Kalyan Banerjee News: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया है. जिसे 25 सालों से ममता बनर्जी का 'हनुमान' और संकटमोचक माना जाता रहा, वो कल्याण बनर्जी अब पार्टी के भीतर ही अपनी जगह और निष्ठा को लेकर चर्चा में हैं. संसद में बीजेपी के '400 पार' के नारे पर चुटकी लेने वाले कल्याण बाबू अब खुद अपनी ही पार्टी में एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं. खबर है कि बंद कमरों की तकरार के बाद अब वे ममता दीदी से अभिषेक बनर्जी और अपनी निष्ठा के बीच चुनाव करने को कह रहे हैं.
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अभिषेक बनर्जी से तकरार और छीना गया केस
कल्याण बनर्जी के बागी होने के पीछे की सबसे बड़ी वजह अभिषेक बनर्जी के साथ उनका टकराव माना जा रहा है. ममता और अभिषेक दोनों के लिए लीगल ट्रबल शूटर रहे कल्याण बनर्जी हाल ही में अभिषेक बनर्जी का 'फेस सिग्नेचर' वाला केस लड़ रहे थे. लेकिन अचानक अभिषेक बनर्जी ने उनसे यह केस छीन लिया. इसी बात से आहत होकर कल्याण बनर्जी ने अब दीदी के सामने 'जान या बलि' जैसी कठोर मांगें रख दी हैं, जिससे टीएमसी कैंप में सन्नाटा पसरा है.
25 साल की निष्ठा और वकालत का सफर
हुगली के एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर कोलकाता हाईकोर्ट के दिग्गज वकील बनने तक का कल्याण बनर्जी का सफर शानदार रहा है. 1981 में वकालत शुरू करने वाले कल्याण को ममता बनर्जी ने उस दौर में चुना जब वे लेफ्ट सरकार से लड़ रही थीं. सिंगूर, नंदीग्राम और टाटा नैनो प्लांट आंदोलनों के दौरान कल्याण बनर्जी ही थे जिन्होंने कोर्ट रूम में ममता की कानूनी ढाल बनकर जीत दिलाई. इसी भरोसे ने उन्हें 2001 में विधायक और फिर 2009 में श्रीरामपुर से सांसद बनाया.
करोड़ों की संपत्ति और लॉ बुक्स का शौक
कल्याण बनर्जी सिर्फ राजनीति के ही रसूखदार नहीं हैं, बल्कि वे देश के सबसे अमीर सांसदों में भी शुमार हैं. 2024 के चुनावी हलफनामे के मुताबिक उनके पास 30.5 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति है. एक सीनियर एडवोकेट के रूप में किताबों के प्रति उनका प्रेम जगजाहिर है. उन्होंने खुद घोषित किया है कि उनके पास मौजूद कानून की किताबों (Law Books) की कीमत ही लगभग 1.25 करोड़ रुपये है.
पूर्व दामाद को हराकर पहुंचे संसद
कल्याण बनर्जी का पारिवारिक जीवन भी राजनीति से अछूता नहीं रहा है. 2024 के लोकसभा चुनाव में श्रीरामपुर सीट पर उनके सामने बीजेपी के उम्मीदवार कबीर शंकर बोस थे. दिलचस्प बात यह है कि कबीर शंकर बोस कल्याण बनर्जी की बेटी प्रमीति के पूर्व पति यानी उनके पूर्व दामाद थे. अपने ही पूर्व दामाद को हराकर कल्याण बनर्जी ने संसद का रास्ता तय किया, जो उस चुनाव की सबसे चर्चित खबरों में से एक थी.
पार्टी में बढ़ती दूरियां और काकोली घोष का विरोध
टीएमसी के भीतर कल्याण बनर्जी की स्थिति अब नाजुक मोड़ पर है. काकोली घोष, जो 18 सांसदों के साथ पार्टी से अलग होने की राह पर हैं, उन्होंने कल्याण बनर्जी को अपने साथ लेने से साफ इनकार कर दिया है. काकोली ने उन पर 'महिला विरोधी' मानसिकता और अभद्र भाषा का आरोप लगाते हुए स्पीकर से शिकायत भी की है. दरअसल, ममता ने काकोली को हटाकर कल्याण को चीफ व्हिप बनाया था, जो इस टकराव की पहली कील बनी.
क्या इमोशनल हैं या बागी?
कल्याण बनर्जी के बारे में पार्टी के भीतर अलग-अलग राय है. कीर्ति आजाद का दावा है कि कल्याण बाबू एक बेहद भावुक और इमोशनल इंसान हैं, वे बस अभिषेक बनर्जी से नाराज हैं, दीदी से नहीं. लेकिन महुआ मोइत्रा जैसी नेता उन्हें 'मिसोजनिस्ट' करार दे चुकी हैं. आक्रामक तेवर और मुंहफट स्वभाव के कल्याण बनर्जी क्या अब सच में बीजेपी का दामन थामेंगे या दीदी एक बार फिर अपने पुराने सिपाही को मना लेंगी, यह बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल बन गया है.
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