Shesh Bharat: कोयंबटूर ब्लास्ट के दोषियों को 60 दिन की पैरोल, विजय सरकार पर क्यों भड़की BJP?

राजू झा

22 Oct 2026 (अपडेटेड: Oct 22 2026 2:58 PM)

1998 में तमिलनाडु के कोयंबटूर में लालकृष्ण आडवाणी की रैली से पहले हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में 58 लोगों की मौत हुई थी. अब इस मामले के दोषियों को 60 दिन की पैरोल देने पर विवाद हो गया है. बीजेपी ने विजय सरकार पर सवाल उठाए हैं, जबकि TVK ने फैसले को नियमों के तहत बताया है.

Shesh Bharat
Shesh Bharat
Google CTA

Shesh Bharat: 14 फरवरी 1998, यह वह तारीख थी, जब बीजेपी के दिग्गज और सबसे चर्चित नेताओं में शामिल लालकृष्ण आडवाणी तमिलनाडु के कोयंबटूर में चुनावी रैली करने की तैयारी कर रहे थे. लेकिन उनकी रैली से ठीक पहले सिलसिलेवार बम धमाके हुए. कुल 12 धमाके हुए थे. इन धमाकों को लालकृष्ण आडवाणी की चुनावी रैली के दौरान उनकी हत्या की कथित साजिश से जोड़कर देखा गया. इस मामले में 22 लोगों को दोषी ठहराया गया था, जिनमें से पांच को अब 60 दिन की पैरोल दी गई है. पैरोल के इस फैसले पर विवाद खड़ा हो गया है. तमिलनाडु सरकार को निशाना बनाते हुए बीजेपी ने आतंकवादी हमलों के दोषियों के प्रति चुनिंदा नरमी बरतने का आरोप लगाया है.

Read more!

नारायण तिरुपति ने TVK सरकार के फैसले की आलोचना की

तमिलनाडु में बीजेपी के प्रवक्ता नारायण तिरुपति ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर TVK सरकार के फैसले की कड़ी आलोचना की. उन्होंने कहा कि निजी कारण किसी आतंकवादी हमले की गंभीरता को कम नहीं कर सकते. यह हमला राज्य के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है. उन्होंने कहा कि प्रतिबंधित संगठन अल-उम्मा ने चुनावी रैली से पहले धमाकों को अंजाम दिया था. उनके मुताबिक, यह आम नागरिकों को निशाना बनाकर की गई सामूहिक हत्या की सुनियोजित कार्रवाई थी. तिरुपति ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस अपराध को बेहद गंभीर बताते हुए दोषियों को जमानत देने से इनकार किया था.

वनथी श्रीनिवासन ने पैरोल देने पर उठाए सवाल

बीजेपी नेता वनथी श्रीनिवासन ने भी पैरोल के फैसले की निंदा की. उन्होंने TVK सरकार से सवाल किया कि किन कारणों और किसकी सलाह पर पांचों दोषियों को पैरोल दी गई. उन्होंने कहा कि कानून मंत्री को इस फैसले पर स्पष्टीकरण देना चाहिए. उनके अनुसार, इस तरह के निर्णयों से कानून के शासन में जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है और राज्य की शांति-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका पैदा हो सकती है.

VCK ने पैरोल के फैसले का किया स्वागत

वहीं, VCK के नेता और सामाजिक न्याय मंत्री वन्नी अरसु ने दोषियों को पैरोल देने के फैसले का स्वागत किया और मुख्यमंत्री विजय का आभार जताया. उन्होंने कहा कि VCK लंबे समय से 22 मुस्लिम कैदियों की रिहाई की मांग कर रही है, जो लंबे समय से जेल में बंद हैं. छह जून को पार्टी के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री विजय से मुलाकात कर इन 22 कैदियों को रिहा करने की मांग रखी थी. TVK विधायक मुस्तफा ने भी पैरोल देने के फैसले का समर्थन किया.

किन दोषियों को मिली 60 दिन की पैरोल?

तमिलनाडु सरकार ने मोहम्मद अंसारी, मोहम्मद अली उर्फ मोहम्मद हसन, मोहम्मद अजम और नवाब खान को 60 दिन के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति दी है. इन लोगों को 1998 में कोयंबटूर में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों की साजिश रचने के मामले में दोषी ठहराया गया था. ये लोग प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन अल-उम्मा से जुड़े थे. इससे पहले जनवरी 2023 में भी इसी मामले में दोषी ठहराए गए नौ लोगों को अंतरिम रूप से जेल से बाहर रहने की अनुमति दी गई थी.

