हिंदी राष्ट्रीय भाषा है या राजभाषा? इन दोनों बातों के बीच में कोई फर्क है या नहीं? यहां समझिए

देवराज गौर

20 Dec 2023 (अपडेटेड: Dec 21 2023 9:19 AM)

19 दिसंबर को नई दिल्ली के अशोका होटल में इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (INDIA) गठबंधन की चौथी बैठक हुई. इसमें 28 विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए.

Nitish Kumar
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NewsTak: 19 दिसंबर को नई दिल्ली के अशोका होटल में इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (INDIA) गठबंधन की चौथी बैठक हुई. इसमें 28 विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए. बैठक के दौरान कुछ ऐसा हुआ कि अचानक से हिंदी भाषा को लेकर चर्चा शुरू हो गई. असल में हुआ ये कि आगामी लोकसभा चुनाव को मद्देनजर रख इंडिया गठबंधन की बैठक में सीट शेयरिंग, प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदार और इंडिया गठबंधन के संयोजक को लेकर चर्चा हो रही थी.

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इसी बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बोलने की बारी आई. उन्होंने अपनी बात हिंदी में रखनी शुरू की. इस पर तमिलनाडु के नेता और डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के कोषाध्यक्ष टीआर बालू ने उनके भाषण का अंग्रेजी अनुवाद मांग लिया. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन और टीआर बालू ने आरजेडी सांसद मनोज झा से नीतीश कुमार के भाषण का अंग्रेजी अनुवाद करने के लिए कहा.

हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा, हमें यह आनी चाहिए- नीतीश

मनोज झा ने नीतीश के भाषण का अनुवाद करने के लिए नीतीश की अनुमति मांगी. इस पर बिहार के मुख्यमंत्री भड़क गए. उन्होंने कहा कि हम हिंदुस्तान में रहते हैं, हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है, हमें यह भाषा आनी चाहिए. नीतीश कुमार ने मनोज झा को अनुवाद करने से मना कर दिया. वहीं बात बिगड़ती देख सीपीआई नेता डी राजा ने कहा कि भाषा के मुद्दे को बीच में नहीं लाना चाहिए, और इस मुद्दे को यहीं खत्म करना चाहिए. ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि क्या हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है या राजभाषा? इन दोनों बातों में कोई फर्क है या नहीं?

राष्ट्रभाषा और राजभाषा में क्या है अंतर?

राष्ट्रीय या राष्ट्र भाषा वह होती है जो किसी समूचे देश की भाषा होती है. वह पूरे देश की संस्कृति और लोक का प्रतिनिधित्व करती है, और पूरे देश में बोली जाती है. राष्ट्रभाषा का संबंध साहित्य और संस्कृति से होता है. राष्ट्रीय भाषा स्वाभाविक होती है. हिंदी भारत की राष्ट्रीय भाषा नहीं है. यहां तक कि भारत की कोई राष्ट्रीय भाषा ही नहीं है. राजभाषा यानी वह भाषा जिसमें राजकाज का काम होता हो. इसे आधिकारिक भाषा भी कहते हैं. राजकीय भाषा सरकारी कामकाज में इस्तेमाल होती है. यह बहुत ही औपचारिक होती है. इसका संबंध कानून और संविधान से होता है. हिंदी भारत की राजभाषा है.

हिंदी की संवैधानिक स्थिति

हिंदी को संविधान में भाग 17 के अनुच्छेद 343 से 351 के बीच में रखा गया है. यह संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है. आठवीं अनुसूची में हिंदी समेत 22 आधिकारिक भाषाएं हैं. संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के अनुसार देवनागरी लिपि में हिंदी भारतीय संघ की आधिकारिक भाषा है.

दक्षिण और उत्तर में राष्ट्रभाषा को लेकर क्या है विवाद?

हिंदी भाषा को लेकर उत्तर और दक्षिण के बीच का विवाद बहुत पुराना है. आजादी के समय संविधान सभा में देश की राष्ट्रीय भाषा को लेकर चर्चा हुई. महात्मा गांधी समेत कई अन्य लोग हिंदी के समर्थन में थे. लेकिन दक्षिण के राज्यों की ओर से विरोध के स्वर उठ रहे थे. आखिरकार हिंदी को राष्ट्रभाषा न बनाकर राजभाषा बनाने पर सहमति बनी. हिंदी के साथ अंग्रेजी को 15 साल के लिए देश की राजभाषा बनाना स्वीकार किया गया. लेकिन, 1965 में भी हिंदी सर्व-स्वीकार्य नहीं हो सकी. सरकार ने 1963 में राजभाषा अधिनियम लागू किया. 1967 में उसे संशोधित कर द्विभाषीय पद्धित के तहत हिंदी और अंग्रेजी को राजभाषा के तौर पर अपना लिया गया.

देश के 29 राज्यों में से 20 राज्य गैर-हिंदी भाषी है. ऐसे में हिंदी भाषा को पूरे देश में थोपने का विरोध होता है. हिंदी भाषा को लेकर तर्क दिया जाता है कि देश की आधी से ज्यादा आबादी हिंदी बोलती है. सिर्फ 20 फीसदी गैर-हिंदी भाषी लोग ही हिंदी समझते हैं. ऐसे में इसे पूरे देश में नहीं थोपा जा सकता है. यानी देश की आधी आबादी से भी कम लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं. ऐसे में इसे पूरे देश पर कैसे थोपा जा सकता है.

यह अब भाषा का सवाल न रहकर राजनीति का मुद्दा हो गया है- संत समीर

हमने इस मुद्दे पर भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) के भाषा विभाग में कार्यरत संत समीर से बात की. वह कहते हैं कि आजादी के समय हिंदी को जब राष्ट्रभाषा बनाने का सवाल उठा तो इसके विरोध के स्वर भी उठने शुरू हो गए. इसलिए हिंदी के साथ साथ 15 साल के लिए अंग्रेजी का भी अस्थाई प्रावधान किया गया. वह बताते हैं कि इसका मुख्य उद्देश्य था कि लोग आने वाले 15 सालों में हिंदी में सहज हो जाएं. लेकिन, बाद में 15 सालों के बाद यह मुद्दा भाषा का न रहकर राजनीति का हो गया. संत समीर के मुताबिक हिंदी के विरोध के पीछे दक्षिण के राज्यों का अपनी भाषा के प्रति गौरव और लगाव था. और उनका मानना था कि हिंदी को उनके ऊपर थोपा जा रहा है.

वह कहते हैं कि हिंदी तब भी बहुत प्रचलित भाषा थी. दक्षिण के राज्यों को मालूम था कि उनकी किसी भी भाषा की सीमित स्वीकार्यता है. इसलिए उन्हें तो राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सकता. इसीलिए उन्होंने हिंदी के विरोधस्वरूप अंग्रेजी का समर्थन कर दिया. संत समीर इसे राजनैतिक कुशलता की कमी और दक्षिण के राज्यों को समावेशी तरीके से अपने साथ न ला पाने की कमी मानते हैं.