देश की राजनीति में सीएम जोसेफ विजय का एक फैसला ऐसा तूफान मचा रहा है, जिसने न सिर्फ महिलाओं के अधिकारों, बल्कि देश के डेमोग्राफिक और पॉलिटिकल स्ट्रक्चर को हिलाकर रख दिया है. तमिलनाडु सीएम सी. जोसेफ विजय ने अपनी महिला सरकारी कर्मचारियों के लिए तीसरे बच्चे पर भी पूरे 365 दिन यानी पूरे एक साल की पेड मैटरनिटी लीव देने का बड़ा ऐलान कर दिया है. अब तक यह नियम सिर्फ पहले दो बच्चों तक सीमित था, और तीसरे बच्चे पर महज 12 हफ्ते की छुट्टी मिलती थी. सवाल ये है कि बरसों से हम दो, हमारे दो के नारे पर सख्ती से काम करने वाला दक्षिण भारत अचानक 'तीसरे बच्चे' पर मेहरबान क्यों हो रहा है? क्या यह सिर्फ एक चुनावी वादा या महिला सशक्तिकरण का कदम है, या फिर इसके पीछे छिपा है 2026 के डिलिमिटेशन का वो खौफ, जो दक्षिण भारत की राजनीतिक ताकत को निगलने का डर दिखा रहा है?
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100 दिन पूरे होते ही सरकार का बड़ा फैसला
सीएम विजय की सरकार ने कार्यकाल के 100 दिन पूरे करते ही सोशल वेलफेयर के नाम पर मास्टरस्ट्रोक खेला है. विधानसभा में मानव संसाधन प्रबंधन मंत्री डी. सरथकुमार ने घोषणा की कि अब तीसरे बच्चे के जन्म पर भी सरकारी महिला कर्मचारियों को पुरुषों के बराबर जिम्मेदारी साझा करने और बच्चे की देखरेख के लिए एक साल की पेड लीव मिलेगी. तमिलनाडु सरकार के अंतर्गत काम करने वाले कुल कर्मचारियों में लगभग 33% से 35% महिला कर्मचारी हैं. महिला कर्मचारियों की सटीक संख्या लगभग 2.92 लाख है.
शिक्षिकाओं और नर्सों को सबसे ज्यादा फायदा
इन 2.92 लाख महिला कर्मचारियों में सबसे बड़ा हिस्सा सरकारी स्कूलों की शिक्षिकाओं, नर्सों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और मिड-डे मील स्टाफ का है. इस नई 365-दिन की छुट्टी नीति का सीधा फायदा सबसे ज्यादा इसी वर्ग को मिलेगा. कोटा अब 40% हो चुका है: तमिलनाडु सरकार ने पहले ही सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए क्षैतिज आरक्षण (Quota) 30% से बढ़ाकर 40% कर दिया था. इसका मतलब है कि आने वाले समय में 2.92 लाख की यह संख्या बहुत तेजी से 3.5 लाख के पार जाने वाली है.
पहले दो बच्चों और तीसरे बच्चे के नियम में अंतर
पहले से सरकारी नियम है कि सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में पहले दो बच्चों के लिए 26 सप्ताह यानी 6 महीने की छुट्टी का नियम है, जबकि तीसरे बच्चे पर यह घटकर केवल 12 सप्ताह यानी 84 दिन रह जाता है. तमिलनाडु ने अपने राज्य कर्मचारियों के लिए पहले ही इसे बढ़ाकर 365 दिन (1 साल) कर दिया था. अब विजय सरकार ने तीसरे बच्चे पर भी पूरे 365 दिन की छुट्टी देकर केंद्र के 'दो बच्चों की प्राथमिकता' वाले नियम को राज्य के स्तर पर पूरी तरह बेअसर कर दिया है.
TVK के सामाजिक-आर्थिक एजेंडे का हिस्सा
विजय का ये कदम TVK के उस सामाजिक-आर्थिक एजेंडे का हिस्सा है, जिसके तहत सीएम विजय कल्याणकारी राजनीति स्थापित करना चाहते हैं. सरकार ने इस मैटरनिटी लीव के साथ-साथ नवजातों के लिए 'गोल्ड रिंग गिफ्ट स्कीम' और स्वास्थ्य बीमा की सीमा को 5 लाख से बढ़ाकर 25 लाख करने जैसे लोक-लुभावन वादे पूरे किए हैं.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
इस फैसले के पीछे मई 2025 का सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला भी है, जिसमें अदालत ने कहा था कि मातृत्व लाभ महिला का मौलिक अधिकार है और इसे तीसरे बच्चे के आधार पर छीना या सीमित नहीं किया जा सकता. सीएम विजय ने इस कानूनी आधार को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाया और इसे महिला सशक्तिकरण और सोशल वेलफेयर के बड़े पैकेज के रूप में पेश कर दिया. हालांकि, कोई भी मान लेगा कि दिल्ली और साउथ के बीच जो जंग चल रही है डिलिमिटेशन को लेकर, उसमें ये केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की बदलती आबादी को लेकर उठाया गया एक सोची-समझी नीति का हिस्सा है.
