बेंगलुरु को न्यूयॉर्क और शंघाई जैसा 'हाई-टेक' बनाने का सरकारी सपना, आज कर्नाटक की राजनीति में 'जेल' और 'जमीन' का महासंग्राम बन चुका है! बिदादी टाउनशिप का यह 18 हजार करोड़ का मेगा प्रोजेक्ट इस समय देश की सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में है. एक तरफ जमीन पर किसानों का उग्र आंदोलन है, तो दूसरी तरफ टीवी स्टूडियोज में नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी. विवाद इस कदर बढ़ चुका है कि खुद डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार को कैमरे के सामने कहना पड़ा कि "मैं जेल जाने से नहीं डरता, मैंने जेल देखी है."
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जब लाठी और झाड़ू लेकर मैदान में उतरे किसान: सर्वे टीम को खदेड़ा
कहानी शुरू होती है इसी हफ्ते 13 जुलाई 2026 को, जब बेंगलुरु के पास रामनगर जिले के मंडलाहल्ली गांव में अधिकारियों की एक टीम भूमि सर्वेक्षण (Land Survey) के लिए पहुंचती है. सरकार का इरादा इस इलाके को एक आलीशान शहर में बदलने का है, लेकिन वहां मौजूद किसान अपनी उपजाऊ ज़मीन देने को तैयार नहीं थे. माहौल इतना गर्म हो गया कि महिला किसानों ने हाथों में झाड़ू उठा ली, अधिकारियों को दौड़ा-दौड़ा कर खदेड़ दिया और सरकारी गाड़ियों में तोड़फोड़ की. इस हिंसक विरोध के बाद अधिकारियों को उल्टे पैर भागना पड़ा और सर्वे का काम रोक दिया गया.
बीजेपी-जेडीएस का हमला: डीके शिवकुमार का तीखा पलटवार
इस हिंसक झड़प के बाद जेडीएस (JDS) और बीजेपी (BJP) ने डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार को घेर लिया. पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार 'रियल एस्टेट माफिया' को फायदा पहुंचाने के लिए किसानों की ज़मीन हड़प रही है. कुमारस्वामी ने यहां तक कह दिया कि इस घोटाले के चक्कर में डी.के. शिवकुमार को जेल जाना पड़ेगा. इस पर पलटवार करते हुए डी.के. शिवकुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में गरजते हुए कहा, "कुमारस्वामी मुझे जेल भेजने का सपना देख रहे हैं. जेल मेरे लिए नई जगह नहीं है, मैं पहले भी जेल जा चुका हूं और डरता नहीं हूं. लेकिन अगर मैंने इस प्रोजेक्ट को अभी रद्द किया, तो मैं कानूनी गलती करूंगा और तब मुझे पक्का जेल जाना पड़ेगा."
18,133 करोड़ का मेगा प्रोजेक्ट: देश की पहली एआई-पावर्ड सिटी का खाका
ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप (GBIT) के तहत बनने वाला यह प्रोजेक्ट कोई छोटा-मोटा रियल एस्टेट प्लान नहीं है, बल्कि यह 18,133 करोड़ रुपये का एक मेगा प्रोजेक्ट है. सरकार रामनगर जिले के 9 गांवों की करीब 7,481 से 9,640 एकड़ ज़मीन पर इसे बनाना चाहती है. दावा है कि यह देश का पहला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीक से लैस शहर होगा. इसमें 2,000 एकड़ का इलाका एआई और इनोवेशन हब के लिए, 1,800 एकड़ आलीशान घरों के लिए, और करीब 950 एकड़ इलाका हरियाली और बायरामंगला झील को साफ करने के लिए तय किया गया है. सरकार का तर्क है कि बेंगलुरु में आईटी कंपनियों और आबादी का बोझ इतना बढ़ गया है कि अब वहां सांस लेना मुश्किल है. बिदादी टाउनशिप बनने से बेंगलुरु का ट्रैफिक और आबादी का दबाव कम होगा और लाखों नौकरियां पैदा होंगी.
