Shesh Bharat: 2029 का डर या बड़ी सियासी चाल? चंद्रबाबू नायडू ने अभी से क्यों शुरू कर दी चुनावी तैयारी

रूपक प्रियदर्शी

• 09:13 AM • 10 Sep 2026

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने 2029 विधानसभा चुनाव की तैयारी अभी से शुरू कर दी है. YSRCP का मजबूत वोट बैंक, सत्ता विरोधी लहर, पवन कल्याण की बढ़ती राजनीतिक महत्वाकांक्षा और BJP के साथ गठबंधन उनके सामने बड़ी चुनौतियां हैं. अमरावती और विशाखापट्टनम के विकास प्रोजेक्ट भी 2029 की जीत को अहम बनाते हैं.

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क्या केंद्र की मोदी सरकार का रिमोट कंट्रोल हाथ में रखने वाले आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू के भीतर कोई बड़ा राजनीतिक डर घर कर गया है? INDIA गठबंधन को आज भी लगता है कि अगर मोदी सरकार को दिल्ली की गद्दी से हिलाना है, तो उसकी चाबी सिर्फ और सिर्फ चंद्रबाबू नायडू के पास है. विपक्ष को उम्मीद थी कि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू कभी न कभी पासा पलटेंगे, लेकिन नायडू ने 2029 में सभी एनडीए विधायकों की प्रचंड वापसी की बात कहकर विपक्ष की इन उम्मीदों पर फिलहाल पानी फेर दिया है.

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सत्ता के दो साल में ही 2029 की चिंता

सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि सरकार बनने के महज़ दो साल के भीतर ही 2029 के रण का राग अलापना, कहीं न कहीं चंद्रबाबू नायडू के पैनिक और डर को भी जगजाहिर करता है. सवाल उठता है कि दिल्ली में किंगमेकर की भूमिका निभाने वाला यह सबसे अनुभवी राजनेता आखिर समय से पहले इतने दबाव में क्यों दिख रहा है?

समय से पहले चुनावी तैयारी?

क्या आंध्र प्रदेश की राजनीति में 2029 के रण की मुनादी अभी से हो चुकी है? क्या चंद्रबाबू नायडू का यह बयान कि '2029 में आज के सभी NDA विधायक जीतकर वापस आएं' महज़ एक ख़्वाहिश है या समय से बहुत पहले शुरू की गई कोई बड़ी चुनावी व्यूहरचना? आंध्र में ये सवाल तो है कि अभी तो 2024 में जीतकर आए थे. अभी 2026 चल रहा है. अचानक क्यों टीडीपी सुप्रीमो एकदम चुनावी मोड में आ गए हैं. इसे समय से पहले की चुनावी तैयारी माना जाना गलत नहीं होगा. नायडू की इस प्री-प्लानिंग का नतीजा तब दिखेगा जब अगले कुछ वक्त में आंध्र में लोकल बॉडीज यानी निगमों के चुनाव होंगे.

विधायकों को अभी से दिया कड़ा संदेश

चंद्रबाबू नायडू अच्छी तरह जानते हैं कि आज की तारीख में जनता का मूड बहुत तेजी से बदल रहा है. उनका सबसे बड़ा कन्सर्न ये है कि सत्ता के नशे में उनके विधायक कहीं जनता से दूर न हो जाएं. उन्होंने साफ़ संकेत दिया है कि अगले 3 साल का वक़्त विधायकों के लिए कोई आराम का वक़्त नहीं, बल्कि एक कठिन चुनावी अभियान है, जहां हर एक दिन का रिपोर्ट कार्ड तैयार होगा. जो काम करेगा वही दोबारा टिकट हासिल कर पाएगा.