2026 का डिलिमिटेशन सबसे बड़ा मुद्दा
इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा और गंभीर सिरा जुड़ता है साल 2026 में होने वाले लोकसभा सीटों के डिलिमिटेशन यानी परिसीमन से. लोकसभा की सीटों का दोबारा निर्धारण आबादी के अनुपात में होना तय है. दक्षिण भारत के राज्यों विशेषकर तमिलनाडु ने पिछले चार दशकों में केंद्र सरकार की जनसंख्या नियंत्रण नीतियों का सबसे शानदार पालन किया है. नतीजा यह हुआ कि जहां उत्तर भारत में आबादी तेजी से बढ़ी, वहीं दक्षिण में आबादी स्थिर हो गई.
दक्षिण भारत को सीटें घटने का डर
अब डर यह है कि जब 2026 में आबादी के हिसाब से नई सीटें तय होंगी, तो उत्तर भारत (जैसे यूपी, बिहार) की लोकसभा सीटें भारी संख्या में बढ़ जाएंगी, जबकि दक्षिण भारत की सीटें और उनका संसद में राजनीतिक प्रभाव घट जाएगा. दक्षिण के नेताओं का तर्क है कि 'अच्छा काम करने' यानी आबादी रोकने के लिए उन्हें राजनीतिक रूप से सजा दी जा रही है. इसी राजनीतिक नुकसान की भरपाई के लिए अब दक्षिण में आबादी बढ़ाने वाले कदमों को मौन या प्रत्यक्ष समर्थन दिया जा रहा है.
स्टालिन ने भी बढ़ती आबादी की बात उठाई
यह नैरेटिव सिर्फ सीएम विजय की इस योजना तक सीमित नहीं है. इससे पहले DMK प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने सार्वजनिक मंचों से नवविवाहित जोड़ों को मजाक और गंभीरता के बीच '16 बच्चे पैदा करने' की नसीहत तक दे डाली थी. स्टालिन ने खुले तौर पर चिंता जताई थी कि कम आबादी के कारण दक्षिण भारत संसद में अपनी आवाज खो रहा है, इसलिए अब आबादी बढ़ाना वक्त की जरूरत बन गया है.
चंद्रबाबू नायडू भी जता चुके हैं चिंता
सिर्फ स्टालिन ही नहीं, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने भी इसी तरह की चिंता व्यक्त करते हुए स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए 'दो बच्चों की सीमा' वाले नियम को हटाने और ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले परिवारों को इंसेंटिव देने की वकालत की थी. कर्नाटक और तेलंगाना के मुख्यमंत्री भी इस डिलिमिटेशन फार्मूले के खिलाफ एकजुट हैं. दक्षिण के मुख्यमंत्रियों का साफ स्टैंड है: वे अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और फंड शेयरिंग को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, भले ही इसके लिए दशकों पुरानी पॉपुलेशन कंट्रोल पॉलिसी को ही क्यों न पलटना पड़े.
तमिलनाडु में तेजी से घट रही फर्टिलिटी रेट
तमिलनाडु की आबादी का गणित इस वक्त बेहद नाजुक मोड़ पर है. राज्य का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) गिरकर 1.4 से भी नीचे आ चुका है, जो कि आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी रिप्लेसमेंट लेवल (2.1) से काफी कम है. इसका मतलब है कि तमिलनाडु में नए बच्चों का जन्म बेहद कम हो रहा है. राज्य की आबादी तेजी से 'बूढ़ी' हो रही है. तमिलनाडु की लगभग 16% आबादी 60 वर्ष या उससे अधिक आयु की हो चुकी है. कामकाजी युवाओं की कमी और बुजुर्गों की बढ़ती संख्या भविष्य में राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा संकट बन सकती है. ऐसे में सीएम विजय की सरकार का यह फैसला सिर्फ एक राजनीतिक दांव नहीं, बल्कि राज्य के डेमोग्राफिक असंतुलन को ठीक करने की एक प्रशासनिक छटपटाहट भी है, ताकि राज्य में फर्टिलिटी रेट को थोड़ा सुधारा जा सके.
तीसरे बच्चे की छुट्टी पर देश में नई बहस
तमिलनाडु सरकार के इस फैसले ने देश में एक नई बहस को जन्म दे दिया है. एक तरफ अमृता फडणवीस जैसी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे 'दोधारी तलवार' बताते हुए चिंता जताई है कि क्या यह देश की बढ़ती आबादी के लिहाज से सही है, वहीं दूसरी तरफ दक्षिण भारत इसे अपने राजनीतिक वजूद और संसद में अपनी हिस्सेदारी बचाने की लड़ाई के रूप में देख रहा है. देखना दिलचस्प होगा कि क्या तीसरे बच्चे पर मिल रही ये सहूलियतें दक्षिण भारत के युवाओं को बड़े परिवार के लिए प्रेरित कर पाएंगी, या फिर 2026 का परिसीमन उत्तर और दक्षिण के बीच की इस राजनीतिक खाई को और गहरा कर देगा.
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