Shesh Bharat: कर्नाटक की राजनीति में डीके का मास्टरस्ट्रोक! बीजेपी भी नहीं कर सकी इनकार

रूपक प्रियदर्शी

• 09:19 AM • 29 Jul 2026

Shesh Bharat: दिल्ली में डी.के. शिवकुमार की पहल पर कर्नाटक के विकास से जुड़े मुद्दों पर सर्वदलीय बैठक हुई, जिसमें बीजेपी के केंद्रीय मंत्री और सांसद भी शामिल हुए. बैठक में सूखा राहत, कावेरी और महादायी परियोजनाओं समेत कई लंबित योजनाओं पर केंद्र से मंजूरी दिलाने की रणनीति बनी. कुमारस्वामी इसमें शामिल नहीं हुए.

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Shesh Bharat: बेंगलुरु से लेकर दिल्ली तक... जब राजनीति की दो सबसे बड़ी पार्टियों के नेता एक ही कमरे में, एक ही टेबल पर बैठ जाएं तो समझना चाहिए कि कोई बहुत बड़ा 'खेला' हुआ है. कर्नाटक की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले डी.के. शिवकुमार ने दिल्ली में ऐसी बिसात बिछाई कि मोदी सरकार के कद्दावर केंद्रीय मंत्री और बीजेपी के फायरब्रांड सांसद 'हक' के बहाने सीधे डी.के. के दरबार में दौड़े चले आए. इसे डी.के. शिवकुमार का 'मास्टरस्ट्रोक' कहिए या बीजेपी की मजबूरी, लेकिन दिल्ली की इस 'महा-बैठक' ने कर्नाटक की राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया है. आखिर बंद कमरे में 'सुलह' की इस चाय पर क्या खिचड़ी पकी? और कैसे डी.के. ने बीजेपी के ही मोहरों से दिल्ली दरबार को शह दे दी?

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विरोध के बावजूद एक मंच पर आए नेता

कांग्रेस और बीजेपी की तलवारें हमेशा खिंची रहती हैं. कर्नाटक में तो यही दो पार्टियां हैं, इसलिए गला-काट लड़ाई वैसे भी होती रहती है. लेकिन दिल्ली से एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने सबको हैरान कर दिया. कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने दिल्ली में एक बैठक बुलाई और राज्य के हित का वास्ता ऐसा था कि धुर विरोधी बीजेपी के सांसद और कर्नाटक से मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री भी दौड़े चले आए.

डीके शिवकुमार से बीजेपी क्यों रहती है सतर्क?

कर्नाटक की राजनीति में डी.के. शिवकुमार को कांग्रेस का सबसे बड़ा 'संकटमोचक' और 'पॉलिटिकल चाणक्य' माना जाता है. यही वजह है कि राज्य की बीजेपी हमेशा उनसे बेहद संभलकर और चौकन्नी रहती है. डीके केवल एक नेता नहीं, बल्कि वोक्कालिगा समुदाय के सबसे मजबूत चेहरे और अपार वित्तीय व संगठनात्मक ताकत के मालिक हैं. बीजेपी को अच्छी तरह याद है कि चाहे रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के जरिए अहमद पटेल की राज्यसभा सीट बचाना हो, या कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस की सरकार बनाना, या एमएलसी चुनाव में बीजेपी में क्रॉस वोटिंग करानी हो डीके ने हर बार बीजेपी के 'ऑपरेशन लोटस' के चक्रव्यूह को तोड़ा है. उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका 'आक्रामक और अप्रत्याशित (Aggressive and Unpredictable)' स्वभाव है. वे कब, कहां और कौन-सी सियासी चाल चल दें, इसका अंदाजा बीजेपी के चाणक्य भी नहीं लगा पाते.

