असम में परिसीमन के बाद क्या बदला? जिसका नेगिटव असर बताकर विपक्ष ने लोकसभा में रोक दिया डिलिमिटेशन बिल

Assam delimitation: असम में 2023 में हुए सीटों के परिसीमन (डिलिमिटेशन) को लेकर सियासी विवाद गहरा गया है. विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी ने चुनावी फायदे के लिए सीटों की सीमाएं बदली हैं, जिससे कई इलाकों में अल्पसंख्यक वोटरों का प्रभाव कम हो गया है. वहीं, बीजेपी इसे मूल निवासियों के हित में बता रही है.

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ललित यादव

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Assam delimitation: संसद में पिछले 2 दिनों से महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के साथ-साथ परिसीमन को लेकर भी जोरदार टकराव देखने को मिला. इस बीच विपक्ष ने असम और जम्मू-कश्मीर के परिसीमन का मुद्दा भी उठाया. कांग्रेस नेता राहुल गांधी और गौरव गोगोई ने इसे 'गेरीमैंडरिंग' (चुनावी फायदे के लिए सीमाओं में बदलाव) बताया.

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विपक्ष का कहना है कि असम में जिस तरह से सीटों को दोबारा बांटा गया है, वह पूरे देश के लिए एक चेतावनी की तरह है. आखिर असम में 2023 में क्या हुआ था जिसकी चर्चा करके विपक्ष ने परिसीमन बिल पास नहीं होने दिया. 

1976 के बाद पहली बार बड़ा बदलाव

करीब पांच दशक बाद असम में सीटों की सीमाएं नए तरीके से तय की गई. यह प्रक्रिया लंबे समय तक टलती रही. कई राजनीतिक दलों ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिज़न्स (NRC) के अपडेट का हवाला देकर इसका विरोध किया था. इसके बावजूद 2001 की जनगणना के आधार पर सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया गया.

हालांकि, लोकसभा की 14 और विधानसभा की 126 सीटों की संख्या में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई, लेकिन उनके भौगोलिक दायरे में बड़े बदलाव किए गए. विपक्ष का मुख्य आरोप है कि बीजेपी ने उन इलाकों को आपस में बांट दिया है जहां उसे वोट कम मिलते थे.

गेरीमैंडरिंग के आरोप क्यों उठे?

विपक्ष ने इस डिलिमिटेशन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. राहुल गांधी और असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गौगोई ने आरोप लगाया कि सीटों की सीमाएं इस तरह बदली गईं जिससे चुनावी लाभ लिया जा सके. उन्होंने दावा किया कि भाजपा ने असम और जम्मू-कश्मीर में डिलिमिटेशन प्रक्रिया को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया.

राजनीतिक विश्लेषक और एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव ने भी कुछ नई सीटों की जानकारी शेयर कर इसे 'गेरीमैंडरिंग' का उदाहरण बताया.

काजीरंगा और नागांव सीट पर फोकस

इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, डिलिमिटेशन के बाद सबसे ज्यादा चर्चा काजीरंगा लोकसभा सीट को लेकर हुई. पहले यह गौरव गोगोई की 'कलियाबोर' सीट हुआ करती थी. परिसीमन के बाद इस सीट के कई अल्पसंख्यक बहुल हिस्सों को 'नागांव' सीट में जोड़ दिया गया है.

कांग्रेस का मानना है कि इससे काजीरंगा सीट उनके लिए जीतना मुश्किल हो गया है. इसी तरह का पैटर्न बारपेटा और धुबरी जैसी अहम सीटों पर भी देखने को मिला है.

लोकसभा चुनाव में दिखा असर

2024 के लोकसभा चुनाव में भी इन बदलावों का असर साफ नजर आया. काजीरंगा सीट से भाजपा उम्मीदवार की जीत हुई, जबकि नगांव सीट पर अलग राजनीतिक समीकरण बने. जोरहाट सीट से गौरव गोगोई ने जीत दर्ज की. 

क्या बदली अल्पसंख्यक वोट की भूमिका?

विपक्ष का मुख्य आरोप यही है कि डिलिमिटेशन के बाद उन सीटों की संख्या कम हो गई, जहां अल्पसंख्यक मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते थे. आंकड़ों के मुताबिक, पहले जहां करीब 35 सीटों पर अल्पसंख्यक मतदाता हार-जीत तय करते थे, अब यह संख्या घटकर 23 के आसपास रह गई है.

हैलाकांडी का उदाहरण

हैलाकांडी जिले को इसका बड़ा उदाहरण माना जा रहा है. 2021 में यहां तीन सीटों पर AIUDF को जीत मिली थी. लेकिन डिलिमिटेशन के बाद सीटों की संख्या घट गई और वोटों का संतुलन बदल गया. अब मुस्लिम वोट एक सीट पर केंद्रित हो गए हैं, जबकि अन्य सीटों पर अलग सामाजिक समीकरण बन गए हैं.

हालांकि, राज्य की भाजपा सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही है. सरकार का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी और इससे असम के मूल निवासियों के हितों की रक्षा हुई है.

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