शिवकुमार का बड़ा खुलासा: 'बिदादी प्रोजेक्ट मेरा नहीं, कुमारस्वामी का ही बच्चा है'
जब विपक्ष ने डी.के. शिवकुमार को घेरा, तो उन्होंने राजनीति का पासा ही पलट दिया. शिवकुमार ने मीडिया के सामने साल 2006 का गजट नोटिफिकेशन लहरा दिया. उन्होंने साबित किया कि इस बिदादी प्रोजेक्ट की शुरुआत किसी और ने नहीं, बल्कि खुद एच.डी. कुमारस्वामी ने की थी, जब वह 2006 में बीजेपी के साथ मिलकर मुख्यमंत्री बने थे. उस समय कुमारस्वामी सरकार ने ही इस पूरी ज़मीन को विकास के लिए 'नोटिफाई' किया था और डीएलएफ (DLF) कंपनी से 400 करोड़ रुपये का डिपॉजिट भी लिया था. शिवकुमार का सीधा तर्क है कि "यह प्रोजेक्ट मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट नहीं है, यह कुमारस्वामी का ही बच्चा है जिसे मैं सिर्फ कानूनी तौर पर आगे बढ़ा रहा हूं."
सरकार बैकफुट पर: विवाद सुलझाने के लिए रिव्यू कमेटी का गठन
किसानों के चौतरफा गुस्से और विपक्ष के हमलों को देखते हुए फिलहाल सरकार बैकफुट पर आ गई है. डी.के. शिवकुमार ने ऐलान किया है कि सरकार अब इस प्रोजेक्ट में कोई ज़बरदस्ती या जल्दबाज़ी नहीं करेगी. प्रोजेक्ट के कानूनी, सामाजिक और आर्थिक असर को देखने के लिए एक विशेष विशेषज्ञ समीक्षा समिति (Review Committee) का गठन कर दिया गया है. सरकार का कहना है कि जो किसान अपनी ज़मीन नहीं बेचना चाहते, वे वहां खेती जारी रख सकते हैं. लेकिन मुआवजे और ज़मीन की कीमतों को लेकर किसानों के मन में जो अविश्वास पैदा हो चुका है, उसने इस प्रोजेक्ट के भविष्य पर फिलहाल एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है.
मुआवजे का महागणित: कुमारस्वामी बनाम डीके शिवकुमार की योजना
डी.के. शिवकुमार ने दावा किया कि साल 2006 में जब एच.डी. कुमारस्वामी मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने इस प्रोजेक्ट के लिए सिर्फ ₹22 लाख से ₹25 लाख प्रति एकड़ का मुआवजा तय किया था. उस समय की योजना के तहत किसानों को विकसित ज़मीन का केवल 40 प्रतिशत हिस्सा (करीब 8,000 वर्ग फीट) देने का वादा किया गया था. कांग्रेस का आरोप है कि कुमारस्वामी के समय पूरे के पूरे गांवों को उजाड़ने और बहुत मामूली कीमत पर जमीन हड़पने की तैयारी थी. इसके उलट, अब डी.के. शिवकुमार की सरकार ने मुआवजे की राशि में ऐतिहासिक बढ़ोतरी की है. डीके सरकार किसानों को ₹2.30 करोड़ से ₹2.55 करोड़ प्रति एकड़ का नकद मुआवजा दे रही है. इसके साथ ही जो किसान जमीन के बदले विकसित प्लॉट चाहते हैं, उन्हें 50 फीसदी विकसित ज़मीन वापस देने का विकल्प दिया गया है. इसके अलावा, जमीन मिलने तक किसानों को ₹30,000 से ₹50,000 का सालाना गुजारा भत्ता भी दिया जाएगा.
फूड बास्केट की बलि: क्यों जमीन देने को तैयार नहीं हैं किसान?
किसानों का साफ कहना है कि रामनगर जिला और बिदादी का यह इलाका बेंगलुरु का 'फूड बास्केट' (अन्न का कटोरा) माना जाता है. इस टेक सिटी को बनाने के लिए करीब 2 लाख पेड़ काटे जाएंगे. इनमें 87,000 नारियल, 83,000 सुपारी, और 12,000 आम के पेड़ शामिल हैं. यहां का किसान हर दिन बेंगलुरु शहर को 60,000 लीटर दूध सप्लाई करता है. नारियल, रेशम (सेरीकल्चर) और डेयरी फार्मिंग से किसानों को हर महीने पक्की और रेगुलर कमाई होती है. किसानों का तर्क है कि, "₹2.5 करोड़ का मुआवजा एक बार मिलकर खत्म हो जाएगा, लेकिन हमारी जमीन पीढ़ियों तक हमें कमा कर खिलाएगी."
