Charchit Chehra: सीएम बनने के लिए कांग्रेस के साथ अलायंस करना पड़ा उद्धव ठाकरे को भारी? जानिए रश्मि ठाकरे के आने के बाद कैसे बदली उनकी राजनीति

Charchit Chehra: एक समय फोटोग्राफी की दुनिया में खोए रहने वाले उद्धव ठाकरे आखिर महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र में कैसे पहुंचे? क्या रश्मि ठाकरे ने उनकी राजनीतिक यात्रा में सबसे अहम भूमिका निभाई? जानिए बालासाहेब ठाकरे की विरासत, राज ठाकरे से दूरी, कांग्रेस-एनसीपी के साथ गठबंधन और शिवसेना में हुई बगावत तक की पूरी कहानी, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा बदल दी.

Uddhav Thackeray
Uddhav Thackeray

रूपक प्रियदर्शी

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1980 के दशक के आखिरी सालों तक पूरे महाराष्ट्र की राजनीति शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे के आसपास घूमने लगी. उनके अग्रेशन से सभी थर्राते थे. मुंबई ठाकरे की पॉलिटिक्स की राजनीति थी. बाला साहेब के रहते ये मान लिया गया था कि उनकी राजनीतिक विरासत उनके सगे बेटे उद्धव नहीं, भतीजे राज ठाकरे संभालेंगे. 

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उन दिनों उद्धव ठाकरे राजनीति के शोर से कोसों दूर थे और जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में फोटोग्राफी की बारीकियां सीख रहे थे. राजनीति, रैलियों, भाषणों और ठाकरे स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स में कोई इंटरेस्ट नहीं था. उनके स्वभाव को देखकर खुद बाला साहेब और राजनीतिक पंडित माने बैठे थे कि उद्धव ठाकरे का स्वभाव इतना सोवर और सिंपल है कि वो राजनीति के दलदल और जोड़-तोड़ की बिसात को कभी संभाल ही नहीं पाएंगे लेकिन लाइफ हमेशा वैसी नहीं रहती जैसे आप सोचते या मानकर चलते हैं. उद्धव की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था.

4 मई को बंगाल में ममता की हार के बाद उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस बुरी तरह टूट चुकी थी. जैसे कि अनुमान था कि ममता के बाद बीजेपी ऑपरेशन टाइगर से उद्धव ठाकरे की बची-खुची पार्टी का भी टूटना तय है. सचमुच वो दिन आ गया जब 4 साल बाद फिर उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी टूटी है. चर्चित चेहरा के इस खास एपिसोड में आज हम जानेंगे उद्धव ठाकरे की कहानी, जिन्होंने बालासाहेब की विरासत को संभालते हुए शिवसेना को बुलंदियों पर पहुंचाया, लेकिन फिर अचानक उनके हाथों से शिवसैनिकों की डोर छूट गई. क्या उद्धव ठाकरे अपनी पत्नी रश्मि ठाकरे के कहने पर राजनीति में आए थे? क्या उन्हीं के इशारे पर राजनीति की रणनीतियां बनीं? और क्या रश्मि के कहने पर ही शिवसेना की राजनीति में वो क्रांतिकारी बदलाव किए गए, जो आज पार्टी के इस मोड़ पर पहुंचने का कारण बने? आइए विस्तार से जानते हैं.

उद्धव ठाकरे और रश्मि की लव-स्टोरी!

1989 में एक छोटी सी लव स्टोरी के साथ ठाकरे परिवार में दस्तक हुई डोंबिवली के मिडिल क्लास और थोड़ी पॉलिटिकल फैमिली की लड़की रश्मि पाटनकर की. उनके पिता माधव पाटनकर का बिजनेस थे और आरएसएस से भी जुड़े थे. रश्मि ने स्कूलिंग के बाद मुंबई के वी.जी.वाझे कॉलेज से कॉमर्स में बी कॉम किया. 1987 में उन्होंने एलआईसी ज्वॉइन की कॉन्ट्रैक्ट इम्प्लाई की तरह. उसी एलआईसी की नौकरी और ऑफिस से रश्मि की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. 

