South India Delimitaion Controversy: उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक देश का राजनीतिक नक्शा ऐसे वार रूम में बदल गया है, जिसमें पार्टी पॉलिटिक्स वाले स्टैंड से कहीं ज्यादा ये अहम हो गया है कि अपने-अपने राज्यों के लिए नेता क्या स्टैंड लेते हैं. इस वार रूम के दो बड़े चेहरे हैं, आंध्र के सीएम चंद्रबाबू नायडू और ओडिशा के पूर्व सीएम नवीन पटनायक. ज्यादा पुरानी बात नहीं है कि जब ये दोनों नेता बीजेपी और सरकार के पक्ष में हर मुद्दे पर खड़े होते रहे. कहीं पॉलिटिकल अलायंस के कारण, कहीं पर्सनल बॉन्डिंग के कारण.
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2024 के चुनावों के बाद चीजें बदल गई हैं. चंद्रबाबू नायडू तो आज भी सरकार के साथ खड़े हैं लेकिन नवीन पटनायक ने झन्नाटेदार स्टैंड लेकर बीजेपी को परेशान किया है. मामला केवल मीडिया में दिए इंटरव्यू और मीडिया बाइट तक सीमित नहीं है. संसद में जब महिला आरक्षण, परिसीमन बिल पर वोटिंग को होगी तो हर पार्टी को संसद में बताना होगा कि वो सरकार के साथ हैं या खिलाफ.
लोकसभा सीटें बढ़ाने के परिसीमन विवाद में लड़ाई छिड़ी है उत्तर वर्सेज दक्षिण की. सारी लड़ाई और चिंता इस बात की है कि जितनी संख्या में यूपी, बिहार की सीटें बढ़ेंगी, उतनी दक्षिण के राज्यों की नहीं बढ़ने जा रही है. दक्षिण में बीजेपी का स्टेक कम तो इंटरेस्ट भी कम है. बाकी तीनों दिशाओं में बीजेपी का जलवा भी है, जमीन भी है.
दक्षिण के राज्यों को एकजुट करने की जिम्मेदारी कांग्रेस के तेलंगाना सीएम रेवंत रेड्डी ने उठाई थी. सभी सीएम से एकजुट होकर आवाज उठाने की मांग की. चंद्रबाबू नायडू को भी चिट्ठी लिखकर साउथ के यूनियन फ्रंट में शामिल होने और बीजेपी के डिलिमिटेशन प्लान को पंचर करने को कहा था. रेवंत को चंद्रबाबू नायडू ने सीधा जवाब नहीं दिया. उन्होंने इकोनॉमिक टाइम्स को इंटरव्यू दिया.
चंद्रबाबू नायडू ने सरकार के परिसीमन फॉर्मूले को 'वैज्ञानिक' करार देते हुए उसे 100 परसेंट समर्थन दे दिया है. सरकार के लिए ये बड़ी राहत है, क्योंकि उनके टीडीपी सांसदों के समर्थन से सरकार चल रही है. टीडीपी की नजर में हो रहा फैसला देशहित में है इसलिए पार्टी पूरा समर्थन करती है. चंद्रबाबू नायडू ने सरकार की कही इस बात पर भरोसा किया कि लोकसभा औऱ विधानसभाओं की सीटें बढ़ाई जाएंगी तो किसी राज्य का हिस्सा कम नहीं होगा. इसलिए फैसला संतुलित और सभी राज्यों के हित में है. चंद्रबाबू ने राय दी कि लोकसभा सीटों की संख्या को जनगणना से अलग कर देना चाहिए ताकि राज्यों की सीटों में इजाफा हो सके.
शायद सबका मूड-मिजाज समझकर और विवाद से बचने के लिए सरकार ने ये लाइन लेकर समझदारी दिखाई कि किसी भी जनगणना या आबादी के आधार पर सीटें बढ़ाने का फैसला नहीं कर रही है. सरकार 50% का फॉर्मूला इसलिए लाई कि ये शिकायत दूर हो जाएगी जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों जैसे दक्षिण भारत और ओडिशा को राजनीतिक नुकसान न हो. फिर भी नवीन बाबू जैसे नेता मान रहे हैं कि सीटें बढ़ेंगी, लेकिन राज्यों की हिस्सा कम हो जाएगा, जिससे दिल्ली में उनकी 'वजन' या आवाज कमजोर होगी.