बैठक में दिखा डीके का राजनीतिक प्रभाव

दिल्ली की इस सर्वदलीय बैठक में भी उन्होंने राज्य के मुद्दों पर ऐसा 'मास्टरस्ट्रोक' खेला कि बीजेपी सांसद, न चाहते हुए भी, उनके बुलावे को ठुकरा नहीं पाए. बीजेपी जानती है कि डीके को घेरने की कोई भी आक्रामक कोशिश उनके वोक्कालिगा वोटबैंक को और मजबूत कर सकती है. इसलिए बीजेपी उनके खिलाफ हर कदम फूंक-फूंककर और बेहद सतर्कता से उठाती है.

बैठक में कौन-कौन शामिल हुआ?

डीके की हाई-प्रोफाइल बैठक में मोदी सरकार के केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी, शोभा करंदलाजे और वी. सोमन्ना अगली पंक्ति में बैठे नजर आए. पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई और जगदीश शेट्टार जैसे धुर विरोधी चेहरों ने भी बैठक में शिरकत की. राजनीति की कड़वाहट को भूलकर इन्फोसिस फाउंडेशन की अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद सुधा मूर्ति, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश और अजय माकन भी कर्नाटक की आवाज बुलंद करने के लिए एकजुट दिखे. बीजेपी नेताओं ने खुद माना कि उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में विपक्षी मुख्यमंत्री की बैठक में ऐसी भारी और सर्वदलीय मौजूदगी पहले कभी नहीं देखी थी. कर्नाटक की राजनीति में डीके की इस बैठक को बड़ी सफलता माना जा रहा है.

कुमारस्वामी ने क्यों बनाई दूरी?

इस बैठक की एक और दिलचस्प इनसाइड स्टोरी यह रही कि बीजेपी के सांसद तो बैठक में पहुंच गए, लेकिन जेडीएस (JDS) के नेता और केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी (H.D. Kumaraswamy) इसमें शामिल नहीं हुए. राजनीतिक एंगल यह हो सकता है कि कुमारस्वामी और डी.के. शिवकुमार दोनों वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं और कर्नाटक की राजनीति में दोनों एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं. गलियारों में चर्चा है कि कुमारस्वामी जानबूझकर डी.के. को इस बैठक का पूरा श्रेय नहीं लेने देना चाहते थे, जबकि उनकी सहयोगी बीजेपी के नेता वहां खुलकर डी.के. के साथ बैठे नजर आए. यह बीजेपी-जेडीएस गठबंधन के भीतर के छोटे-मोटे मतभेदों को भी उजागर करता है.

बैठक का असली एजेंडा क्या था?

इस महा-बैठक का एजेंडा कोई सियासी जोड़-तोड़ नहीं, बल्कि कर्नाटक का हक था. बैठक में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राज्य के विकास और संकटों पर गंभीर मंथन हुआ. कर्नाटक इस समय सूखे की भीषण मार झेल रहा है, इसलिए केंद्र सरकार से सूखा राहत राशि तुरंत जारी कराने पर सहमति बनी. सालों से लंबित कावेरी जल विवाद और महादायी परियोजना जैसी सिंचाई एवं पेयजल योजनाओं को केंद्र से हरी झंडी दिलाने के लिए साझा रणनीति तैयार की गई. डी.के. शिवकुमार ने साफ किया कि जब बात राज्य की जनता की हो, तो पार्टी का झंडा आड़े नहीं आना चाहिए. सभी बीजेपी और जेडीएस सांसदों ने भरोसा दिया कि वे संसद के मानसून सत्र में एकजुट होकर केंद्र के सामने कर्नाटक के हक की पैरवी करेंगे.

डीके का राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक कैसे बना?