एलआईसी में जयजयवंती ठाकरे भी काम करती थी. जयजयवंती, बाल ठाकरे के भाई श्रीकांत ठाकरे की बेटी और राज ठाकरे की सगी बहन हैं. रश्मि और जयजयवंती दोस्त बन गईं. दोस्त के नाते उनका ठाकरे परिवार के घर 'मातोश्री' आना-जाना शुरू हुआ. तब उद्धव-राज मातोश्री में ही रहा करते थे. जयजयवंती ने ही रश्मि की मुलाकात अपने चचेरे भाई उद्धव ठाकरे से कराई, जो उस समय राजनीति से दूर एक विज्ञापन एजेंसी चलाते थे और वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी के शौकीन थे. लड़का और लड़की एक-दूसरे को पसंद करने लगे. परिवारों ने भी एक-दूसरे को पसंद किया तो 13 दिसंबर 1989 को दोनों की शादी हो गई. करीब 37 साल से रश्मि और उद्धव एक-दूसरे के साथ हैं. दोनों के दो बेटे हुए आदित्य और तेजस. आदित्य फुल टाइम राजनीति में हैं, तेजस राजनीति से दूर रहते हैं.

रश्मि ठाकरे की वजह से राजनीति में आए उद्धव?

ठाकरे परिवार के इतिहास पर नजर रखने वाले बहुत सारे लोग क्रेडिट देते हैं कि अगर रश्मि ठाकरे न होतीं, तो उद्धव ठाकरे शायद कभी राजनीति में नहीं आते. शादी के बाद भी बहुत सालों तक उद्धव राजनीति से दूर आर्ट की दुनिया में लीन रहे. शायद रश्मि पाटनकर ने रश्मि ठाकरे बनने के बाद ये मंजूर नहीं किया कि वो फोटोग्राफर की पत्नी बनकर रह जाएं. उन्होंने उद्धव के भीतर छिपे 'किंग' को जगाया और एक दिन ऐसा आया जब वो महाराष्ट्र की सत्ता के शिखर तक पहुंचे.

शायद रश्मि का वही दांव था जो आगे चलकर शिवसेना और ठाकरे परिवार में फूट का कारण बना. उद्धव का इंटरेस्ट जागा तो बाला साहेब को भी भतीजे राज से कहीं ज्यादा गुणी बेटा लगने लगा. 2003 में उद्धव शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष बने. बाला साहेब ठाकरे ने साफ कर दिया कि उनकी विरासत उद्धव हीं संभालेंगे, राज ठाकरे नहीं. बस तभी राज ठाकरे बागी हुए. 2006 में बाला साहेब से बगावत करते हुए राज ने मातोश्री की चौखट लांघ दी. परिवार से अलग हुए और शिवसेना से अलग महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नाम की पार्टी बनाई जो आज 20 साल बाद भी चली नहीं. 

शुरुआत में बैकडोर से किया काम!

रश्मि ठाकरे का पति उद्धव ठाकरे को राजनीति की ओर ले जाना कामयाब सोच थी जिसने ठाकरे की राजनीति और शिवसेना दोनों को ताकत दी. जब उद्धव ठाकरे ने शिवसेना की कमान संभाली, तब उन्होंने पार्टी को मुंबई की स्थानीय राजनीति से बाहर निकालकर पूरे महाराष्ट्र में फैलाया. 2002 के बीएमसी चुनाव में बाला साहेब और राज ठाकरे फ्रंट फुट पर थे और उद्धव बैकडोर में रहे. बालासाहेब ठाकरे ने टिकट बंटवारे और चुनाव प्रचार की पूरी जिम्मेदारी पर्दे के पीछे से उद्धव ठाकरे को सौंप दी थी. 97 सीटें जीतने के साथ बीएमसी में शिवसेना का राज कायम हुआ. तब शिवसेना और बीजेपी एक साथ हुआ करते थे और शिवसेना का दबदबा बीजेपी पर हुआ करता था. 

