Shesh Bharat: डीएमके की 3 शर्तें और बीजेपी की टेंशन! जानिए क्यों टल सकता है 131वां संविधान संशोधन विधेयक

रूपक प्रियदर्शी

• 08:52 AM • 08 Aug 2026

डिलिमिटेशन बिल को लेकर बीजेपी की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं. कांग्रेस से रिश्तों में खटास के बावजूद डीएमके ने बीजेपी का साथ देने से इनकार कर दिया है. राहुल गांधी और अभिनेता विजय के दबाव के बाद उदयनिधि स्टालिन ने साफ किया कि पार्टी बिल का विरोध जारी रखेगी. इससे बीजेपी का 360 वोटों का गणित अटक गया है.

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 Delimitation Bill 2026: DMK आउटरीच का बीजेपी प्लान फेल, कैच-22 में फंसा डिलिमिटेशन बिल

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राहुल गांधी के नेतृत्व में संसद में विपक्ष ने ऐसा समां बांधा कि सरकार विपक्ष को साथ लेकर संसद नहीं चला पाई. धड़ाधड़ वो सारे बिल तो पास होते जा रहे हैं, जिनमें विपक्ष या गैर-एनडीए पार्टियों के समर्थन की जरूरत नहीं, लेकिन डिलिमिटेशन बिल पास कराने का पासा रोज फेल हो रहा है. संसद की सीटें 850 तक बढ़ाने के लिए बीजेपी ने पॉलिटिकल चक्रव्यूह तो रचा, लेकिन दिल्ली से लेकर चेन्नई वाया कोलकाता तक राजनीति के तापमान को 100 डिग्री तक पहुंचा दिया था. अब कुछ ऐसा हुआ कि बीजेपी का आउटरीच ऑपरेशन ध्वस्त होता दिख रहा है. चक्रव्यूह में बीजेपी खुद ऐसी उलझी कि उसे बैकफुट पर आना पड़ा है. 13 अगस्त तक चलने वाले संसद सत्र में बिल पेश किए जाने के कोई आसार नहीं दिख रहे.

बीजेपी को क्यों लगा था कि DMK साथ आ सकती है?

सरकार को पता था कि डिलिमिटेशन बिल यानी 131वां संविधान संशोधन कराने के लिए विपक्ष को तोड़े बिना काम नहीं चलने वाला. ममता बनर्जी के चुनाव हारते ही ऑपरेशन तेज हुआ. ममता की पार्टी टूट गई. एनसीपी के टूटने की चर्चा थी. इस बीच तमिलनाडु में सत्ता समीकरण बदलने के बाद कांग्रेस-डीएमके का अलायंस टूटा तो बीजेपी की आंखें खुशी से चमक गईं. कांग्रेस विजय के साथ गई तो डीएमके ने संसद में उसके साथ बैठने या आसपास फटकने से मना कर दिया. मान लिया गया कि राहुल गांधी से दुखी एमके स्टालिन बीजेपी के साथ एनडीए में चले जाएंगे. डिलिमिटेशन के खिलाफ अपनी कसम भी तोड़ देंगे, लेकिन अब हो गया एकदम उल्टा.

उदयनिधि स्टालिन ने बीजेपी के प्लान पर फेर दिया पानी

बीजेपी को सबसे बड़ा झटका तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे एमके स्टालिन और उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन से लगा, जिन्होंने बीजेपी के 'ऑपरेशन आउटरीच' के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया. सूत्रों वाली सारी खबरों को खारिज करते हुए उदयनिधि स्टालिन ने ऐलान कर दिया कि डीएमके परिसीमन बिल का पुरजोर विरोध करती आई है और आगे भी करेगी. इस पर रुख बदलने का सवाल ही नहीं उठता.

उदयनिधि के ऐलान से साफ हो गया कि डीएमके की लीडरशिप बीजेपी के डर, कांग्रेस से नाराजगी और विजय के हाथों हार के बाद भी किसी लालच या दबाव में आकर अपने अधिकारों का सौदा करने को कतई तैयार नहीं है. हालांकि जुलाई में पार्टी ने कहा था कि प्रस्तावित विधेयक का अंतिम रुख उसके संसद में पेश होने के बाद तय करेगी.

स्टालिन ने डिलिमिटेशन को बताया था दक्षिण के अस्तित्व का सवाल

स्टालिन ने सीएम रहते हुए ही डिलिमिटेशन बिल को दक्षिण भारत के अस्तित्व और आत्मसम्मान पर चोट बताते हुए बिल की कॉपी तक जला दी थी. स्टालिन की आपत्ति और लाइन रही है कि जिन दक्षिणी राज्यों ने देश के विकास और जनसंख्या नियंत्रण नीतियों का कड़ाई से पालन किया, उन्हें इनाम मिलने के बजाय सजा दी जा रही है.

अगर मौजूदा आबादी (या 2011 की जनगणना) के आधार पर लोकसभा सीटें बढ़ाई गईं, तो उत्तर भारत के राज्य यूपी-बिहार की सीटें भारी संख्या में बढ़ जाएंगी. वहीं, जिन दक्षिणी राज्यों ने दशकों से देश की आबादी नियंत्रण नीतियों का कड़ाई से पालन किया है, उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी घट जाएगी.