आंध्र का पुराना सत्ता विरोधी रिकॉर्ड

चंद्रबाबू नायडू की इस चिंता के पीछे आंध्र प्रदेश का एक बेहद कड़ा और बेरहम राजनीतिक ट्रैक रिकॉर्ड है. आंध्र प्रदेश की जनता ने हमेशा सत्ता विरोधी लहर के चलते सरकारों को उखाड़ फेंका है. 2014 में राज्य के विभाजन के बाद जब चंद्रबाबू नायडू पहली बार सीएम बने, तो 2019 में जनता ने उन्हें बुरी तरह नकारते हुए वाईएस जगन मोहन रेड्डी (YSRCP) को बहुमत सौंप दिया था. लेकिन जनता का यह मिजाज जगन मोहन रेड्डी के लिए भी नहीं बदला.

2024 में YSRCP की करारी हार

2024 के विधानसभा चुनावों में, भारी कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद, जनता ने जगन सरकार के खिलाफ ऐसी एंटी-इंकंबेंसी दिखाई कि YSRCP महज़ 11 सीटों पर सिमट गई. आंध्र का यही इतिहास नायडू को सोने नहीं दे रहा है कि अगर आज जमीन पर काम नहीं हुआ या कमी रह गई तो 2029 में फिर सत्ता उखाड़ने का इतिहास दोहरा सकता है.

नायडू का लंबा राजनीतिक अनुभव

चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले और एक बेहद मंझे हुए नेता हैं. चौथी बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की कमान संभाल रहे हैं. उन्होंने पहली बार 1995 से 1999, दूसरी बार 1999 से 2004, तीसरी बार 2014 से 2019 और अब 2024 में चौथी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है. अपने इस लंबे राजनीतिक करियर में नायडू ने कई बार सत्ता का शिखर भी देखा है और करारी हार का स्वाद भी चखा है. यही वजह है कि 70 की उम्र पार कर चुके नायडू 2029 की लड़ाई को हल्के में नहीं ले रहे. गठबंधन के विधायकों को अभी से कस रहे हैं.

Jagan का मजबूत वोट बैंक सबसे बड़ी चिंता

नायडू की चिंता का सबसे बड़ा और ठोस कारण है - विपक्ष यानी वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) का आज भी मजबूत होना. भले ही चुनाव में जगन मोहन रेड्डी की सीटें घटकर 11 रह गईं, लेकिन राजनीति के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं. इस करारी हार के बावजूद, YSRCP का कोर वोट शेयर लगभग 39 से 40 प्रतिशत पर स्थिर रहा है. यह आंकड़ा किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए खतरे की घंटी है. टीडीपी, जनसेना और बीजेपी का यह गठबंधन (NDA) इसलिए जीता क्योंकि विपक्षी वोट बिखरे नहीं.

विधायकों को जनता के बीच जाने की हिदायत

चंद्रबाबू नायडू बखूबी समझते हैं कि जगन मोहन रेड्डी का जमीन पर एक बड़ा और वफादार वोट बैंक आज भी मौजूद है, जो सरकार की एक छोटी सी चूक पर पासा पलट सकता है. यही कारण है कि नायडू ने अपने विधायकों को सख्त हिदायत दी है कि वे पैसे के भरोसे न रहें, जनता के बीच जाएं, और विपक्ष के हर नैरेटिव को तथ्यों से ध्वस्त करें, ताकि 2029 में सत्ता की हैट्रिक का सपना सच हो सके.

पवन कल्याण की महत्वाकांक्षा भी बड़ी चुनौती

इस पूरी राजनीतिक बिसात के पीछे एक और बेहद गहरा और भविष्य का एंगल है—उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण और उनकी जनसेना पार्टी (JSP) की महा-महत्वाकांक्षा. 2024 के चुनावों में जनसेना का स्ट्राइक रेट 100% रहा था, जिसने उसे आंध्र प्रदेश की राजनीति में एक 'किंगमेकर' से 'किंग' की भूमिका में ला खड़ा किया है. राजनीतिक गलियारों में यह खबर बेहद पुख्ता है कि पवन कल्याण अब केवल टीडीपी (TDP) के जूनियर पार्टनर बनकर नहीं रहना चाहते, बल्कि वे साइलेंटली अपनी पार्टी का कैडर बेस मजबूत कर रहे हैं ताकि भविष्य में जनसेना आंध्र की नंबर वन राजनीतिक शक्ति बन सके.

