Shesh Bharat: जब 28 साल के छात्र नेता धर्मेंद्र प्रधान ने हिला दी थी कांग्रेस सरकार, पढ़ें 1997 का वो किस्सा

रूपक प्रियदर्शी

• 11:19 AM • 24 Jul 2026

वर्ष 1997 में ओडिशा में ABVP छात्र नेता के रूप में धर्मेंद्र प्रधान ने पेपर लीक के खिलाफ उग्र आंदोलन किया था, जहां पुलिस लाठीचार्ज में घायल होकर वे चर्चित नेता बने. आज वही धर्मेंद्र प्रधान देश के शिक्षा मंत्री हैं और NEET-UG पेपर लीक विवाद को लेकर चौतरफा घिरे हुए हैं.

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मोदी सरकार को घेरने के लिए जब राहुल गांधी 152 पेपर लीक का पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन देते हैं तब शायद उसमें उस पेपर लीक का जिक्र नहीं होगा जो 1997 में ओडिशा में हुआ था. तब राज्य में कांग्रेस की सरकार हुआ करती थी और जानकी वल्लभ पटनायक सीएम थे. उन दिनों धर्मेंद्र प्रधान उत्कल यूनिवर्सिटी के 28 साल के छात्र नेता और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के राष्ट्रीय सचिव हुआ करते थे. NEET-UG पेपर लीक मामले के बीच धर्मेंद्र प्रधान के 1997 में पेपर लीक के खिलाफ किए गए आंदोलन की चर्चा तेज हुई है.

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लाठीचार्ज और छात्र नेता के रूप में उभार

29 साल पुराने ओडिशा के इस पेपर लीक का इतिहास तब सामने आया, जब पेपर लीक के दबाव में घिरे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को लेकर देश भर में आंदोलन छिड़ गया. 2021 की एक मीडिया रिपोर्ट के हवाले से दावा है कि धर्मेंद्र प्रधान इसी पेपर लीक पॉलिटिक्स से निकलकर इतने बड़े नेता बने. अगर तब पेपर लीक नहीं हुआ होता, धर्मेंद्र प्रधान करीब 1,500 छात्रों के साथ मिलकर ओडिशा सचिवालय का घेराव न करते, प्रदर्शन उग्र न हुआ होता और पुलिस के लाठीचार्ज में प्रधान के चेहरे व सिर पर गहरी चोटें न लगी होतीं, तो शायद वे इतने बड़े नेता नहीं बनते.

ओडिशा के छात्रों के 'हीरो' और पहला टर्निंग पॉइंट

उस दिन प्रधान ने पीछे हटने से मना कर दिया था. अस्पताल से जब वे पट्टियां बांधकर बाहर निकले, तो वह ओडिशा के छात्रों के लिए एक 'हीरो' बन चुके थे. यह उनके राजनीतिक जीवन का पहला बड़ा टर्निंग पॉइंट था. बीजेपी तब उतनी बड़ी पार्टी नहीं थी, लेकिन प्रधान जैसे युवा कार्यकर्ताओं के जोश से ही कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनना शुरू हुआ था.

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस और जनमत

सोशल मीडिया पर धर्मेंद्र प्रधान के उस दौर की तस्वीरें और चर्चाएं तेज हैं. कुछ लोग तारीफ कर रहे हैं कि प्रधान कितने संघर्षशील छात्र नेता हुआ करते थे. वहीं दूसरी राय यह है कि जो प्रधान खुद कभी पेपर लीक के खिलाफ लड़े, वे शिक्षा मंत्री बनकर पेपर लीक क्यों नहीं रोक पाए?

शुरुआती जीवन, संघ और छात्र राजनीति

धर्मेंद्र प्रधान का जन्म 26 जून 1969 को ओडिशा के अनुगुल जिले में हुआ था. राजनीति उनके खून में थी; उनके पिता देवेंद्र प्रधान भी बीजेपी नेता और वाजपेयी सरकार में मंत्री रहे थे. उन्होंने तालचेर कॉलेज से पढ़ाई की और फिर उत्कल यूनिवर्सिटी से एंथ्रोपोलॉजी (Anthropology) में एमए (M.A.) किया. कॉलेज के दिनों में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए और ABVP के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए. 1997 के उस लाठीचार्ज ने उनके भीतर के नेता को पूरे राज्य में स्थापित कर दिया.

जमीनी राजनीति से दिल्ली तक का सफर

ओडिशा सरकार के खिलाफ हुआ आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान ने लीड किया था और पुलिस एक्शन के बाद भी वे डटे रहे. इसके बाद उनकी पहचान राज्य के प्रमुख छात्र नेताओं में होने लगी. धर्मेंद्र प्रधान ने 18 साल की उम्र में छात्र राजनीति में कदम रखा था. उत्कल विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान वे आंदोलनों में सक्रिय रहे और नवंबर 1994 से 1997 के बीच दो बार ABVP के राष्ट्रीय सचिव भी रहे. छात्र आंदोलनों में लगातार एक्टिव रहने से संगठन की समझ विकसित हुई और पार्टी में पहचान बनी. ओडिशा बीजेपी को खड़ा करने वाले टॉप नेताओं में धर्मेंद्र प्रधान का नाम हमेशा रहेगा. हालांकि, चुनावी राजनीति में आते ही प्रधान धीरे-धीरे दिल्ली की केंद्र सरकार वाली राजनीति में सक्रिय होते गए.