निजी कारणों और स्वास्थ्य का दिया गया हवाला

अधिकारियों ने पैरोल के लिए निजी कारणों और स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों का हवाला दिया है. साथ ही, यह भी कहा गया कि ये दोषी पहले ही 25 से 30 साल जेल में बिता चुके हैं. बीजेपी का तर्क है कि ये कारण न तो पर्याप्त हैं और न ही अपराध की गंभीरता के हिसाब से उचित हैं.

कोयंबटूर ब्लास्ट में 58 लोगों की हुई थी मौत

फरवरी 1998 में हुए कोयंबटूर सीरियल ब्लास्ट भारत के हालिया इतिहास के सबसे भीषण आतंकवादी हमलों में से एक थे. इनमें 58 लोगों की मौत हुई थी और 250 से अधिक लोग घायल हुए थे. यह घटना 14 फरवरी 1998 को तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर में हुई थी. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इन सिलसिलेवार धमाकों का मुख्य उद्देश्य बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को निशाना बनाना था. आडवाणी उस दिन कोयंबटूर में एक चुनावी रैली को संबोधित करने वाले थे. उनकी फ्लाइट में देरी होने के कारण वह कार्यक्रम स्थल पर देर से पहुंचे और इस तरह हमले में बाल-बाल बच गए. लेकिन उनके पहुंचने से कुछ ही समय पहले पूरा शहर धमाकों से दहल उठा.

12 किलोमीटर के दायरे में किए गए थे धमाके

करीब 12 किलोमीटर के दायरे में आने वाले 11 से 12 अलग-अलग स्थानों पर योजनाबद्ध तरीके से टाइम बम लगाए गए थे. बमों को कारों, दोपहिया वाहनों, लावारिस बैगों और साइकिल स्टैंड पर छिपाया गया था. पहला धमाका कोयंबटूर रेलवे स्टेशन के साइकिल स्टैंड पर हुआ. इसके बाद मुख्य रैली स्थल, सरकारी अस्पताल के प्रवेश द्वार और अन्य व्यावसायिक परिसरों में लगातार विस्फोट हुए.

इस हमले के पीछे प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन अल-उम्मा का हाथ बताया गया था. इसके संस्थापक एस. ए. बाशा और मोहम्मद अंसारी को इस साजिश के मुख्य सूत्रधारों में शामिल बताया गया. जांच में सामने आया कि ये धमाके नवंबर-दिसंबर 1997 में कोयंबटूर में हुए दंगों का बदला लेने के लिए किए गए थे. एक पुलिस कांस्टेबल की हत्या के बाद भड़की हिंसा में 18 मुसलमानों की जान चली गई थी.

जांच के बाद कई दोषियों को सुनाई गई उम्रकैद

धमाकों के बाद मामले की जांच के लिए गोकुलकृष्णन आयोग का गठन किया गया था. अदालत ने 2007 में मास्टरमाइंड एस. ए. बाशा सहित कई दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई. इसके अलावा, करीब तीन दशकों तक फरार रहने के बाद तमिलनाडु पुलिस की ATS ने 2025 में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एजिंग सॉफ्टवेयर की मदद से हुगली से तीन मुख्य फरार आरोपियों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल की.

28 साल बाद पैरोल के फैसले पर सियासी विवाद

अब 28 साल बाद 60 दिन की पैरोल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. TVK की विजय सरकार को बीजेपी घेर रही है और सवाल पूछ रही है कि आखिर दोषियों को इतने दिनों की पैरोल क्यों दी गई है. पैरोल वह व्यवस्था है, जिसके तहत किसी सजायाफ्ता कैदी को जेल की सजा पूरी होने से पहले कुछ विशेष शर्तों और तय समय-सीमा के साथ अस्थायी रूप से जेल से बाहर रहने की अनुमति दी जाती है. यह कैदी का स्वतः मिलने वाला अधिकार नहीं है, बल्कि नियमों के तहत दिया जाने वाला एक विशेषाधिकार है.

बीजेपी ने लगाया अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का आरोप

बीजेपी के अनुसार, विजय की पार्टी TVK राज्य में IUML और अन्य अल्पसंख्यक केंद्रित दलों का राजनीतिक समर्थन बनाए रखने के लिए यह कदम उठा रही है. बीजेपी ने इसे सीधे तौर पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण (Minority Appeasement) और वोट बैंक की राजनीति करार दिया है. साथ ही, विजय सरकार से इस फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा है.

TVK ने बताया सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया

वहीं, TVK का कहना है कि सरकारी अधिकारियों और जेल प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि दोषियों को पैरोल देना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है. सरकार के मुताबिक, मोहम्मद अंसारी, नवाब खान समेत ये दोषी पिछले 25 से 30 वर्षों से जेल में बंद हैं. उन्होंने अपनी व्यक्तिगत और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का हवाला देते हुए पैरोल के लिए याचिका दायर की थी. सरकार का कहना है कि इन याचिकाओं को नियमों के तहत मंजूरी दी गई है.