नायडू ने दिया पवन कल्याण को राजनीतिक संकेत?

चंद्रबाबू नायडू इस बात को बखूबी भांप चुके हैं. उनका यह बयान कि 'सभी मौजूदा विधायक 2029 में दोबारा जीतें' दरअसल पवन कल्याण की इस छुपी हुई विस्तार योजना पर एक 'स्मार्ट चेकमेट' भी है. इसके जरिए नायडू ने साफ कर दिया है कि 2029 में भी सीटों का बंटवारा 2024 के फॉर्मूले पर ही रहेगा, जिससे जनसेना को ज्यादा सीटें मांगने या नए क्षेत्रों में विस्तार करने का मौका सीमित हो जाए और गठबंधन का शक्ति संतुलन टीडीपी के हाथ में ही रहे.

दिल्ली और BJP गठबंधन का समीकरण

चंद्रबाबू नायडू की इस जल्दबाजी के पीछे सिर्फ राज्य की राजनीति नहीं, बल्कि दिल्ली का समीकरण और बीजेपी के साथ गठबंधन (BJP Alliance) को अटूट बनाए रखने की मजबूरी भी है. केंद्र की राजनीति में चंद्रबाबू नायडू आज किंगमेकर की भूमिका में हैं, लेकिन वे अच्छी तरह जानते हैं कि बीजेपी के साथ यह दोस्ती तभी तक मजबूत है जब तक आंध्र प्रदेश में उनका अपना किला सुरक्षित है. नायडू का यह बयान कि 'सभी NDA विधायक 2029 में वापस आएं', सीधे तौर पर दिल्ली को भी एक संदेश है कि वे गठबंधन धर्म को लेकर पूरी तरह गंभीर हैं.

अमरावती और केंद्र से फंड की जरूरत

आंध्र प्रदेश को वित्तीय संकट से उबारने, केंद्र से 'विशेष पैकेज' और अमरावती के लिए भारी-भरकम फंड जुटाने के लिए नायडू को मोदी सरकार के समर्थन की सख्त जरूरत है. अगर राज्य में टीडीपी और बीजेपी के स्थानीय नेताओं के बीच किसी भी तरह का टकराव होता है, तो इसका सीधा असर केंद्र और राज्य के रिश्तों पर पड़ सकता है. इसलिए, 2029 का लक्ष्य अभी से सामने रखकर नायडू बीजेपी को यह भरोसा दिला रहे हैं कि भविष्य में भी यह गठबंधन पूरी मजबूती से साथ रहेगा और बीजेपी के विधायकों को जिताना भी उनकी उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है.

अमरावती और विशाखापट्टनम पर बड़ा दांव

नायडू की इस जल्दबाजी के पीछे एक और बहुत बड़ा आर्थिक और विकास संबंधी एंगल है, और वो है अमरावती और विशाखापट्टनम का भविष्य. 2024 में सत्ता में आने के बाद से नायडू सरकार ने अमरावती को फिर से राज्य की इकलौती और वर्ल्ड-क्लास राजधानी बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, जिसे जगन सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था. इसके साथ ही विशाखापट्टनम को एक बड़े फाइनेंशियल और आईटी हब के रूप में विकसित किया जा रहा है. नायडू का कन्सर्न यह है कि इन मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को पूरा होने और जमीन पर नतीजे दिखने में कम से कम 3 से 4 साल का वक्त लगेगा. अगर 2029 में सरकार बदल गई, तो उनके इस 'आधुनिक आंध्र' के ड्रीम प्रोजेक्ट पर फिर से पानी फिर सकता है. इसलिए वे चाहते हैं कि विकास की यह रफ्तार बिना किसी राजनीतिक रुकावट के चलती रहे और इसके लिए 2029 की जीत बेहद जरूरी है.