और नयना के बीच उम्र का 19 साल का फासला था लेकिन प्यार-मोहब्बत ने हर फासले को पार कर लिया.
ममता ने नयना का कराया राजनीतिक एंट्री!
ममता की राजनीति में शुरू से एक्ट्रेसेस चुनाव जीतने की मास्टरस्ट्रोक रहीं. सयानी घोष, सायंतिका तो नई खोज हैं. करीब 25 साल पहले उन्होंने एक्ट्रेसेस कोटे से नयना दास को एक्टिंग से पॉलिटिक्स में लेकर लॉन्च किया था. सुदीप लोकसभा सांसद बन गए तो उन्होंने नयना को उनकी छोड़ी हुई विधानसभा सीट बाउबाजार से 2001 के चुनाव में उतार दिया. नयना ने पहला चुनाव जीत लिया. तब ममता तृणमूल इतनी बड़ी पार्टी भी नहीं थी. नयना दास की आगे की राजनीति का कांटा जैसे-जैसे सुदीप बंदोपाध्याय के लिए घूमने लगा वैसे ही नयना को भी नचाता रहा.
सुदीप और नयना की नाराजगी और फिर वापसी
2004 में न जाने क्यों ममता का मन सुदीप के लिए एकदम बदल गया. उन्होंने सुदीप का ही टिकट काट दिया. नाराज होकर दादा निर्दलीय चुनाव लड़े. कलकत्ता में सुदीप दा का इतना रूतबा था कि वो न जीते , न तृणमूल कांग्रेस को जीतने दिया. बाजी लेफ्ट वाले मार ले गए. 4 साल तक मुंह फुलाए रहे लेकिन दीदी 2008 में पार्टी में वापस ले आईं. टीएमसी में वापसी के बाद सुदीप ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. 2009 में कोलकाता उत्तर सीट से लेफ्ट के दिग्गज मोहम्मद सलीम को हराने से कद बहुत ऊंचा हो गया. कोलकाता उत्तर लोकसभा सीट सुदीप बंदोपाध्याय का अभेद्य किला बन गई.
2004 में जब उनके पति सुदीप बंदोपाध्याय का टिकट कटने पर ममता बनर्जी से विवाद हुआ, तो नयना अपने पति के साथ खड़ी रहीं. ममता बनर्जी की आलोचना करने के कारण टीएमसी ने नयना को भी पार्टी से निलंबित कर दिया था. इसके बाद वो राजनीति से दूर हो गईं लेकिन 2008 में सुदीप के साथ ममता ने उनकी भी टीएमसी में सम्मानजनक वापसी कराई.
चौरंगी बनी नयना का गढ़!
नयना बंदोपाध्याय के राजनीतिक करियर का सबसे स्वर्णिम दौर साल 2014 के बाद शुरू हुआ. 2014 में कोलकाता की सबसे वीआईपी सीटों में से एक 'चौरंगी' विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ. टीएमसी ने नयना पर दांव खेला और वे यहां से दोबारा विधायक चुनी गईं. 2016 के विधानसभा चुनाव में नयना ने चौरंगी सीट से बंगाल कांग्रेस के कद्दावर नेता सोमेन मित्रा को हराकर अपना दम दिखाया. 2021 के चुनाव में उन्होंने हैट्रिक लगाई. 2026 के चुनावों में जब ममता और तृणमूल की करारी हुई तब भी नयना दास बंदोपाध्याय ने अपनी चौरंगी सीट बचा ली.
दिलचस्प ये है कि जहां उनके पति सुदीप बंदोपाध्याय टीएमसी के बागी सांसदों के गुट के नेता बनकर अलग हो गए हैं, वहीं नयना ने अपने पति का साथ न देकर ममता बनर्जी के प्रति वफादारी चुनी है. वे फिलहाल विधानसभा में टीएमसी की ओर से ममता बनर्जी के गढ़ को बचाने और नई सरकार के खिलाफ विपक्ष की भूमिका निभाने में जुटी हुई हैं.
अभिषेक की एंट्री और बदलते समीकरण!
ममता ने सुदीप को बंगाल में उलझाने की बजाय दिल्ली का काम दिया. 2011 में ममता ने बंगाल की सत्ता हासिल की. उन्होंने कोलकाता अपने पास रखा. तृणमूल संसदील दल का नेता बनाकर सुदीप बंदोपाध्याय को दिल्ली में पार्टी का फेस बना दिया. ये वो दौर था जब मोदी सरकार आ चुकी थी. बीजेपी ने ममता से बंगाल झपटने के लिए पूरा जोर लगा दिया था. तब ममता इतनी ताकतवर थीं कि अकेले बीजेपी को पानी पिलाए रखा. उन्होंने सही वक्त देख 2014 में भतीजे अभिषेक बनर्जी को भी डायमंड हार्बर से लोकसभा चुनाव यानी दिल्ली की राजनीति में उतार दिया. तब 26 साल में अभिषेक बनर्जी ने संसद में दस्तक दी थी और तब कहां किसी को अनुमान था कि दीदी के भतीजे की लॉन्चिंग का क्या खेल है.