फ्रंट फुट पर भी उद्धव ने किया कमाल

आगे हर चुनाव उद्धव ठाकरे की लीडरशिप के इम्तिहान साबित होते रहे. राज ठाकरे के अलग होने के बाद 2007 में पहला चुनाव हुआ था. माना गया कि राज ठाकरे डैमेज करेंगे लेकिन उद्धव की सेना ने फिर सत्ता हासिल कर ली. 2012 के चुनाव में कांग्रेस-एनसीपी के बड़े गठबंधन के बावजूद, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना ने जीत की हैट्रिक लगा दी. 2004 में कांग्रेस-एनसीपी अलायंस से शिवसेना बीजेपी के साथ विपक्ष में गई. 2009 में राज ठाकरे की बगावत से पार्टी को नुकसान हुआ लेकिन जबरदस्त की 2014 में. 

प्रचंड मोदी लहर में उद्धव के नेतृत्व में शिवसेना की सबसे बड़ी चुनावी ग्रोथ 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में देखने को मिली. जब बीजेपी के साथ 25 साल पुराना गठबंधन टूटने के बाद भी शिवसेना ने अपने दम पर चुनाव लड़ा और रिकॉर्ड 63 सीटें जीतकर राज्य की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. यह पार्टी के इतिहास में 1995 के बाद दूसरा सबसे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. लोकसभा में शिवसेना ने सबसे ज्यादा 18 सीटें जीती. 

2014 में ही पड़ गई थी फूट की नींव?

उद्धव ने पहली बार शिवसैनिको को ये एहसास कराया कि बीजेपी को बिना भी उसका वजूद बना रहेगा. आगे चलकर यही सोच घातक बनी. आज अगर शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा है तो उसकी पहली नींव 2014 के चुनावों में पड़ी. उसी 2014 के चुनाव ने बीजेपी को भी ये समझने का मौका दिया कि उसे शिवसेना पर इतना भी निर्भर नहीं रहना. चुनाव से पहले अलायंस नहीं होने के बाद भी चुनाव बाद फिर शिवसेना-बीजेपी का अलायंस हुआ और देवेंद्र फड़णवीस सीएम बने. 

शिवसेना की कमान संभालने के बाद उद्धव ठाकरे ने शिवसेना को सबसे सॉलिड ग्रोथ दिलाई. 10 साल में किंग मेकर की हैसियत तक पहुंचे लेकिन लेकिन किंग नहीं बने. शायद इस महत्वाकांक्षा से शिवसेना के पतन की दूसरी नींव पड़ी. बाला साहेब के जाने के बाद भी 2019 में बीजेपी-शिवसेना मिलकर चुनाव लड़े लेकिन सीएम बनने के लिए उद्धव ठाकरे ने सबको चौंकाते हुए कांग्रेस-एनसीपी से अलायंस करते हुए एमवीए नाम का अलायंस बनाया और उसकी सरकार के सीएम बने. 

बालासाहेब के बाद टूटी अनेक परंपराएं

बाला साहेब ने लंबे वक्त पर बिना ताज बॉम्बे, मुंबई, महाराष्ट्र की राजनीति पर राज किया. कभी न तो चुनाव लड़े, न कोई पद लिया. बाला साहेब ने जब शिवसेना की सरकार बनवाई तो मनोहर जोशी को सीएम बनाया. बाला साहेब की पूरी पॉलिटिक्स किंग मेकर वाली थी, किंग बनने की महत्वाकांक्षा नहीं थी. बाला साहेब के जाने के बाद उद्धव ठाकरे ने परिवार की अनेक परम्पराएं तोड़ी. पहली बार कोई ठाकरे सत्ता में बैठा. किंग मेकर खुद किंग बनने चला. पहली बार किसी ठाकरे यानी बड़े बेटे आदित्य ठाकरे ने 2019 में वर्ली से चुनाव लड़ा. 

