दक्षिण भारत की राजनीति में इस वक्त एक ऐसा भूचाल मचा है, जिसने दो राज्यों के पॉवरहाउस नेताओं को आमने-सामने खड़ा कर दिया है. न चाहते हुए भी तमिलनाडु के सीएम सी. जोसेफ विजय और कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार को रंजिश के रास्ते जाना पड़ रहा है. ये सब तब हुआ है जब कुछ ही समय पहले दोनों नेता मेकेदातु प्रोजेक्ट के विवाद का रास्ता निकालने के लिए मिलने वाले थे. लेकिन दोनों राज्यों में भड़के भारी विरोध के कारण ऐतिहासिक मीटिंग रद्द हो गई. पानी की यह जंग सुप्रीम कोर्ट के कानूनी गलियारों में पहुंची और अब कावेरी के जंगलों में हुए एक कथित एनकाउंटर ने इस आग में पेट्रोल का काम किया है.
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कावेरी नदी के पानी की लड़ाई के बीच, 15 अगस्त की सुबह कर्नाटक के चामराजनगर जंगलों में गोलियां गूंज उठीं. कर्नाटक वन विभाग का दावा है कि उन्होंने आत्मरक्षा में फायरिंग की, जिसमें तमिलनाडु के तीन कथित शिकारी मारे गए. कर्नाटक का दावा है कि मारे गए शिकारियों के पास से हिरण का मांस और अवैध हथियार बरामद हुए. लेकिन कहानी का दूसरा पहलू बेहद चौंकाने वाला है. तमिलनाडु के पीड़ित परिवारों का दावा है कि मारे गए लोग कोई तस्कर नहीं, बल्कि जंगल में भटके अपने मवेशियों को ढूंढने गए मासूम ग्रामीण थे, जिन्हें घेरकर मार दिया गया. वन विभाग की इस 'सेल्फ-डिफेंस' थ्योरी और पीड़ित परिवारों के 'कत्लेआम' के दावों के बीच कावेरी के ये जंगल अब एक बड़े मर्डर मिस्ट्री का कुरुक्षेत्र बन चुके हैं."
तमिलनाडु के सीएम विजय ने बिना वक्त गंवाए इसे 'सोचा-समझा नरसंहार करार दे दिया और सीधे CBI जांच की मांग ठोक दी. विजय का यह आक्रामक रूप देखकर डीके शिवकुमार का भी सियासी पारा चढ़ गया. डीके ने विजय को दो टूक लहजे में 'नो एंट्री' का बोर्ड दिखाते हुए कहा— 'यह भारत का फेडरल स्ट्रक्चर है, कोई हमारे अंदरूनी मामलों में दखल न दे. हमें अपने राज्य की संप्रभुता और गरिमा की रक्षा करना आता है.' डीके ने सीबीआई जांच को सीधे खारिज कर दिया, जिससे पानी का यह विवाद अब दो राज्यों की साख की लड़ाई बन चुका है.
ग्रामीणों के लिए सदियों पुराना एक साझा
चामराजनगर और तमिलनाडु की सीमा पर फैला यह कावेरी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी कोई नया इलाका नहीं है, बल्कि दोनों राज्यों के ग्रामीणों के लिए सदियों पुराना एक साझा गलियारा रहा है. तमिलनाडु के सीमावर्ती गांवों में रहने वाले गरीब चरवाहे, किसान और आदिवासी पीढ़ियों से अपने मवेशियों गायों और भैंसों को चराने के लिए या सूखी लकड़ियां और जड़ी-बूटियां इकट्ठा करने के लिए अनजाने में ही सही, इस घने जंगल की सीमा को लांघकर कर्नाटक की तरफ आते रहे हैं. लोगों के लिए यह जंगल कभी कोई 'इंटरनेशनल बॉर्डर' नहीं था, बल्कि उनकी रोजी-रोटी का जरिया था. लेकिन हाल के वर्षों में वन्यजीव कानूनों की कड़ाई, हाथी दांत और चंदन की तस्करी रोकने के लिए कर्नाटक वन विभाग की आक्रामक गश्त और अब इस खूनी एनकाउंटर ने इस पारंपरिक और दोस्ताना रास्ते को एक खौफनाक और विवादित मिलिट्री जोन में तब्दील कर दिया है.
