राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न ही कोई स्थायी दुश्मन. यहां सिर्फ और सिर्फ सुविधा के समीकरण स्थायी होते हैं. तमिलनाडु में बरसों पुराना कांग्रेस और DMK का साथ क्या छूटा, दिल्ली से लेकर कोलकाता और मुंबई तक राजनीतिक भूचाल आ गया है. ये भूचाल शुरू हुआ स्टालिन की छोटी बहन, डीएमके सांसद कनिमोझी के इंडिया टूर को लेकर. जैसे ही स्टालिन की दूत बनकर कनिमोझी ने मुंबई में शरद पवार, उद्धव ठाकरे और फिर कोलकाता जाकर ममता बनर्जी से उनके घर पर मुलाकात शुरू की, देश के राजनीतिक गलियारों में हेडलाइंस बनने लगीं कि 2029 के महामुकाबले से पहले कोई थर्ड फ्रंट आकार लेने जा रहा है. हाल की रिपोर्टों में भी इन मुलाकातों और तीसरे मोर्चे की संभावनाओं को लेकर चर्चा सामने आई है.
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क्या राहुल गांधी का बनता खेल बिगड़ने वाला है?
इसी के साथ ये सवाल भी उठने लगे कि क्या राहुल गांधी का बनता हुआ खेल बिगड़ने वाला है? क्या करीब 25 साल बाद फिर तीसरे मोर्चे ने आकार लेना शुरू किया है? क्या राहुल गांधी के पीएम बनने के रास्ते में बीजेपी नहीं, बल्कि उनके अपने ही पुराने साथी गड्ढा खोद रहे हैं? तमिलनाडु से उठी एक चिंगारी ने दिल्ली से लेकर कोलकाता तक आग लगा दी है. दक्षिण से लेकर पूरब तक बड़ी हलचल शुरू हुई है.
क्या है तीसरे मोर्चे की राजनीति?
तीसरा मोर्चा या थर्ड फ्रंट की परिभाषा है उन पार्टियों का गठबंधन, जिसमें न बीजेपी शामिल होती है, न कांग्रेस. भारतीय राजनीति में तीसरा मोर्चा या थर्ड फ्रंट फ्लॉप आइडिया या नाकाम प्रयोग माना जाता रहा. 1989 में नेशनल फ्रंट और 1996 में यूनाइटेड फ्रंट के रूप में बने ऐसे मोर्चे आंतरिक अंतर्विरोधों, प्रधानमंत्री पद की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और वैचारिक मतभेदों के कारण बहुत कम समय में ही बिखर गए.
क्षेत्रीय दलों की खींचतान बनी बड़ी चुनौती
क्षेत्रीय क्षत्रपों के बीच आपसी खींचतान और किसी एक सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता के न होने की वजह से इस तरह के मोर्चों में कभी भी स्थिरता नहीं आ पाई. यही वजह है कि आज भी जब तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट होती है, तो इसे एक अस्थिर और असफल फॉर्मूला मानकर खारिज कर दिया जाता है. ये सब उस दौर में हुआ जब बीजेपी पावरफुल नहीं हुआ करती थी. कांग्रेस को रोकना ही देश की बाकी राजनीतिक पार्टियों का सबसे बड़ा राजनीतिक एजेंडा हुआ करता था.
थर्ड फ्रंट की नई राजनीति के सेंटर में कनिमोझी
थर्ड फ्रंट की नई राजनीति के सेंटर में हैं एक चेहरा- कनिमोझी. तमिलनाडु के पूर्व सीएम, डीएमके चीफ एम.के. स्टालिन की छोटी बहन, राजनीतिक दूत और DMK संसदीय दल की नेता कनिमोझी करुणानिधि. कनिमोझी पहले मुंबई जाकर उद्धव ठाकरे और शरद पवार से मिलती हैं और फिर सीधे कोलकाता पहुंचकर ममता बनर्जी के साथ 80 मिनट तक बंद कमरे में बैठक करती हैं. आखिर कनिमोझी की इन मुलाकातों के पीछे की इनसाइड स्टोरी क्या है? क्या स्टालिन थलापति विजय के साथ जाने का बदला लेने जा रहे हैं ब्रदर राहुल गांधी से? कनिमोझी की उद्धव ठाकरे, शरद पवार और ममता बनर्जी से मुलाकातों की हालिया रिपोर्टें सामने आई हैं.