छोटे किसानों की चिंता: मुआवजा मिलेगा पर हो जाएंगे भूमिहीन
इस प्रोजेक्ट से प्रभावित होने वाले कुल किसानों में से लगभग 60% किसान ऐसे हैं, जिनके पास सिर्फ आधा एकड़ से एक एकड़ तक की जमीन है. अगर सरकार उनकी एक एकड़ जमीन ले भी लेती है, तो उन्हें ₹2-2.5 करोड़ मिलेंगे. आज के समय में इस पैसे से वे बेंगलुरु के आसपास वैसी खेती की जमीन दोबारा कभी नहीं खरीद पाएंगे. उनके लिए यह मुआवजा उन्हें हमेशा के लिए बेरोजगार और भूमिहीन बना देगा.
2006 की शुरुआत: जब कुमारस्वामी ने देखा था बिदादी टाउनशिप का सपना
इस मेगा प्रोजेक्ट की कहानी शुरू होती है सितंबर 2006 में, जब कर्नाटक में जेडीएस-बीजेपी (JDS-BJP) गठबंधन की सरकार थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने बेंगलुरु के बढ़ते बोझ और आबादी को नियंत्रित करने के लिए शहर के चारों तरफ 5 सैटेलाइट टाउनशिप बनाने का फैसला किया. इनमें से सबसे प्रमुख था 'बिदादी इंटीग्रेटेड टाउनशिप प्रोजेक्ट' (Bidadi Integrated Township Project). इस प्रोजेक्ट के लिए रामनगर जिले के 9 गांवों की करीब 9,484 एकड़ ज़मीन को 'नोटिफाई' किया गया.
डीएलएफ का प्रवेश और ग्लोबल मंदी के बाद ठंडे बस्ते में गया प्रोजेक्ट
प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने के लिए कुमारस्वामी सरकार ने पीपीपी (PPP) मॉडल के तहत ग्लोबल टेंडर जारी किए. इस टेंडर को देश की मशहूर रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ (DLF) ने जीता. डीएलएफ ने इस प्रोजेक्ट को डेवलप करने की जिम्मेदारी ली और सरकारी प्रक्रिया के तहत सरकार के पास ₹400 करोड़ का सिक्योरिटी डिपॉजिट भी जमा कराया. सरकार ने इस पूरे इलाके को 'रेड जोन' घोषित कर दिया, ताकि वहां कोई और प्राइवेट कंस्ट्रक्शन न हो सके. लेकिन साल 2008-2009 में जब पूरी दुनिया में वैश्विक आर्थिक मंदी (Global Financial Crisis) आई, तो रियल एस्टेट बाजार पूरी तरह टूट गया. मंदी और खराब मार्केट सेंटिमेंट को देखते हुए डीएलएफ (DLF) कंपनी बैकफुट पर आ गई और उसने इस भारी-भरकम प्रोजेक्ट से अपने हाथ खींच लिए. कंपनी ने सरकार से अपना ₹400 करोड़ का डिपॉजिट वापस ले लिया. इसके बाद आई बीजेपी और कांग्रेस की सरकारों के दौरान नए भूमि अधिग्रहण कानूनों और मुआवजे के विवादों के चलते यह प्रोजेक्ट अगले डेढ़ दशक (15 साल) तक फाइलों में ही दबा रहा.
2023 में कांग्रेस की वापसी: भारत की पहली एआई सिटी का पुनर्जन्म
साल 2023 में जब कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी और डी.के. शिवकुमार उपमुख्यमंत्री व बेंगलुरु विकास मंत्री बने, तो उन्होंने इस धूल खाती फाइल को दोबारा निकाला. इस पुराने प्रोजेक्ट को एक बिल्कुल नया और आधुनिक रूप दिया गया, जिसे नाम दिया गया— ग्रेटर बेंगलुरु इंटीग्रेटेड टाउनशिप (GBIT) या 'भारत की पहली एआई-पावर्ड सिटी'. मार्च 2025 में इसके लिए नए सिरे से लैंड एक्विजिशन नोटिफिकेशन (Land Acquisition Notification) जारी की गई और इस प्रोजेक्ट को रफ्तार दी गई.
500 दिनों का शांत आंदोलन अचानक हुआ उग्र
प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने इसके क्रियान्वयन के लिए एक नई अथॉरिटी 'ग्रेटर बेंगलुरु डेवलपमेंट अथॉरिटी' (GBDA) का गठन किया. अभी जुलाई 2026 में सरकार ने करीब 5,462 एकड़ भूमि के अधिग्रहण के लिए अंतिम अधिसूचना (Final Notification) जारी कर दी है. लेकिन जैसे ही सरकारी टीमें जमीन नापने धरातल पर उतरीं, वैसे ही किसानों का 500 दिनों से चल रहा शांत आंदोलन उग्र हो गया और अब यह प्रोजेक्ट एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक घमासान में बदल चुका है.
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