देश की राजनीति में इस वक्त का सबसे बड़ा और सबसे सनसनीखेज भूचाल आया हुआ है. एक ऐसा खुलासा, जिसने चुनाव आयोग की नींव को हिला दिया है. अब तक पूरे देश में, विपक्ष से लेकर आम जनता तक यही सबसे बड़ा इम्प्रेशन था कि चुनाव आयोग के सारे फैसलों में तीनों चुनाव आयुक्तों की पूरी रजामंदी और मिलीभगत है. आज, द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से बंद कमरों के पीछे की जो हकीकत सामने आई है, वो चौंकाने वाली है. खुलासा हुआ है कि चुनाव आयोग के फैसलों में दो चुनाव आयुक्तों विवेक जोशी और एस.एस. संधू की सहमति नहीं थी. वो तो विरोध कर रहे थे, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की पावर के आगे उनकी नहीं चली.
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राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी उठा चुके हैं सवाल
चुनाव आयोग से राहुल गांधी की लड़ाई तो मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए राजीव कुमार से शुरू हुई थी, लेकिन तब चुनाव आयुक्तों पर कोई उंगली नहीं उठाता था. यहां तक कि तब से चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी कोई सवाल नहीं उठते थे. पहली बार नाम लेकर प्रियंका गांधी ने विवेक जोशी और एस.एस. संधू पर निशाना साधा था. आगे दिल्ली के रामलीला मैदान की रैली में भी गरजी कि ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी - इन तीन चुनाव आयुक्तों के नाम नहीं भूलेगा. मोदी सरकार इन्हें बचाने की कितनी भी कोशिश कर ले, लेकिन एक दिन इन्हें देश को जवाब देना होगा. राहुल गांधी ने भी ज्ञानेश कुमार, डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी के नाम लेकर चुनाव आयोग पर बीजेपी सरकार के लिए काम करने के आरोप लगाए थे.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में क्या खुलासा हुआ?
अब द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट ने कुछ और ही कहानी पेश की है. द इंडियन एक्सप्रेस की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट ये कह रही है कि बंद कमरों के पीछे की कहानी कुछ और ही थी. जिस फैसले को पूरे चुनाव आयोग का साझा फैसला मानकर विपक्ष हमलावर था, दरअसल उस पर आयोग के अंदर ही जबरदस्त आंतरिक बगावत चल रही थी.
रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और एस.एस. संधू ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों के खिलाफ एक या दो बार नहीं बल्कि पूरे 14 बार लिखित रूप से कड़ा ऑब्जेक्शन दर्ज कराया था. एक ही दिन में चार-चार बार इन दोनों आयुक्तों ने ऑन-रिकॉर्ड विरोध दर्ज किया. आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी अभी सामने नहीं आई.
ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर लगातार सवाल
इस सनसनीखेज खुलासे के मुताबिक चुनाव आयोग में सब कुछ अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ही कर रहे थे और कर रहे हैं. जबकि बाकी दोनों इलेक्शन कमिश्नर एस.एस. संधू और विवेक जोशी लगातार उनके फैसलों और आदेशों पर सवाल खड़े कर रहे थे, जिन फैसलों के बारे में उन्हें कई बार अंधेरे में भी रखा गया था. विवादित स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया और नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन वाले फॉर्म-6 में किए गए बदलावों को इन दोनों चुनाव आयुक्तों ने बाकायदा 'गैर-कानूनी और अनधिकृत' तक करार दिया था.
विपक्ष के पुराने आरोपों को मिला नया मुद्दा
इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अब विपक्ष के उन पुराने बयानों और धमकियों का पूरा सीन ही बदल गया है. साल 2025 में जब कांग्रेस ने 'वोट चोर गद्दी छोड़' के नारे लगाए थे, तब निशाने पर पूरा चुनाव आयोग था, लेकिन अब कहानी ये कि आयोग के भीतर ही दो आयुक्त पूरी व्यवस्था और नियमों के सेंट्रलाइजेशन के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे. यहां तक कह रहे थे कि लिए जा रहे फैसले खुद चुनाव आयोग के बुनियादी नियमों और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) के खिलाफ हैं.
SIR नीति को लेकर सबसे बड़ा विवाद
इंडियन एक्सप्रेस के खुलासे में सबसे बड़ा मोड़ उस स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) नीति को लेकर है, जिस पर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा. द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूचियों में सुधार और नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के लिए एक नई केंद्रीकृत व्यवस्था लागू करने की कोशिश की. इसके तहत नए वोटरों को जोड़ने वाले 'फॉर्म-6' की पूरी प्रक्रिया और वेरिफिकेशन के नियमों को बिना किसी व्यापक चर्चा के बदल दिया गया. चुनाव आयुक्तों - विवेक जोशी और एस.एस. संधू - का सबसे बड़ा विरोध इसी बात पर था कि ये बदलाव चुनाव आयोग के स्थापित नियमों और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) के खिलाफ जाकर किए गए थे.