चंद्रबाबू, दक्षिण के उन सीएम में से हैं कि जिन्होंने सबसे पहले आबादी कम होने पर सीटें कम होने के किसी फॉर्मूले के खिलाफ विरोध किया था. कम होती आबादी के कारण ही आंध्र के लोगों से ज्यादा बच्चे पैदा करने की पॉलिसी बनाई. सरकार फ्लैसिबल हुई तो चंद्रबाबू भी कोई दिक्कत पैदा नहीं करना चाहते. उनकी पार्टी के सांसदों ने भी संसद में भाषण देते वाले सरकार को सुना दिया कि हमारी ओर से कोई दिक्कत नहीं होगी.
अमरावती का एलान तो सरकार के लिए राहत की बात है लेकिन भुवनेश्वर में माहौल बिल्कुल उलट है. प्रो बीजेपी रहे नवीन पटनायक अब एकदम अग्रेसिव हो चुके हैं. नवीन पटनायक ने सिर्फ विरोध नहीं किया, बल्कि इसे ओडिशा के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात करार दिया है. पटनायक ने दावा किया है कि रिपोर्टों के अनुसार, ओडिशा इस पूरे खेल में देश का चौथा सबसे बड़ा लूजर होगा.
नवीन पटनायक ने कैलकुलेट किया कि अगर ये सरकार का परिसीमन फॉर्मूला लागू हुआ, तो लोकसभा में ओडिशा की हिस्सेदारी 3.9% से घटकर हो जाएगी. भले ही सीटें 21 से बढ़कर 29 हो जाएं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर ओडिशा की आवाज 15% तक कमजोर हो जाएगी. उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन माझी को लिखे पत्र में साफ कहा कि ओडिशा के राजनीतिक अधिकारों का 0.001% हिस्सा भी छीना गया, तो भावी पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी.
केंद्र सरकार के नए प्रस्तावित परिसीमन विधेयक 2026 के अनुसार, यदि सभी राज्यों की लोकसभा सीटें 50% बढ़ाई जाती है तो दक्षिण के पांच राज्यों तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल और तेलंगाना की सीटों की संख्या 129 से बढ़कर लगभग 193-194 हो सकती है.
तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 होने का अनुमान है, जबकि कर्नाटक की सीटों की संख्या 28 से उछलकर 42 तक पहुंच सकती है. आंध्र प्रदेश के पास 25 सीटें हैं जो बढ़कर 38 हो जाएंगी. केरल की सीटें 20 से बढ़कर 30 और तेलंगाना की 17 सीटें बढ़कर 26 हो सकती हैं. सीटों की ये संख्या बढ़ रही है, लेकिन असली विवाद इस बात पर है कि उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में दक्षिण का Relative Share कम हो जाएगा, जिसे लेकर नवीन पटनायक और दक्षिण के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं.
दक्षिण के राज्यों की नजरें इस बात पर गड़ी हैं कि उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120 और बिहार की 40 से बढ़कर 60 होने का अनुमान है. अगर उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटें वर्तमान 80 से बढ़कर 120 हो जाती हैं, तो 33% महिला आरक्षण के बाद राज्य से 40 महिला सांसद चुनकर दिल्ली पहुंचेंगी. ये नंबर पूरे दक्षिण भारत की महिला सांसदों की कुल संख्या से भी ज्यादा होगी. बिहार में सीटों की संख्या 40 से बढ़कर 60 होने का अनुमान है. इस स्थिति में, महिला आरक्षण लागू होने पर बिहार के कोटे से 20 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. सिर्फ इन दो राज्यों यूपी और बिहार को मिला दिया जाए, तो नई संसद में 60 महिला सांसद केवल दो राज्यों से होंगी. ये स्थिति पूरे देश की राजनीति में बड़ा 'शिफ्ट' पैदा करेगा, क्योंकि उत्तर भारत के ये दो राज्य महिला प्रतिनिधित्व के मामले में भी बहुत ताकतवर होकर उभरेंगे.
एक तरफ नायडू हैं जो केंद्र के साथ तालमेल बिठाकर 'स्मार्ट' राजनीति खेल रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नवीन पटनायक हैं जो क्षेत्रीय गौरव और भविष्य की पीढ़ियों के हक की दुहाई दे रहे हैं. बड़ा सवाल ये कि क्या दक्षिण का साथ देने वाले नायडू का सरकार फर्स्ट का दांव सही पड़ेगा, या पटनायक की 'ओडिशा फर्स्ट की हुंकार दिल्ली के गलियारों को हिला देगी?
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