अप्रैल में गिर चुका है बिल, अब दोबारा पास कराने की चुनौती

कहानी शुरू होती है अप्रैल से, जब लोकसभा में सरकार का ऐतिहासिक बिल जरूरी दो-तिहाई बहुमत यानी 360 वोट नहीं मिल पाने के कारण गिर गया था. सरकार को मिले थे सिर्फ 298 वोट. डीएमके के 22 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसद समेत कुल 32 सांसद हैं. मॉनसून सत्र में इस बिल को दोबारा पास कराने के लिए बीजेपी ने विपक्ष के बिखराव का फायदा उठाने की सोची.

चूंकि तमिलनाडु चुनाव के बाद कांग्रेस और डीएमके के बीच रिश्तों में खटास आई थी, इसलिए बीजेपी ने डीएमके के 22 लोकसभा सांसदों को साधने के लिए बैकचैनल बातचीत शुरू की. दिल्ली के गलियारों में चर्चा थी कि अगर डीएमके सदन से वॉकआउट भी कर जाए या वोटिंग में हिस्सा न ले, तो बीजेपी का दो-तिहाई का गणित आसान हो जाता.

राहुल गांधी के 'एट्टप्पन' ताने ने बढ़ाई मुश्किल

तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी (TVK) के उभार और डीएमके से कड़वाहट मोल लेने के बाद भी राहुल गांधी ने डीएमके को परिसीमन के खिलाफ न केवल एकजुट रहने का संदेश दिया था, बल्कि बिल का समर्थन करने की सोचने वालों को '21वीं सदी का एट्टप्पन' यानी गद्दार/विश्वासघाती तक कह दिया था.

विजय ने भी खेला बड़ा दांव

अभिनेता विजय भी अलग गेम खेल रहे थे. उन्होंने डीएमके को घेरने के लिए बड़ा मास्टरस्ट्रोक खेला था. उन्होंने डिलिमिटेशन को दक्षिण भारत के साथ अन्याय बताते हुए 8 अगस्त को सभी पार्टियों के 30 सांसदों की इमरजेंसी बैठक बुला ली, ताकि तमिलनाडु के हितों की रक्षा के लिए एक साझा रणनीति बनाई जा सके.

चौतरफा घिरने के बाद डीएमके बैकफुट पर आई. उदयनिधि स्टालिन ने तुरंत सफाई जारी कर कहा कि उनका स्टैंड बिल्कुल नहीं बदला है और वे बिल का विरोध जारी रखेंगे.

कांग्रेस से नाराजगी के बावजूद बीजेपी के साथ जाना आसान नहीं

कांग्रेस से नाराजगी के बावजूद डीएमके का बीजेपी के पाले में जाना इतना आसान नहीं है. डीएमके की पूरी राजनीति 'द्रविड़ियन अस्मिता' और भाषाई गौरव पर टिकी है. अगर डीएमके इस बिल पर बीजेपी को वॉकआउट करके भी फायदा पहुंचाती, तो तमिलनाडु की जनता में संदेश जाता कि स्टालिन ने बीजेपी से सौदा कर लिया.

राजनीतिक जमीन को बचाने और राज्य में विपक्ष के हमलों से बचने के लिए डीएमके ने कांग्रेस से दूरियां होने के बाद भी बीजेपी का साथ देने से साफ मना कर दिया.

DMK ने रखीं तीन बड़ी शर्तें

फिलहाल मोदी सरकार इस मोर्चे पर बैकफुट पर नजर आ रही है. डीएमके ने समर्थन के लिए तीन बड़ी शर्तें रख दी थीं, पहला, अगले 25 साल तक 1971 की जनगणना को ही आधार माना जाए; दूसरा, सभी राज्यों की सीटों में एक समान 50% की बढ़ोतरी हो; और तीसरा, बिल में राज्यवार सीटों की स्पष्ट सूची हो.

बीजेपी के लिए इन शर्तों को पूरी तरह मानना अपनी मूल रणनीति से समझौता करने जैसा है. सरकार फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट (FCRA) बिल भी लाना चाहती है. इस बिल का भी डीएमके कड़ा विरोध कर रही है.

360 वोटों का गणित अभी भी बीजेपी से दूर

अगर यह बिल विशेष सत्र में आता है, तो दो-तिहाई बहुमत का गणित बेहद दिलचस्प होगा. लोकसभा में संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई (2/3) बहुमत यानी कम से कम 360 वोटों की जरूरत है. अप्रैल में जब बिल गिरा था, तब एनडीए के पास केवल 298 वोट थे.

हाल में हुए बड़े सियासी उलटफेर जैसे तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों का टूटना और उद्धव ठाकरे गुट के 6 सांसदों का एकनाथ शिंदे खेमे में आनाके बाद अब एनडीए का आंकड़ा बढ़कर 318 हो चुका है, लेकिन 360 से अभी भी 42 कम है.

60 से ज्यादा सांसदों का समर्थन जुटाना बड़ी चुनौती

बीजेपी पहले ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 21, उद्धव शिवसेना के 5 सांसदों को अपने पाले में लाकर निश्चिंत थी, लेकिन टीएमसी के तीन बागी भी उसके साथ देने से बच रहे हैं. ये भी चर्चा है कि शरद पवार की एनसीपी भी तोड़ी जाएगी, लेकिन अभी तक ये चर्चा ही है.

अब डीएमके के 22 सांसदों के भी विरोध में डट जाने से बीजेपी के लिए विपक्षी खेमे से 60 से ज्यादा सांसदों को तोड़ना या उनका समर्थन जुटाना लोहे के चने चबाने जैसा हो रहा है.