देश की सियासत में इन दिनों शह और मात का खेल दिलचस्प हो चला है. एक तरफ संसद के आगामी सत्र में परिसीमन बिल जैसे बड़े मुद्दों पर टकराव के आसार हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों की ओर से बीजेपी पर जोड़-तोड़ की राजनीति के आरोप लग रहे हैं. लेकिन इस सियासी हलचल के बीच देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस खुद अपने आंतरिक मैनेजमेंट को लेकर सवालों के घेरे में खड़ी हो गई है. शुक्रवार शाम को आए राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस की रणनीति की कमियों और खूबियों दोनों को एक साथ उजागर कर दिया है.
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एक ही दिन, दो अलग-अलग तस्वीरें
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी पहेली यह है कि एक ही दिन हुए अलग-अलग राज्यों के चुनावों में उसका प्रदर्शन बिल्कुल जुदा रहा. जहां झारखंड और मध्य प्रदेश में जरूरी विधायक होने के बावजूद कांग्रेस हार गई, वहीं कर्नाटक में पार्टी ने उम्मीद से कहीं ज्यादा वोट हासिल करके सबको चौंका दिया. इस बात ने अब कांग्रेस के भीतर ही सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?
झारखंड में कहां हो गई गड़बड़?
झारखंड में कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की जीत तय मानी जा रही थी. आलाकमान ने भूपेश बघेल और अजय शर्मा जैसे सीनियर नेताओं को ऑब्जर्वर बनाकर रांची भेजा था. लेकिन जमीन पर इसका कोई फायदा नहीं दिखा.
सूत्रों के मुताबिक, सूत्रों की मानें तो छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चुनाव के सबसे खास मौके पर वहां मौजूद ही नहीं थे. वे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से सिर्फ एक बार मिले और वापस लौट गए. वहीं, अजय शर्मा के पुराने रिकॉर्ड पर भी उंगलियां उठ रही हैं, क्योंकि इससे पहले हरियाणा में भी उनके रहते कांग्रेस जीती हुई बाजी हार गई थी.
पार्टी के अंदर चर्चा है कि कांग्रेस लीडरशिप की ढिलाई की वजह से RJD के 4 और वामपंथी दल CPI(ML) के 2 विधायकों ने परिमल नथवानी के पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की.
चुनाव संभालने वाले कांग्रेस के एक बड़े नेता ने इशारा किया कि RJD शायद कांग्रेस से नाराज थी. उन्होंने बिहार का बदला यहां झारखंड में लिया है. दरअसल, कुछ समय पहले बिहार में हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के विधायक गायब रहे थे, जिसकी वजह से आरजेडी के उम्मीदवार ए.डी. सिंह हार गए थे. कहा जा रहा है कि RJD ने बिहार में कांग्रेस द्वारा दिए गए इसी पुराने जख्म का बदला लिया है. इसके अलावा, चुनाव से ठीक पहले सीएम हेमंत सोरेन की नथवानी से मुलाकात ने भी कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया.
मध्य प्रदेश में लापरवाही ने कराया नुकसान
मध्य प्रदेश की कहानी तो और भी हैरान करने वाली है. यहां राहुल गांधी की करीबी मानी जाने वाली नेता मीनाक्षी नटराजन का पर्चा वोटिंग से पहले ही खारिज हो गया. उनके हलफनामे में कुछ तकनीकी कमी रह गई थी, जिसकी वजह से उसे रद्द कर दिया गया. तीन बार लोकसभा चुनाव लड़ चुकीं इतनी सीनियर नेता से ऐसी बचकानी गलती कैसे हुई, इस पर कांग्रेस आलाकमान बेहद नाराज और शर्मिंदा है. पार्टी के कुछ लोगों का मानना है कि मध्य प्रदेश के स्थानीय बड़े नेताओं (कमलनाथ, दिग्विजय सिंह, जीतू पटवारी) की अनदेखी करने की वजह से अंदर ही अंदर भितरघात हुआ और बात यहां तक पहुंच गई.
कर्नाटक में डीके शिवकुमार का मास्टरस्ट्रोक
इन दो बड़े झटकों के उलट कर्नाटक से कांग्रेस के लिए बेहद खुश करने वाली खबर आई. राज्य में कांग्रेस के पास अपने 135 विधायक थे, लेकिन जब विधान परिषद चुनाव के नतीजे आए तो पार्टी उम्मीदवारों को कुल 151 वोट मिले. यानी कांग्रेस को 16 अतिरिक्त वोट हासिल हुए. यहां मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और प्रदेश अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद की जोड़ी ने कमाल कर दिया.
उन्होंने विपक्षी खेमे बीजेपी और जेडीएस के भीतर चल रही नाराजगी का पूरा फायदा उठाया और उनके विधायकों से क्रॉस-वोटिंग करा दी. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उन्होंने किसी भी चीज को किस्मत के भरोसे नहीं छोड़ा और सटीक गणित के सहारे यह बड़ी जीत हासिल की.
(इनपुट: राहुल गौतम)
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