Shesh Bharat: क्या मोदी सरकार में अब काम के नहीं रहे जॉर्ज कुरियन? क्या केरल में बीजेपी की चुनावी नाकामी का ठीकरा देश के इकलौते ईसाई मंत्री पर फोड़ दिया गया है? दिल्ली के गलियारों से लेकर तिरुवनंतपुरम तक इस वक्त सबसे बड़ी राजनीतिक हलचल है. केंद्रीय अल्पसंख्यक और मत्स्य पालन राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इसे स्वीकार भी कर लिया है. 21 जून को उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हुआ, लेकिन बीजेपी ने उन्हें दोबारा राज्यसभा के जरिए संसद भेजना मंजूर नहीं किया. उनका मंत्री बने रहना असंभव हो चुका था. हालांकि वह चाहते या पार्टी-सरकार चाहती तो और 6 महीने तक मंत्री बनाए रख सकती थी, लेकिन मोदी सरकार में अकेले ईसाई मंत्री जॉर्ज कुरियन की छुट्टी हो गई.
ADVERTISEMENT
46 साल की वफादारी के बाद साइडलाइन
सवाल उठना लाजमी है कि आखिर 46 साल तक भाजपा की दरी बिछाने वाले और केरल में ईसाइयों को जोड़ने वाले इस बड़े नेता को इस तरह साइडलाइन क्यों किया गया? सवाल यह कि राज्यसभा वाली जो स्थितियां जॉर्ज कुरियन की थीं, वही रवनीत बिट्टू के लिए भी हैं लेकिन वह आज भी सरकार में बने हैं. कब तक और कैसे बनेंगे, यह अभी साफ नहीं है.
मध्य प्रदेश के रास्ते ऐसे मिला था मंत्री पद
केरल में बीजेपी लंबे समय से जमने की कोशिश कर रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सुरेश गोपी ने तो अपने स्टारडम के दम पर लोकसभा सीट निकाल ली, तो उन्हें इनाम में मंत्री पद मिला. तब केरल के विधानसभा चुनाव देखते हुए सरकार में केरल का कोटा बढ़ाया गया. ग्रास रूट वर्कर जॉर्ज कुरियन को संगठन के प्रति ईमानदारी और ईसाई होने के नाते मंत्री बनाया गया. और इसके लिए लंबा तिकड़मी रास्ता निकाला. ज्योतिरादित्य सिंधिया लोकसभा के सांसद बने तो उनकी जगह पर अगस्त 2024 में आधे टर्म के लिए मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद बनाया गया और फिर सरकार में मंत्री पद मिला. कुरियन के लिए बीजेपी का मैसेज था कि केरल को भी सरकार अपना मानती है, भले ही चुनावी नंबर गेम में पार्टी कहीं न टिकती हो.
केरल चुनाव की नाकामी का भुगतना पड़ा खामियाजा
केरल विधानसभा चुनावों में बीजेपी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. पार्टी 140 में से सिर्फ 3 सीटों पर सिमट कर रह गई. दिल्ली का मानना था कि कुरियन के चेहरे को आगे रखकर केरल के मजबूत सीरो-मालाबार कैथोलिक चर्च और बड़े ईसाई वोट बैंक को पार्टी के पाले में लाया जा सकेगा, लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया कि कुरियन अपना यह टास्क पूरा नहीं कर पाए. खुद कुरियन भी जब केरल की कांजिरापल्ली विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे, तो वह कोई खास चुनावी करिश्मा नहीं दिखा पाए. इसी नाकामी का खामियाजा अब उन्हें भुगतना पड़ा है, जिसके चलते उन्हें राज्यसभा के लिए दोबारा टिकट नहीं दिया गया और उनकी मंत्री पद से छुट्टी हो गई.
विपक्षी दलों ने घेरा, केरल की राजनीति में आया भूचाल
कुरियन बीजेपी नेता हैं लेकिन उनके साथ जो हुआ उसने केरल की राजनीति में सहानुभूति पैदा की है. इस्तीफे के बाद केरल की राजनीति में भूचाल आ गया है और तीखी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं. केरल में कांग्रेस और लेफ्ट ने हल्ला मचाना शुरू किया कि बीजेपी ने इस्तेमाल करके फेंक दिया. जब तक बीजेपी को केरल के ईसाई वोट चाहिए थे, तब तक कुरियन को चमकाया गया और जैसे ही चुनाव में नाकामी मिली, उन्हें 'बेकार' समझकर बाहर कर दिया गया.
बीजेपी का सियासी गणित
राजनीति में मैसेजिंग बड़ी चीज होती है. जब जॉर्ज कुरियन को पार्टी ने इतना भाव दिया तो मैसेजिंग थी कि केरल और ईसाई भी बीजेपी के लिए अहम हैं. अब क्या चीजें बदल गई हैं? केरल की राजनीति में ईसाई निर्णायक 'एक्स-फैक्टर' हैं, जिसके बिना किसी के लिए जीतना असंभव जैसा है. करीब 18 परसेंट आबादी वाले ईसाई पारंपरिक रूप से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) का सबसे मजबूत वोट बैंक रहे हैं. बीजेपी जब हिंदू-हिंदू करते केरल में घुसी तो उसने ईसाई आउटरीच किया. ईसाइयों को कांग्रेस से तोड़कर अपनी ओर लाने की मंशा थी. जॉर्ज कुरियन को केंद्र में मंत्री बनाना इसी 'मिशन ईसाई आउटरीच' का सबसे बड़ा हिस्सा था.