सुदीप बंदोपाध्याय के समीकरण तब बदलने शुरू हुए जब ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी का कद पार्टी में तेजी से बढ़ा. 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी की प्रचंड जीत में बड़ी रणनीतिक भूमिका निभाने के बाद, ममता बनर्जी ने जून 2021 में अभिषेक बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस का जनरल सेक्रेटरी नियुक्त कर दिया. इस पद के साथ ऑफिशियली अभिषेक पार्टी में नंबर 2 घोषित हो गए. हालांकि सुदीप दा की अपनी राजनीति पर कतई असर नहीं पड़ा. बीजेपी के बढ़ते असर के बाद भी 2009 से लेकर 2024 तक लगातार चार बार चुनाव जीते.
अभिषेक बनर्जी पार्टी में युवाओं को आगे लाने और पुराने सीनियर नेताओं को मार्गदर्शक की भूमिका में भेजने की वकालत कर रहे थे. उनकी बरसों की मेहनत रंग लाई. अगस्त 2025 में सुदीप बंदोपाध्याय को लोकसभा में टीएमसी के संसदीय दल के नेता पद से हटा दिया गया और उनकी जगह अभिषेक बनर्जी ने ले ली. तब से सुदीप बंदोपाध्याय खुद को उपेक्षित और अपमानित महसूस कर रहे थे. बदले के इंतजार में थे जिसका मौका 4 मई को ममता की हार के साथ शुरू हुआ.
सुदीप दा के पास कितनी संपत्ति?
संसद के भीतर अपनी बुलंद आवाज और लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में अपने महंगे और संभ्रांत पहनावे के लिए मशहूर सुदीप बंदोपाध्याय का वित्तीय प्रोफाइल भी उनकी सलीकेदार छवि की तरह ही संतुलित रहा है. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे के अनुसार, सुदीप बंदोपाध्याय की कुल घोषित संपत्ति लगभग 8.5 करोड़ रुपये है, जो कि साल 2014 में महज 2.2 करोड़ रुपये थी. उनकी इस कुल संपत्ति में से करीब 5.6 करोड़ रुपये की चल संपत्ति (जिसमें बैंक डिपॉजिट और कैश शामिल हैं) और 2.9 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति (कोलकाता में आवासीय मकान व जमीन) दर्ज है. खास बात यह है कि राजनीति में तीन दशकों से अधिक का समय बिताने और करीब 27.5 लाख रुपये की सालाना पारिवारिक आय होने के बावजूद, सुदीप दा पर कोई कर्ज या वित्तीय देनदारी नहीं है.
सफेद कड़क खादी के कुर्ते-पायजामे, कंधे पर सलीके से रखा कश्मीरी शॉल या नेहरू जैकेट, और आंखों पर हमेशा चमकता हुआ विदेशी ब्रांड का चश्मा- सुदीप बंदोपाध्याय सिर्फ अपनी राजनीति के लिए ही नहीं, बल्कि लुटियंस दिल्ली से लेकर कोलकाता के सियासी गलियारों में अपने अनूठे और संभ्रांत 'फैशन स्टेटमेंट' के लिए भी जाने जाते हैं. बंगाल के नेताओं की आम तौर पर सादगी पसंद और ढीले-ढाले कपड़ों वाली छवि से इतर, 'सुदीप दा' हमेशा अपनी सजी-धजी और अप-टू-डेट जीवनशैली के लिए चर्चा बटोरते रहे हैं.
बागी होते ही TMC नेताओं ने घेरा!
सुदीप बंदोपाध्याय की इस ऐतिहासिक बगावत पर ममता बनर्जी के खेमेमें भारी आक्रोश और तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है. ममता के बेहद वफादार नेताओं ने सुदीप को 'गद्दार' और 'पीठ में छुरा घोंपने वाला' करार दिया है. तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कुणाल घोष ने उन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि ममता बनर्जी ने जिन लोगों को राजनीति में सबसे ज्यादा मान-सम्मान और बड़े पद दिए, आज वे ही उनके खिलाफ खड़े हो गए हैं.
वहीं, टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने सुदीप बंदोपाध्याय पर एक बड़ा और गंभीर आरोप लगाते हुए सोशल मीडिया X पर पोस्ट किया कि सुदीप दा ने दिल्ली जाने से पहले पूरी पार्टी से झूठ बोला था. महुआ के मुताबिक, सुदीप ने बहाना बनाया था कि वे पेट की खराबी के चलते कोलकाता के अपोलो अस्पताल में भर्ती हैं, लेकिन अचानक वे दिल्ली में भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के घर पर टीवी कैमरों के सामने दिखाई दिए. ममता कैंप का साफ मानना है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद सुदीप बंदोपाध्याय और उनके सहयोगी केवल अपने निजी स्वार्थ और राजनीतिक वजूद को बचाने के लिए 'वाशिंग मशीन राजनीति' का हिस्सा बनकर भाजपा की शह पर चल रहे हैं.
यहां देखें वीडियो
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