वोटर डेटाबेस को लेकर भी उठाए सवाल
अंदरूनी दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर जो 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं. दोनों आयुक्तों का मानना था कि राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों और जिला निर्वाचन अधिकारियों की शक्तियों को छीनकर दिल्ली में बैठे मुख्य चुनाव आयुक्त के दफ्तर में केंद्रित किया जा रहा है. संधू और जोशी ने बाकायदा लिखित नोट में लिखा कि फॉर्म-6 या मतदाता डेटाबेस के नियमों में कोई भी बड़ा बदलाव करने से पहले कानून मंत्रालय से कानूनी राय लेना और उसे संसद के पटल पर रखना जरूरी है, जिसे बाईपास किया जा रहा था. ये भी चेतावनी दी थी कि बिना सोचे-समझे किए जा रहे तकनीकी और नीतिगत बदलावों से वोटर्स के संवेदनशील डेटा की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है.
चुनाव आयोग का क्या है पक्ष?
चुनाव आयोग ने कहा है कि आयोग के अंदर सवाल, सुझाव और अलग-अलग राय देना सामान्य प्रक्रिया है. इन्हें अंतिम फैसले से असहमति नहीं माना जाना चाहिए. आयोग के मुताबिक, पिछले एक साल में लिए गए सभी अंतिम फैसले पूरे आयोग की सर्वसम्मति से हुए हैं. आयोग ने यह भी कहा कि SIR और वोटर डेटा से जुड़े सिस्टम में कानून और सुरक्षा के तय नियमों का पालन किया गया है.
कौन हैं विवेक जोशी?
चुनाव आयोग में क्रांति करने वाले चुनाव आयुक्त डॉ. विवेक जोशी हरियाणा कैडर के 1989 बैच के सीनियर आईएएस हैं, जिन्होंने 19 फरवरी 2025 को चुनाव आयुक्त का पद संभाला. उत्तर प्रदेश के रहने वाले डॉ. जोशी ने आईएएस बनने से पहले आईआईटी रुड़की से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की. स्विट्जरलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ जिनेवा से इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स में पीएचडी (PhD) की डिग्री हासिल की. चुनाव आयोग पहुंचने से ठीक पहले हरियाणा के मुख्य सचिव हुआ करते थे. 35 साल के आईएएस करियर में केंद्र सरकार में कार्मिक सचिव, वित्तीय सेवा विभाग (DFS) के सचिव और देश के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त जैसे हाई-प्रोफाइल पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके थे. विवेक जोशी संधू से सीनियर हैं और 2029 में देश के अगले मुख्य चुनाव आयुक्त बनने की रेस में भी सबसे आगे हैं.
कौन हैं एस.एस. संधू?
डॉ. सुखबीर सिंह संधू यानी एस.एस. संधू उत्तराखंड कैडर के 1988 बैच रिटायर्ड आईएएस हैं. 15 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त नियुक्त हुए थे. पंजाब के रहने वाले डॉ. संधू ने आईएएस बनने से पहले अमृतसर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया. इतिहास में मास्टर्स (MA) किया और लॉ की भी डिग्री ली. चुनाव आयोग में आने से पहले उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहे. करीब 36 साल के आईएएस करियर में नेशनल हाईवेज अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के चेयरमैन रहे. उन्हीं के समय फास्टैग सिस्टम लागू हुआ. शिक्षा मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव और लोकपाल सचिव भी रहे. जनगणना 2001 में बेहतरीन कार्य और लुधियाना नगर निगम के कमिश्नर रहते हुए शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें राष्ट्रपति पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है.
तीन सदस्यीय आयोग में प्रशासनिक जंग?
यह सिर्फ एक सामान्य असहमति नहीं थी, बल्कि फाइलों पर चली एक बड़ी प्रशासनिक जंग थी. 3 सदस्यीय आयोग में बहुमत के विरोध में होने के बावजूद, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इन दोनों की आपत्तियों और लिखित चेतावनियों को दरकिनार करते हुए फैसले लेते रहे. उन्हीं फैसलों को राहुल गांधी, विपक्ष बीजेपी को फायदा पहुंचाने वाला कहते रहे. इस सनसनीखेज खुलासे के बाद अब कांग्रेस और पूरे विपक्ष को एक बहुत बड़ा हथियार मिल गया है.
14 लिखित आपत्तियों के बाद बढ़ा विवाद
लब्बोलुआब यह है कि अब तक जिसे चुनाव आयोग की त्रिमूर्ति की मिलीभगत समझा जा रहा था, वो दरअसल वन-मैन शो की मनमानी निकली! विवेक जोशी और एस.एस. संधू की 14 लिखित आपत्तियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया है. राहुल और प्रियंका गांधी के आरोपों को अब सरकारी और ऑन-रिकॉर्ड आधार मिल चुका है. आगे जब चुनाव आयोग पर सवाल उठेंगे तो 14 लिखित आपत्तियों का भी जिक्र आ सकता है.
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