सवाल यह है कि डी.के. शिवकुमार ने यह अनोखी पहल क्यों की? डी.के. जानते हैं कि केंद्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार है और कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार. ऐसे में अकेले लड़ाई लड़ने से बेहतर है कि राज्य से चुनकर गए बीजेपी और जेडीएस के सांसदों को ही ढाल बनाया जाए. अगर केंद्र से फंड मिलने में देरी होती, तो कांग्रेस इसका ठीकरा सीधे बीजेपी सांसदों पर फोड़ सकती थी. डी.के. ने बीजेपी नेताओं को बुलाकर उन्हें 'चेकमेट' कर दिया. यानी अब वे न तो राज्य के प्रोजेक्ट्स का विरोध कर सकते हैं और न ही केंद्र में चुप बैठ सकते हैं. इसे डी.के. शिवकुमार का एक तीर से दो शिकार करने वाला सियासी मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है.

कर्नाटक की राजनीति में ऐतिहासिक पहल

आमतौर पर भारतीय राजनीति में ऐसी सर्वदलीय एकजुटता दुर्लभ होती है. कर्नाटक के इतिहास में पहले भी कावेरी नदी जल विवाद या सीमा विवाद जैसे गंभीर मुद्दों पर मुख्यमंत्रियों ने सर्वदलीय बैठकें बुलाई हैं, लेकिन वे बैठकें बेंगलुरु के विधान सौधा तक ही सीमित रहती थीं. यह पहली बार है जब किसी मुख्यमंत्री ने देश की राजधानी दिल्ली में सीधे केंद्रीय मंत्रियों और विपक्षी सांसदों को एक टेबल पर ला दिया. अतीत में अक्सर देखा गया है कि विपक्षी सांसद ऐसी बैठकों से दूरी बना लेते थे या केवल खानापूर्ति के लिए प्रतिनिधि भेजते थे. लेकिन इस बार डी.के. शिवकुमार ने जिस तरह व्यक्तिगत तौर पर संपर्क साधकर विपक्ष के शीर्ष नेतृत्व को दिल्ली में एक छत के नीचे जुटाया, उसने कर्नाटक की राजनीति में सहयोग और समन्वय का नया अध्याय लिख दिया.

बैठक के बाद बीजेपी की सफाई

बैठक से बाहर निकलते ही बीजेपी नेताओं को अंदाजा हो गया था कि कांग्रेस इसे डी.के. शिवकुमार का मास्टरस्ट्रोक बताएगी. प्रह्लाद जोशी ने सफाई दी कि हम यहां डी.के. शिवकुमार या कांग्रेस के बुलावे पर नहीं आए हैं, बल्कि कर्नाटक की जनता के प्रतिनिधि होने के नाते आए हैं. राज्य के विकास के लिए हम किसी भी मंच पर जाने को तैयार हैं. वहीं पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा कि यह कोई राजनीतिक आत्मसमर्पण नहीं है. हमने साफ कर दिया है कि मेकेदातु और कावेरी परियोजनाओं में देरी के लिए राज्य सरकार की सुस्ती जिम्मेदार है.

किन परियोजनाओं पर बनी रणनीति?

कर्नाटक और केंद्र सरकार के बीच लंबे समय से कई बड़े प्रोजेक्ट्स और फंड को लेकर गतिरोध बना हुआ है. सबसे बड़ा मुद्दा कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु बैलेंसिंग रिजर्वॉयर प्रोजेक्ट का है. इसके अलावा महादायी जल विवाद परियोजना और ऊपरी कृष्णा परियोजना (UKP Stage-III) को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने की मांग भी लंबित है. केवल पानी ही नहीं, बल्कि सूखा राहत के तहत मांगी गई वित्तीय सहायता और जीएसटी मुआवजे का बकाया भी जल्द जारी कराने के लिए सभी सांसदों से एकजुट होकर दबाव बनाने की अपील की गई.

राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं. डी.के. शिवकुमार ने दिल्ली की धरती पर बीजेपी सांसदों को एक साथ बिठाकर यह साबित कर दिया कि जब बात कर्नाटक की अस्मिता और हक की आएगी, तो बेंगलुरु की कड़वाहट को दिल्ली के होटलों में दफन करना ही पड़ेगा. अब देखना यह है कि दिल्ली में बनी यह मजबूती संसद के भीतर क्या रंग लाती है.