विधानसभा से लोकसभा और राष्ट्रीय संगठन में कद

1997 की उस छात्र क्रांति का असर जल्द ही चुनावी राजनीति में दिखा. साल 2000 में वे पहली बार ओडिशा की पल्लाहड़ा सीट से विधानसभा चुनाव जीते, जहाँ उन्हें सर्वश्रेष्ठ विधायक का पुरस्कार भी मिला. 2004 में वे देवगढ़ सीट से लोकसभा सांसद चुने गए. संगठन में उनका कद लगातार बढ़ता रहा. वे बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव बने और बिहार, झारखंड, कर्नाटक जैसे राज्यों में पार्टी को मजबूत करने का जिम्मा संभाला.

इतिहास का अजीब मोड़: 1997 बनाम वर्तमान

कहानी का सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला मोड़ अब आया है, जब इतिहास ने खुद को बिल्कुल उल्टे तरीके से दोहराया है. 1997 में धर्मेंद्र प्रधान सड़क पर थे, पेपर लीक के खिलाफ लड़ रहे थे और सचिवालय का घेराव कर रहे थे. वहीं, आज धर्मेंद्र प्रधान खुद देश के शिक्षा मंत्री हैं और उनके अपने मंत्रालय के तहत आने वाली NEET-UG परीक्षा के पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्र संगठन संसद से लेकर जंतर-मंतर तक उनका घेराव कर रहे हैं. विपक्ष और छात्र संगठन उनकी 1997 की तस्वीरें शेयर करके उनसे इस्तीफा मांग रहे हैं. जो धर्मेंद्र प्रधान कभी पेपर लीक का विरोध करके बड़े नेता बने थे, आज वे खुद देश के सबसे बड़े पेपर लीक विवाद के केंद्र में खड़े हैं.

राजनीतिक सफर और शिक्षा मंत्री के रूप में अग्निपरीक्षा

एक साधारण संघ कार्यकर्ता से लेकर देश की कैबिनेट के सबसे रसूखदार चेहरों में शामिल होना धर्मेंद्र प्रधान की काबिलियत को दर्शाता है. लेकिन लोकतंत्र में हर रोज एक नई परीक्षा होती है, और शिक्षा मंत्री के तौर पर देश के लाखों छात्रों के भरोसे को फिर से बहाल करना इस समय धर्मेंद्र प्रधान के लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा बना हुआ है.

विरासत, संघ के संस्कार और शुरुआती पहचान

धर्मेंद्र प्रधान उन नेताओं में से हैं जिन्हें राजनीति विरासत में जरूर मिली, लेकिन उनका असली निखार आरएसएस की शाखाओं और एबीवीपी के जमीनी आंदोलनों से हुआ. धर्मेंद्र के लिए दिल्ली का रास्ता आसान नहीं था, खासकर उस दौर में जब ओडिशा में बीजेपी का खास जनाधार नहीं था. पिता देवेंद्र प्रधान के स्वयंसेवक और सांसद होने के कारण धर्मेंद्र को बचपन से ही राजनीति और संघ के संस्कार मिले. 1983 में 14 साल की उम्र में संघ की शाखाओं से शुरू हुआ सफर उनके जीवन का बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ.

ABVP से बीजेपी युवा मोर्चा और चुनावी सफलता

जब वे कॉलेज पहुंचे, तो ABVP जॉइन कर ली. उत्कल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान वे छात्र नेता बने. संघ ने उनकी पहचान एक ऐसे नौजवान के रूप में की जो भीड़ जुटाने, पोस्टर चिपकाने और जमीन पर संगठन खड़ा करने में माहिर था. ABVP से आगे बढ़कर 1998 में उन्हें बीजेपी युवा मोर्चा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया. इसके बाद 2000 में पल्लाहड़ा विधानसभा सीट और 2004 में देवगढ़ लोकसभा सीट जीतकर वे दिल्ली की राजनीति में आ गए.

साइलेंट किंगमेकर और चुनावी मैनेजमेंट की यूएसपी

पार्टी ने जब उन्हें ओडिशा से बाहर बिहार, झारखंड, उत्तराखंड और कर्नाटक जैसे राज्यों का चुनाव प्रभारी बनाया, तब उनकी असली परीक्षा हुई. धर्मेंद्र की सबसे बड़ी ताकत उनका शांत स्वभाव, लो-प्रोफाइल रहना और पर्दे के पीछे रहकर काम निपटाना माना जाता है. उन्होंने जिस जिम्मेदारी को संभाला, उसे बखूबी पूरा किया.

उज्ज्वला योजना की सफलता और वर्तमान चुनौती

2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान की कार्यकुशलता को पहचानते हुए उन्हें पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री बनाया. उन्होंने गरीब महिलाओं को मुफ़्त गैस कनेक्शन देने वाली 'उज्ज्वला योजना' को सफल बनाया, जिसने 2019 के चुनावों में बीजेपी की जीत की मजबूत नींव रखी. वे अमित शाह के साथ मिलकर उन राज्यों में भी चुनावी मैनेजमेंट संभालते रहे जहाँ पार्टी कमजोर थी. सरकार और संगठन दोनों जगह वे 'डिलीवरी मैन' साबित हुए. हालांकि, फिलहाल NEET पेपर लीक विवाद के कारण वे विपक्ष और राहुल गांधी के निशाने पर हैं, जिसे संभालना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है.