विजय की जीत के बाद बदले सियासी समीकरण
तमिलनाडु चुनाव में थलापति विजय के अचानक जीतने से डीएमके और कांग्रेस का बरसों पुराना गठबंधन टूटा, लेकिन कहानी सिर्फ गठबंधन टूटने की नहीं है. गठबंधन तोड़ना जितना आसान था, आगे की राह उतनी ही धुंधली. कहानी ये है कि गठबंधन टूटने के बाद डीएमके खुद एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसी है, जहां उसके पास अकेले चलने का कोई विकल्प नहीं है, दूसरी कोई राह दिख नहीं रही है. कांग्रेस से अलग होने के बाद डीएमके के सामने सबसे बड़ा संकट विकल्पहीनता का है. 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने विजय की TVK सरकार को समर्थन दिया और DMK-कांग्रेस गठबंधन टूट गया.
बीजेपी के साथ जाने का विकल्प नहीं
तमिलनाडु में डीएमके बीजेपी की धुर विरोधी रही है, इसलिए किसी भी कीमत पर बीजेपी या एनडीए के साथ नहीं जा सकती. हालांकि कांग्रेस से अलायंस के बाद ये खबर उड़ी या उड़ाई गई कि स्टालिन आज नहीं तो कल एनडीए में आ जाएंगे और इसकी शुरुआत होगी डिलिमिटेशन के सवाल पर मोदी सरकार का समर्थन करने से.
तीसरे ध्रुव की तलाश क्यों?
डीएमके की मजबूरी ये है कि बीजेपी के साथ जाना नहीं है, कांग्रेस के साथ रह नहीं सकते. संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर डीएमके के पास कुल 30 सांसद हैं. फिर भी वो सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित रह गई है. डीएमके के पास अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए सिर्फ एक ही रास्ता बचा- कांग्रेस और बीजेपी से अलग एक तीसरा ध्रुव तैयार करना. और इसी मजबूरी के बीच जन्म ले रहा है- मिशन थर्ड फ्रंट. शायद इसी संभावना को टटोलने के लिए एम.के. स्टालिन ने बहन कनिमोझी को मैदान में उतार दिया है, जो आजकल लगातार चेन्नई, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता के चक्कर लगा रही हैं. कनिमोझी की मुलाकातें केवल शिष्टाचार मुलाकातों वाली होतीं तो उनके फोटोज भी सोशल मीडिया पर डाले जाते. मुलाकातें हुईं तो गोपनीय रखी गईं. जो जानकारी निकली है, वो केवल सूत्रों ने दी है. हालिया रिपोर्टों में भी DMK की ओर से कांग्रेस के बिना तीसरे मोर्चे की संभावना तलाशने की बात सामने आई है.
करुणानिधि की विरासत का फायदा
कनिमोझी केवल स्टालिन की बहन नहीं, करुणानिधि की बेटी भी हैं, जो तीसरे मोर्चे की राजनीति के बड़े खिलाड़ी रहे. कनिमोझी सिर्फ करुणानिधि की विरासत का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वो डीएमके का वो चेहरा हैं, जिन्हें दिल्ली की लुटियंस राजनीति और रीजनल नेताओं की नब्ज पहचानना बखूबी आता है. रीजनल नेताओं को जोड़ने वाली एक ऐसी 'कड़ी' हैं, जो स्टालिन का संदेश लेकर राज्यों के दौरे पर निकली हैं. कनिमोझी की यह मुहिम सिर्फ एक शिष्टाचार भेंट नहीं है. वो एक सोची-समझी रणनीति के तहत उन नेताओं के दरवाजे खटखटा रही हैं, जो खुद कांग्रेस के साथ हैं लेकिन विकल्प की भी तलाश में हैं.
डीएमके में कनिमोझी की क्या भूमिका है?
डीएमके के भीतर कनिमोझी करुणानिधि का रोल सिर्फ एक सांसद का नहीं, बल्कि पार्टी की नेशनल फेस हैं. स्टालिन ने बरसों तक सरकार चलाई, लेकिन उन्होंने कभी सरकार में बहन को नहीं लिया. पार्टी में उन्होंने बेटे उदयनिधि को आगे बढ़ाया. कनिमोझी का नेशनल पॉलिटिक्स में एकछत्र राज है. कनिमोझी डीएमके की महिला विंग की कमान संभालती हैं और पार्टी का सबसे प्रोग्रेसिव, बौद्धिक और दिल्ली की लुटियंस राजनीति में पैठ रखने वाला चेहरा मानी जाती हैं. जब भी डीएमके को राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों को एक मंच पर लाना होता है या कांग्रेस समेत अन्य क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ कोई बेहद संवेदनशील डील या नेगोशिएशन करना होता है, तो स्टालिन हमेशा कनिमोझी को ही अपना सबसे भरोसेमंद संकटमोचक और एमिसरी बनाकर भेजते हैं.
