संसद के मॉनसून सत्र में तमिलनाडु की राजनीति का एक ऐसा हाई-वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला है, जिसने दिल्ली से लेकर चेन्नई तक की राजनीतिक हलचल बढ़ा दी. डीएमके सांसद और एम.के. स्टालिन की बहन कनिमोझी ने वंदे मातरम और पेपर लीक पर ऐसा भाषण दिया कि बीजेपी के साथ डीएमके के जाने की अटकलें लगभग खत्म होती नजर आने लगीं.
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BJP-DMK गठबंधन की अटकलों पर विराम
कांग्रेस के TVK के साथ जाने के बाद यह माना जा रहा था कि बीजेपी और डीएमके के बीच पर्दे के पीछे सॉफ्ट पॉलिटिक्स चल रही है. एनडीए में जाने की अटकलें भी लग रही थीं, लेकिन कनिमोझी के एक भाषण ने इन सब पर पूरी तरह पानी फेर दिया.
संसद के भीतर विपक्ष के भारी हंगामे और वॉकआउट के बीच डीएमके ने मैदान नहीं छोड़ा, बल्कि संसद में रहकर मोदी सरकार के दो सबसे बड़े विधेयकों, एंटी-पेपर लीक बिल और वंदे मातरम बिल पर ऐसा तीखा प्रहार किया कि दोनों के बीच की वैचारिक खाई खुलकर सामने आ गई.
वंदे मातरम बिल पर कनिमोझी का हमला
जंतर-मंतर प्रदर्शन और पेपर लीक विवाद के बीच सरकार ने वंदे मातरम बिल भी पास करा लिया. संसद में इस पर बहस हुई, लेकिन उतनी गरमागरमी नहीं हुई जितनी पेपर लीक बिल पर हुई.
डीएमके सांसद कनिमोझी ने 'राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026' यानी वंदे मातरम बिल पर सीधा और बेहद तीखा हमला बोला. कनिमोझी ने बिल को राष्ट्रवाद के मुखौटे में छिपा हिंदुत्व एजेंडा करार देते हुए इसे देश के संघवाद और तमिल अस्मिता पर चोट बताया.
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इस बिल के जरिए तमिलनाडु के राज्य गीत 'तमिल थाई वाझ्थु' को दबाने और हिंदी-हिंदुत्व को थोपने की कोशिश कर रही है. कनिमोझी के इस आक्रामक रुख और उसके बाद बीजेपी के संबित पात्रा के साथ हुए आमने-सामने के टकराव ने यह साफ कर दिया कि वैचारिक मोर्चे पर डीएमके, बीजेपी के सामने रत्ती भर भी झुकने को तैयार नहीं है.
एंटी-पेपर लीक बिल पर भी विरोध
संसद में एंटी-पेपर लीक बिल पर भी संग्राम छिड़ा. कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी के आईआईटी मद्रास के निदेशक वी. कामकोटि को 'गौमूत्र विशेषज्ञ' कहने पर 215 कुलपतियों ने विरोध पत्र जारी कर दिया. विपक्ष ने बिल के विरोध में वॉकआउट भी किया.
विपक्ष के वॉकआउट के बावजूद डीएमके सदन में अकेली डटी रही. डीएमके ने इस बिल को महज एक 'सतही सुधार' बताते हुए कड़ा विरोध किया और मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET को पूरी तरह खत्म करने की मांग दोहराई. पार्टी ने साफ कहा कि एनटीए (NTA) का मौजूदा ढांचा ही भ्रष्टाचार की जड़ है और इसका एकमात्र समाधान परीक्षा प्रणाली का विकेंद्रीकरण कर राज्यों को उनके अधिकार वापस लौटाना है. डीएमके के दयानिधि मारन ने न सिर्फ इस पर अपनी आवाज बुलंद की, बल्कि बिल के खिलाफ सदन में संशोधन भी पेश किए.
NEET पर तमिलनाडु की पुरानी नीति
तमिलनाडु सरकार मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET का शुरू से ही कड़ा विरोध कर रही है. सरकार किसी भी पार्टी की हो, तमिलनाडु की सामूहिक आवाज है कि NEET सामाजिक न्याय के खिलाफ है और गरीब व ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के साथ भेदभाव करता है.
मुख्यमंत्री रहते हुए एम.के. स्टालिन की सरकार ने राज्य विधानसभा में NEET को खत्म करने के लिए एक विधेयक भी पारित किया था, जिसमें मांग की गई थी कि तमिलनाडु को इस परीक्षा से पूरी तरह छूट दी जाए. स्टालिन सरकार के जाने के बाद विजय सरकार का भी तर्क है कि मेडिकल कॉलेजों में दाखिले केवल 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर होने चाहिए, ताकि कोचिंग सेंटरों की महंगी फीस न भर पाने वाले छात्रों को भी डॉक्टर बनने का समान अवसर मिल सके.
