वर्ष 2026 के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने देश के सियासी समीकरणों को पूरी तरह उलट-पुलट कर रख दिया है. इस चुनाव में दो सबसे बड़े बदलाव देखने को मिले. पहला बदलाव पश्चिम बंगाल में हुआ, जहां ममता बनर्जी की हार के बाद मची बगावत से BJP मजबूत हो रही है. वहीं दूसरा बड़ा बदलाव तमिलनाडु में दिखा, जहां थलापति विजय की एंट्री से कांग्रेस और डीएमके (DMK) का पुराना गठबंधन टूट गया. विपक्ष के 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन से डीएमके का बाहर होना राहुल गांधी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा था, लेकिन इसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पर नया दांव चलकर सत्ताधारी एनडीए (NDA) की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं.
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राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज थी कि कांग्रेस से अलग होने के बाद स्टालिन पूरी पार्टी के साथ बीजेपी के पाले में चले जाएंगे और संसद में सरकार के हर फैसले का समर्थन करेंगे. केंद्र सरकार भी इसी उम्मीद में थी कि इस नए समर्थन की मदद से अगले सत्र में लोकसभा और राज्यसभा की सीटें बदलने वाले 'परिसीमन बिल' को पास करा लिया जाएगा. इस बिल को पास कराने के लिए सरकार को लोकसभा में 362 सांसदों (दो-तिहाई बहुमत) की जरूरत है, जो फिलहाल उसके पास नहीं है. संख्या बल की इसी कमी के चलते यह बिल पिछले अप्रैल महीने में भी गिर चुका था.
तमिलनाडु के अधिकारों पर समझौता नहीं: ए राजा
डीएमके के बीजेपी में शामिल होने की अटकलों के बीच पार्टी के डिप्टी महासचिव ए राजा ने एक बड़ा एलान कर दिया है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि डीएमके संसद में परिसीमन बिल का समर्थन बिल्कुल नहीं करेगी.
ए राजा ने कहा, "हमारे अलग होने को बीजेपी की तरफ राजनीतिक झुकाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. सिर्फ इसलिए कि हम इंडिया गठबंधन से बाहर आ गए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि हम बीजेपी के साथ जा रहे हैं." उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पार्टी अभी भी दूसरे विपक्षी दलों के संपर्क में है और देश में एक 'तीसरे मोर्चे' (Third Front) के गठन पर काम कर रही है.
हार के बाद भी मजबूत है DMK
चुनावों में हार के बाद जहां पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी में बिखराव दिख रहा है, वहीं तमिलनाडु में चुनावी हार के बावजूद डीएमके के अंदर कोई हलचल नहीं है. साल 2024 के लोकसभा चुनाव में अकेले 22 सीटें जीतने वाली डीएमके आज भी संसद के निचले सदन में पांचवीं सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है. राज्यसभा में भी पार्टी के पास 8 सांसद हैं, हालांकि इस बार राज्य के विधानसभा चुनाव में पार्टी को 234 में से केवल 59 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा है.
क्या है उत्तर बनाम दक्षिण का पूरा विवाद?
परिसीमन बिल की वजह से देश में उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है. स्टालिन और दक्षिण की अन्य पार्टियों का मानना है कि यह बिल दक्षिण भारत के राजनीतिक प्रभाव को कम करने और उत्तर भारत की सीटें बढ़ाने की एक कोशिश है.
आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू और केरल के पिनाराई विजयन जैसी सरकारों का तर्क है कि जिन राज्यों ने 1970 के दशक में केंद्र के कहने पर जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन को कड़ाई से लागू किया, उन्हें सीटें घटाकर सजा दी जा रही है. इसके उलट, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को आबादी बढ़ने का फायदा ज्यादा सीटें देकर मिल रहा है.
शर्तों का पेच और अमित शाह का 'फ्लैट 50% मॉडल'
डीएमके ने शर्त रखी है कि यदि संसद में सीटों की संख्या बढ़ानी भी है, तो राज्यों के बीच सीटों का जो अनुपात 1971 की जनगणना (20 लाख आबादी पर 1 सांसद) के आधार पर तय था, उसमें कोई बदलाव नहीं होना चाहिए.
दूसरी तरफ, गृह मंत्री अमित शाह ने इस उत्तर-दक्षिण विवाद को सुलझाने के लिए एक "फ्लैट 50% मॉडल" (Flat 50% Increase Model) का फॉर्मूला दिया है. इस फॉर्मूले के तहत 2011 की जनगणना के आधार पर देश में लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़कर सीधे 816 या 850 हो सकती हैं. इसमें हर राज्य की मौजूदा सीटों में 50% की सीधी बढ़ोतरी की जाएगी. अमित शाह के गणित के अनुसार, इससे दक्षिण के पांच राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जाएंगी; जिसमें तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 हो जाएंगी. सरकार का तर्क है कि इससे किसी को नुकसान नहीं होगा, लेकिन डीएमके को इस मौखिक आश्वासन पर भरोसा नहीं है और वे इसकी कानूनी गारंटी की मांग कर रहे हैं.
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