राहुल गांधी और कनिमोझी की केमिस्ट्री
सबसे हैरान करने वाला पहलू कनिमोझी और राहुल गांधी की पर्सनल केमिस्ट्री है. तमिलनाडु चुनाव में कांग्रेस-डीएमके का अलायंस तो पक्का था, लेकिन सीट शेयरिंग जैसी चीजें डिस्कस करने के लिए कनिमोझी ही 10 जनपथ आकर राहुल गांधी से मिली थीं. पहले भी जब डीएमके और कांग्रेस में तल्खी आई, कनिमोझी ने सेतु बनकर चीजें ठीक कीं. लेकिन अब राजनीति बदल चुकी है. इस बार कनिमोझी खुद कांग्रेस के खिलाफ मोर्चाबंदी की सूत्रधार बन गई हैं. राजनीति में व्यक्तिगत रिश्तों पर हमेशा दलगत और राज्यों के हित भारी पड़ते हैं. संसद में डीएमके सांसदों का कांग्रेस से अलग बैठना इस बात का गवाह है कि दरार इतनी गहरी हो चुकी है, जो फिलहाल भरने के लिए सोचा भी नहीं जा रहा है. जनवरी 2026 में भी कनिमोझी और राहुल गांधी के बीच तमिलनाडु चुनाव और सीट शेयरिंग को लेकर मुलाकात हुई थी.
क्या राहुल गांधी और कांग्रेस का खेल बिगड़ेगा?
डीएमके का थर्ड फ्रंट अटेम्प्ट विपक्ष की राजनीति में राहुल गांधी और कांग्रेस का बनता हुआ खेल बिगाड़ने की साजिश के तौर पर देखा जाएगा.
राहुल गांधी देश भर में खुद को विपक्ष का एकमात्र चेहरा स्थापित करने की कोशिश में जुटे हैं. इसी मकसद से इंडिया गठबंधन बना भी, लेकिन राहुल गांधी के नाम पर पहले नीतीश कुमार ने कन्नी काटी. फिर ममता बनर्जी ने बंगाल के हितों के नाम पर खुद को चुनावी अलायंस से अलग रखा. हालांकि आज जब ममता जब पार्टी बचाने की जंग लड़ रही हैं, तब राहुल गांधी बुलंदी से उनका समर्थन कर रहे हैं. ये किसी से छुपा नहीं है कि रीजनल पार्टियों को साथ लाने की महारथ ममता बनर्जी को हासिल है. इंडिया अलायंस को आकार देने में उन्होंने बड़ा रोल प्ले किया था.
उद्धव, पवार और ममता के साथ नए समीकरण
शरद पवार और सुप्रिया सुले की बीजेपी से नजदीकियां जगजाहिर हैं. उनकी खुद की पार्टी एनसीपी का भविष्य खतरे में है. शिवसेना की जंग और महाराष्ट्र चुनाव हारने के बाद उद्धव ठाकरे राहुल गांधी या कांग्रेस के खिलाफ तो नहीं गए, लेकिन विकल्प की तलाश में वो भी हो सकते हैं. अगर ममता बनर्जी, उद्धव ठाकरे, शरद पवार और स्टालिन जैसे नेता स्टालिन के कहने पर एक मंच पर आ जाते हैं, तो कांग्रेस का 2029 में विपक्ष का कैप्टन बनने का सपना धरा का धरा रह जाएगा. ये तीन पार्टियां ही नहीं. आंध्र में जगन मोहन रेड्डी, ओडिशा में नवीन पटनायक, दिल्ली-पंजाब में अरविंद केजरीवाल, तेलंगाना में केसीआर जैसे नेता भी सॉलिड विकल्प की तलाश में हैं, जो बीजेपी के साथ दिखना नहीं चाहते, कांग्रेस के साथ जाना नहीं चाहते.
2029 से पहले तीसरे मोर्चे की आहट
इतिहास गवाह है कि जब-जब क्षेत्रीय दल एकजुट हुए हैं, तब-तब केंद्र की सत्ता हिली है. 1996 का 'यूनाइटेड फ्रंट' इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. स्टालिन के इशारे पर कनिमोझी इस वक्त उसी इतिहास को दोहराने की कोशिश कर रही हैं. यह मुलाकातों का सिलसिला सिर्फ एक शुरुआत है, जिसने कांग्रेस की नींद उड़ाई होगी. अगर यह तीसरा मोर्चा वजूद में आता है, तो 2029 की लड़ाई बीजेपी बनाम कांग्रेस नहीं, बल्कि बीजेपी बनाम क्षेत्रीय मोर्चा बनाम कांग्रेस त्रिकोणीय हो जाएगी. और इसका सीधा नुकसान किसे होगा, यह समझना रॉकेट साइंस नहीं है.
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