TVK के उभार के बाद बदले समीकरण
तमिलनाडु की घरेलू राजनीति में इस वक्त बड़े बदलाव हो रहे हैं. सुपरस्टार विजय की पार्टी (TVK) के उभार और उनके साथ कांग्रेस के जाने के बाद राज्य में डीएमके का पुराना गठबंधन टूट चुका है. लेकिन इस राजनीतिक अलगाव के बावजूद डीएमके ने बीजेपी के प्रति अपने रुख को जरा भी नरम नहीं होने दिया. स्टालिन का संदेश है कि वह अपनी द्रविड़ राजनीति और तमिल गौरव के सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करेंगे, चाहे उन्हें चुनाव अकेले ही क्यों न लड़ना पड़े.
विजय सरकार बनने के बाद बदली तस्वीर
तमिलनाडु में 4 मई को चुनाव के नतीजे आए. सबको हैरान करते हुए थलापति विजय ने चुनाव जीतकर सरकार बना ली. बहुमत के लिए जरूरत पड़ने पर कांग्रेस और छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन कर लिया. स्टालिन ने बरसों तक जो नहीं किया, वह विजय ने कांग्रेस को सरकार में शामिल करके कर दिखाया. इतना सब करने के लिए राहुल गांधी ने स्टालिन से व्यक्तिगत दोस्ती और डीएमके से पुराना गठबंधन दांव पर लगा दिया.
राहुल गांधी का स्टालिन को संदेश
पूरी सियासी रस्साकशी के बीच राहुल गांधी अभी भी डीएमके के साथ रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहते. राज्य स्तर पर भले ही कांग्रेस अब विजय के साथ दिख रही हो, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वह बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में डीएमके जैसी मजबूत वैचारिक ताकत का साथ नहीं छोड़ना चाहती.
इसी वजह से राहुल गांधी ने अपने जन्मदिन पर बधाई देने वाले एम.के. स्टालिन को सोशल मीडिया पर जवाब देते हुए लिखा, "इंडिया के विचार, हमारे संविधान और संघवाद की रक्षा का हमारा साझा संकल्प हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा. यह हमारे लोकतंत्र की आत्मा की लड़ाई है और हम इसे मिलकर लड़ेंगे, जब तक जीत नहीं जाते."
राहुल का यह संदेश दिखाता है कि केंद्र के स्तर पर कांग्रेस अभी भी स्टालिन के साथ रिश्ते सुधारने की उम्मीद लगाए हुए है.
परिसीमन पर अगली बड़ी लड़ाई
तमिलनाडु में अगला सबसे बड़ा टकराव परिसीमन (Delimitation) यानी लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण को लेकर होने जा रहा है. मुख्यमंत्री रहते हुए एम.के. स्टालिन ने इस प्रस्तावित परिसीमन कानून को "काला कानून" बताते हुए केंद्र को खुली चुनौती दी थी.
परिसीमन विधेयक पर बीजेपी को संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत है. इसलिए उसकी कोशिश है कि डीएमके या तो इस बिल का समर्थन करे या मतदान के समय तटस्थ रहे. हालांकि स्टालिन का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण की नीति का बेहतर पालन करने वाले तमिलनाडु को कम सीटें देकर सजा नहीं दी जा सकती. शुरुआती विरोध के बाद फिलहाल डीएमके ने 'वेट एंड वॉच' की रणनीति अपनाई है.
डीएमके का अंतिम रुख क्या होगा?
अब डीएमके का कहना है कि जब तक केंद्र सरकार लिखित में यह गारंटी नहीं देती कि तमिलनाडु की राजनीतिक ताकत और सीटों का अनुपात कम नहीं होगा, तब तक वह कोई समझौता नहीं करेगी.
हालांकि संसद में कनिमोझी के आक्रामक रुख ने यह साफ कर दिया है कि तमिलनाडु की राजनीति में समीकरण चाहे बदल जाएं, लेकिन दिल्ली के खिलाफ वैचारिक लड़ाई में बीजेपी के मुकाबले डीएमके आज भी कांग्रेस के साथ खड़ी दिखाई देती है. अंतिम तस्वीर तब साफ होगी, जब सरकार परिसीमन विधेयक लेकर आएगी.
विजय और डीएमके की साझा लाइन
दिलचस्प बात यह है कि तमिलनाडु की घरेलू राजनीति में एक-दूसरे के धुर विरोधी होने के बावजूद मुख्यमंत्री विजय (TVK) और विपक्ष में बैठी डीएमके की राष्ट्रीय मुद्दों पर लाइन लगभग समान है. विजय ने भी केंद्र के परिसीमन प्लान को भेदभावपूर्ण बताया है और कहा है कि तमिलनाडु अपनी राजनीतिक ताकत किसी भी कीमत पर कम नहीं होने देगा.
भाषाई गौरव और राज्य के अधिकारों के मुद्दे पर विजय और स्टालिन दोनों की आवाज एक जैसी सुनाई देती है. विजय ने भी NEET को लेकर वही रुख अपनाया है जो स्टालिन सरकार का था कि मेडिकल प्रवेश केवल 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर होना चाहिए.
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