रश्मि ठाकरे ने निभाई कई जिम्मेदारियां 

महाराष्ट्र में अक्सर ये चर्चा रही है कि शिवसेना में ऐसे बदलावों के पीछे मातोश्री के घर के अंदर रहकर रश्मि ठाकरे ने बड़ा रोल निभाया. रश्मि ठाकरे के जीवन में पहला और ऐतिहासिक मोड़ तब आया जब मार्च 2020 को उन्हें शिवसेना के मुखपत्र सामना और मार्मिक का मुख्य संपादक बनाया गया. इससे पहले अखबार के संपादक खुद बाल साहेब ठाकरे, उद्धव ठाकरे होते रहे. संजय निरुपम, संजय राउत एक्टिंग एडिटर के रोल में रहे. शिवसेना जैसी पुरुष-प्रधान पार्टी के इतिहास में  पहली महिला बनीं जिन्होंने इस बेहद आक्रामक और शक्तिशाली अखबार की कमान संभाली.

उद्धव ठाकरे के सीएम बनने पर बैकडोर से रश्मि ठाकरे पार्टी और सरकार दोनों में अहम थी. मार्च 2020 की इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक सीएम ऑफिस में शिवसेना विधायक रवींद्र वायकर की कोऑर्डिनेटर के तौर पर नियुक्ति हुई थी. उस नियुक्ति को ऐसे देखा गया कि रश्मि का सीएम ऑफिस पर डायरेक्ट कंट्रोल है. 2019 में जब शिवसेना और बीजेपी की सीट शेयरिंग पर अमित शाह बात करने पहुंचे तब भी उद्धव, अमित शाह के साथ रश्मि ठाकरे ही कमरे में बैठी थीं. शाह ने इसे पसंद नहीं किया था. एक और कहानी ये कि जब सरकार बनाने की बात 20 दिनों तक फंसी रही तब शाह को महाराष्ट्र बीजेपी नेताओं ने उद्धव से बात करने को कहा था. चिढ़कर उन्होंने कहा-Should I talk to the kitchen? उद्धव के सीएम बनने के 15 साल पहले और सीएम बनने के बाद भी रश्मि ठाकरे ने अपनी पब्लिक अपीयरेंस सीमित रखी. 1995 में बाला साहेब की पत्नी मीना ताई जाने के बाद मातोश्री में वही एक महिला थी जिनके ऊपर घर संभालने की जिम्मेदारी रही. 

2022 में टूटी थी पार्टी

उद्धव के समय ठाकरे परिवार और शिवसेना की कई परम्पराएं टूटीं और वही सब कारण बना 2022 में शिवसेना में उस बगावत का जिसे एकनाथ शिंदे ने लीड किया. सबसे बड़ा बहाना बना कांग्रेस से अलांयस करना. शिंदे ने बीजेपी के साथ मिलकर उद्धव की एमवीए सरकार गिरा दी. सांसद, विधायक, पार्षद, कार्यकर्ता सब उद्धव को छोड़ गए. पार्टी का नाम, चुनाव चिन्ह तक नहीं बचा. उद्धव ठाकरे शिवसेना यूबीटी के पार्टी प्रमुख बनकर रह गए. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में एमवीए की बंपर जीत से लगा कि उद्धव ठाकरे वापसी कर लेंगे लेकिन फिर विधानसभा और बीएमसी चुनावों में राजनीति ऐसी पलटी कि उद्धव के लिए राजनीति मुश्किल हो गई. 

महाराष्ट्र की राजनीति में अक्सर ये बातें होती रही कि उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के साथ नहीं रहने से नुकसान हुआ. जब राज ठाकरे की राजनीति नहीं चमकी, जब उद्धव के हाथों से सब फिसलने लगा तब जाकर एकता की पहल हुई. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में दोनों भाइयों ने एमवीए से अलग अलायंस किया लेकिन पार्टियों का विलय नहीं हुआ. जनता ने दोनों ठाकरे को नकार दिया. अब चीजें जिस दिशा में चल रही हैं उसमें शिवसेना में एक और टूट तय है. आज सांसद टूटे हैं, कल विधायक, पार्षद, कार्यकर्ता टूटेंगे. उद्धव ठाकरे एकदम शून्य की ओर जा रहे हैं जहां उन्हें नए सिरे से फिर शुरूआत करनी पड़ेगी.

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