विधानसभा चुनावों में जब ईसाई बहुल इलाकों से भी बीजेपी को कुछ खास फायदा नहीं मिला, तो ईसाई समुदाय को बीजेपी के आक्रामक हिंदुत्व कार्ड के मुकाबले कांग्रेस के लिए निष्ठा बदलने में रिस्क लगा होगा. चुनाव बाद पार्टी का ईसाई आउटरीच वाला शायद भरोसा डगमगाया, जिसकी कीमत जॉर्ज कुरियन को चुकानी पड़ी.
मोदी-शाह के पसंदीदा ट्रांसलेटर और कुरियन की बहुमुखी प्रतिभा
वकील रहे 65 साल के जॉर्ज कुरियन बीजेपी के घिसे हुए नेता हैं. तब से केरल में काम कर रहे हैं जब पार्टी कहीं नहीं थी. 1980 में बीजेपी के गठन के समय से काम कर रहे हैं. पार्टी ने भी उनकी पूछ बनाए रखी. केरल बीजेपी के उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया. कुरियन की सबसे बड़ी काबिलियत यह भी है कि पीएम मोदी और अमित शाह जब भी केरल के दौरे पर होते थे, तो उनके भाषणों का मलयालम में अनुवाद जॉर्ज कुरियन ही करते थे. केरल का होने के बावजूद जॉर्ज कुरियन की हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर बहुत शानदार पकड़ है. उन्होंने कानून (Law) की पढ़ाई के साथ-साथ हिंदी में मास्टर डिग्री (M.A. इन हिंदी) भी हासिल की थी, जिसके कारण पार्टी के लिए वह मल्टी-यूटिलिटी जैसे रहे.
दिल्ली के 'मन की बात' को समझने में चूके जॉर्ज कुरियन
2024 में जब उन्हें अचानक बिना सांसद रहे मंत्री बनाया गया, तो लगा था कि उनका राजनीतिक ग्राफ सातवें आसमान पर है, लेकिन ठीक दो साल बाद उनका यह राजनीतिक सफर इस मोड़ पर आकर थम जाएगा, इसकी उम्मीद खुद कुरियन को भी नहीं रही होगी. जो जॉर्ज कुरियन कभी केरल की जनता को मोदी-शाह के मन की बात मलयालम में समझाते थे, आज वह खुद दिल्ली के 'मन की बात' को समझ नहीं पाए और उन्हें मंत्री पद गंवाना पड़ा.
संगठन में वापसी की अटकलें
भले ही कुरियन ने अपने विदाई संदेश में प्रधानमंत्री मोदी का शुक्रिया अदा करते हुए एक भावुक पोस्ट लिखी हो और इस मौके को अपने 'सपनों से परे' बताया हो, लेकिन हकीकत की परतें कुछ और ही बयां कर रही हैं. अब चर्चा यह है कि उनको फिर से संगठन में एक्टिव किया जा सकता है. कुरियन का इस्तीफा हुआ है, लेकिन बीजेपी कतई नहीं भूली और न ही भूलने वाली है कि उसने अगले चुनावों तक खुद को जीतने लायक बनाना है. यह काम जॉर्ज कुरियन जैसे लोग ही कर सकते हैं.
केरल में शून्य से शिखर तक पहुंचने की कोशिश में बीजेपी
केरल में बीजेपी का संघर्ष खत्म नहीं हो रहा. RSS की देश में सबसे अधिक शाखाएं केरल में होने के बावजूद, बीजेपी आज भी विकल्प नहीं, वोट कटवा या तीसरे नंबर की पार्टी है. हालांकि बीजेपी की मेहनत बेकार नहीं जा रही है. अदृश्य पार्टी से मुख्य पार्टी बनने के लंबे सफर में कुछ तो सिल्वर लाइन दिख रही है.
भविष्य के चुनावों पर टिकी नजरें
एक दशक पहले 5-6 प्रतिशत वोट शेयर पर सिमटने वाली बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनावों में करीब 17 परसेंट वोट हासिल कर लिए और पहली बार एक लोकसभा सीट त्रिशूर भी जीती. जिस विधानसभा चुनाव में केवल तीन सीटें मिलीं, उसमें भी बीजेपी को 11 परसेंट से ज्यादा वोट मिले. निकाय चुनाव में उसने राजधानी तिरुवनंतपुरम में जीत हासिल की. बड़े चुनाव अब 2029 से पहले होने नहीं हैं. पार्टी के पास 3 साल का समय है अपनी मेहनत को वोट बैंक और सीटों में बदलने का. यह किसी से छुपा नहीं कि ओडिशा और बंगाल में बीजेपी शून्य से शुरू होकर सत्ता तक पहुंचने का करिश्मा दिखा चुकी है.
पंजाब और केरल का अलग पैमाना
जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे ने दिल्ली से पंजाब तक एक नए सियासी सस्पेंस को जन्म दे दिया है. अगर राज्यसभा कार्यकाल खत्म होने पर कुरियन की विदाई हो गई, तो रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का इस्तीफा नहीं हुआ. कुरियन का इस्तीफा तुरंत स्वीकार कर लिया गया, जबकि बिट्टू अभी भी मंत्री पद पर बने हुए हैं. बिना संसद सदस्य रहे 21 दिसंबर तक दोनों मंत्री रह सकते थे, लेकिन कुरियन गए तो बिट्टू का क्या होगा? राजस्थान से राज्यसभा सांसद रहे रवनीत बिट्टू का कार्यकाल भी जॉर्ज कुरियन के साथ ही 21 जून को खत्म हुआ है और बीजेपी ने उन्हें भी दोबारा उच्च सदन नहीं भेजा. जबकि बीजेपी को कुछ महीनों में पंजाब में चुनाव लड़ना है. क्या पंजाब के लिए बिट्टू के वास्ते कोई रास्ता निकाला जा रहा है, जो कुरियन के लिए निकालने में कोई फायदा नहीं था?
ADVERTISEMENT