बंद कमरों की जो मीटिंग मेकेदातु का हल निकाल सकती थी, वो राज्यों के विरोध की भेंट चढ़ गई. मामला कोर्ट पहुंचा और अब चामराजनगर के जंगलों की गोलियों ने दो मुख्यमंत्रियों के बीच राजनीतिक खाई खोद दी है. सीएम विजय अपनी नई पारी में खुद को तमिलों का 'एकमात्र मसीहा' साबित करने में जुटे हैं, तो डीके शिवकुमार ने भी साफ कर दिया है कि कर्नाटक के स्वाभिमान से कोई समझौता नहीं होगा.
सीएम विजय तमिलनाडु में एक नया इतिहास लिखने आए हैं
इस नए विवाद ने दोनों मुख्यमंत्रियों के बीच की पॉलिटिकल केमिस्ट्री को पूरी तरह बदल दिया है. दो ऐसे नेताओं की टक्कर है जो खुद को अपनी जनता के सामने कमजोर नहीं दिखा सकते. सीएम विजय तमिलनाडु में एक नया इतिहास लिखने आए हैं, उनके लिए तमिल अस्मिता और अपने लोगों के अधिकारों की रक्षा करना ही पहला एजेंडा है. अगर वे इस मुद्दे पर चुप रहते, तो विपक्ष उन्हें घेर लेता. दूसरी तरफ, डीके शिवकुमार कर्नाटक के किंग हैं, जो अपनी ही धरती पर किसी बाहरी राज्य का दबाव स्वीकार नहीं कर सकते. यही वजह है कि दोनों की केमिस्ट्री में इस वक्त सहयोग का 'सॉफ्ट कॉर्नर' नहीं, बल्कि 'हार्ड पॉलिटिक्स' का टकराव दिख रहा है.
अब समझिए इस टकराव का सबसे बड़ा पॉलिटिकल इम्पैक्ट. इस सियासी जंग का सीधा असर कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ने जा रहा है. तमिलनाडु में कांग्रेस, सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा रही है, लेकिन नए सीएम विजय के इस बेहद आक्रामक तमिल-राष्ट्रवाद के आगे तमिलनाडु कांग्रेस पूरी तरह अलग-थलग पड़ गई है. तमिलनाडु कांग्रेस न तो अपनी ही पार्टी की कर्नाटक सरकार का बचाव कर पा रही है और न ही सीएम विजय के स्टैंड का खुलकर विरोध कर पा रही है. ऐसे विवादों से तमिलनाडु में कांग्रेस और टीवीके के बीच की दरारें और चौड़ी होंगी, जिसका सीधा फायदा वहां के विपक्ष को मिल सकता है. कर्नाटक में, डीके शिवकुमार के लिए मौका बना है कि वो कड़ा स्टैंड लेकर खुद को 'कन्नड़ अस्मिता' के सबसे बड़े रक्षक के रूप में पेश करें. जिससे राज्य की राजनीति में उनका कद और मजबूत होगा.
तमिलनाडु के नए सीएम विजय से एक 'हाई-लेवल' मीटिंग
कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार कावेरी नदी पर ₹9,000 करोड़ के मेकेदातु बांध का रास्ता साफ करने के लिए तमिलनाडु के नए सीएम विजय से एक 'हाई-लेवल' मीटिंग करने वाले थे. कर्नाटक चाहता था कि आपसी बातचीत से बेंगलुरु के पीने के पानी का मसला हल हो जाए. लेकिन जैसे ही यह खबर लीक हुई, दोनों राज्यों की क्षेत्रीय अस्मिता जाग गई. तमिलनाडु के विपक्षी दलों ने विजय पर घुटने टेकने का आरोप लगाया, तो कर्नाटक में डीके पर दबाव बढ़ गया. नतीजा? मीटिंग रद्द हो गई. इसके बाद दोनों राज्य सुप्रीम कोर्ट के लीगल अखाड़े में कूद पड़े, जहां पानी की एक-एक बूंद के लिए कानूनी जंग शुरू हो गई. दोनों राज्यों के बीच तनाव पहले से ही चरम पर था, लेकिन किसी को नहीं पता था कि यह तनाव जल्द ही खूनी शक्ल अख्तियार करने वाला है.
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